वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंDigitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri द्वितीय अध्याय 95 संहिता'। आचार्य विश्वरूप के अनुसार- 'नहि मैत्रायणी शाखा काठकस्य अत्यन्त विलक्षणा' अर्थात् मैत्रायणी तथा काठक संहिता में कोई अन्तर नहीं है। दोनों समान है। तैत्तिरीय शाखा- इस शाखा की संहिता का दक्षिण के महाराष्ट्र तथा आन्ध्र प्रदेश में विशेष प्रचार हुआ है। तैत्तिरीय संहिता में ६ काण्ड, ४४ प्रपाठक तथा ६३१ अनुवाक हैं। इसमें मंत्रों की संख्या २१९८ है। जैसी ऋग्वेद की सर्वानुक्रमणी है, वैसी इस संहिता की कोई सर्वानुक्रमणी नहीं है। कृष्णयजुर्वेद की अन्य शाखाओं के सदृश इस संहिता में भी गद्य पद्य तथा ब्राह्मण का सम्मिश्रण है। इसमें भी राजसूय, वाजपेय, याजमान तथा पौरोडास आदि यज्ञों की विस्तारपूर्वक समीक्षा की गई है किन्तु इस संहिता की व्याख्याओं में द्रविण प्रभाव छाया है। तैलंग तथा द्रविण ब्राह्मण, तैत्तरीय संहिता को ही आपस्तम्ब कहते हैं। यह संहिता आदिकाल से विद्वानों के मध्य अत्यन्त समादृत रही है। इसका सम्पादन सर्वप्रथम जर्मन वेदज्ञ डॉ० वैवर द्वारा किया गया। इसका प्रकाशन अंग्रेजी मे सन् १९१४ ई० में हारवर्ड ओरियण्टल सीरीज द्वारा किया गया। अनुवादक थे- डा० कीथ। भारतवर्ष में इस संहिता पर सर्वप्रथम भास्कर मिश्र ने अपना भाष्य लिखा। यह भाष्य मैसूर संस्कृत ग्रन्थमाला से प्रकाशित हुआ। इसके पश्चात् आचार्य सायण ने इसका प्रामाणिक भाष्य प्रस्तुत किया। यह भाष्य भी आनन्दाश्रम संस्कृत ग्रन्थमाला द्वारा प्रकाशित किया जा चुका है। इस शाखा की संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषद्, श्रौतसूत्र तथा गृह्यसूत्र आदि सम्पूर्ण संहिता पूर्णतः सुरक्षित है। इसी कारण यह संहिता अपना विशिष्ट स्थान रखती है। सामवेदीय शाखाएँ- महाभाष्यकार पतञ्जलि ने सामवेद की शाखाओं के विषय में लिखा है- 'सहस्रवर्त्मा सामवेदः।' अर्थात् सामवेद एक हजार शाखाओं वाला है। शौनक ने भी अपने ग्रन्थ 'चरणव्यूह' में सामवेद की एक हजार शाखाओं का निर्देश किया है। चरणव्यूह, प्रपञ्चहृदय, जैमिनि गृह्यसूत्र एवं दिव्यावदान के अनुसार सामवेद के १३ आचार्य थे, जिनके नाम ये हैं- राणायन, सत्यमुग्र, व्यास, भागुरि, औलुण्डि, गौलमुलवि, भानुमान, औपमन्यव, काराटिमशक, गार्ग्य, वार्षगण्य, कौथुमि, शालिहोत्र एवं जैमिनि। ऐसा विश्वास किया जाता है कि प्राचीन काल में उपर्युक्त सभी आचार्यों की पृथक्-पृथक् शाखाएँ उपलब्ध थीं किन्तु आजकल ऐसा नहीं है। आज तो केवल तीन शाखाएँ ही दृष्टिगोचर होती हैं। चरणव्यूह के टीकाकार महीदास ने सामवेद की केवल तीन शाखाओं की उपलब्धि होते हुए बतलाया है। वे शाखाएँ निम्नलिखित हैं- CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar