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वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

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94 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता (४) कपिष्ठल-कठ संहिता- यह कृष्णयजुर्वेद की प्रसिद्ध शाखा है। चरणव्यूहानुसार चरक शाखा में 'कठाः प्राच्य कठाः' तथा 'कपिष्ठल कठाः' का निर्देश किया गया है। कपिष्ठल किसी प्राचीन प्रसिद्ध ऋषि की संज्ञा है क्योंकि इसका उल्लेख वैयाकरण पाणिनि तथा निरुक्तकार दुर्गाचार्य ने किया है। पाणिनि ने एक सूत्र में लिखा है- 'कपिष्ठलो गोत्रे' (८/३/९१) तथा दुर्गाचार्य ने लिखा है- 'अहं च कापिष्ठिलोवासिष्ठः' (निरुक्तटीका ४४)। कपिष्ठल किसी स्थान का नाम प्रतीत होता है। कपिष्ठल का अपभ्रंश कैथल नामक एक ग्राम है, जो आजकल हरियाणा नामक प्रदेश का अङ्ग है। यह ग्राम प्राचीनकाल से ही अति प्रसिद्ध रहा है। काशिकावृत्ति (८/३/९१) तथा वराहमिहिर की बृहत्संहिता (१४/४) में इस ग्राम का उल्लेख है। इसका मूल ग्रन्थ कई दृष्टि से काठक संहिता से साम्य रखता है, किन्तु इसकी स्वराङ्कन पद्धति ऋग्वेद के सदृश है। इसका विभाजन भी ऋग्वेदीय अष्टकों के समान है। इसमें आठ अष्टक एवं ६४ अध्याय थे जिसमें से आजकल केवल ६ अष्टक जीर्णशीर्ण अवस्था में उपलब्ध होते हैं। चतुर्थ अष्टक का २७वां अध्याय 'रुद्राध्याय' है। सम्प्रति इस संहिता की एक अधूरी प्रति सरस्वती भवन, वाराणसी संस्कृत विश्वविद्यालय में सुरक्षित है। इसी की एक प्रति वेदाध्ययन के लिए यूरोप भेजी गई थी। इस प्रति के आधार पर डा० रघुवीर ने १९३२ में इसे प्रकाशित करवाया। इस पुण्य कार्य के सम्पादन के लिए डा० रघुवीर धन्यवाद के पात्र हैं। मैत्रायणी शाखा- इस शाखा की संहिता 'मैत्रायणी' गद्य पद्यात्मक है। इसमें मन्त्र तथा ब्राह्मणों का सम्मिश्रण है। सम्पूर्ण संहिता चार काण्डों में विभाजित है। प्रथम काण्ड में ११ प्रपाठक हैं, जिनमें दर्श, पौर्णमास, चातुर्मास्य, वाजपेयादि का विवेचन है। द्वितीय काण्ड में १३ प्रपाठक हैं जिनमें काम्येष्टि एवं राजसूय यज्ञों का वर्णन उपलब्ध होता है। तृतीय काण्ड में १२ प्रपाठक हैं जिनमें चिति, सौत्रामणि तथा अश्वमेध यज्ञों की चर्चा की गई है। चतुर्थ काण्ड खिल रूप में है। उसमें १४ प्रपाठक हैं, जिनमें राजसूयादि यज्ञों की सम्पूर्ण जानकारी दी गई है। इस संहिता में कुल मन्त्रों की संख्या २११४ है। इन मन्त्रों में ऋग्वेद के विविध मण्डलों के १७०१ मन्त्र हैं। इस शाखा के अनेक मन्त्र तैत्तरीय तथा काठक संहिताओं में भी प्राप्त होते हैं। इस शाखा के सम्पादक भी जर्मन के वेदज्ञ डा० श्रोदर हैं। भारत में इसका प्रकाशन १९९८ में औंध से हुआ। मैत्रायणी संहिता की एक अन्य संज्ञा भी है- 'कालाप

CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar