भारतकोश
वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

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Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 96 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता १. राणायनीय शाखा २. कौथुमीय शाखा ३. जैमिनीय शाखा इन शाखाओं का जितना साहित्य उपलब्ध होता है, वह निम्नलिखित है— (अ) ब्राह्मण ग्रन्थ- ताण्ड्य ब्राह्मण (कौथुमीय), षडविंश ब्राह्मण, सामविधान ब्राह्मण एवं जैमिनीय ब्राह्मण। (ब) आरण्यक – छान्दोग्य आरण्यक (कौथुमीय) तथा जैमिनीय आरण्यक। (स) उपनिषद् – छान्दोग्य उपनिषद् (कौथुमीय), केनोपनिषद् (जैमिनीय) एवं जैमिनीय उपनिषद्। सामवेद की तीनों शाखाओं के सूत्र ग्रन्थ उपलब्ध होते हैं, वे इस प्रकार हैं- राणायनीय शाखा- द्राह्यायण श्रौतसूत्र और खदिर गृह्यसूत्र। जैमिनि शाखा- जैमिनीय श्रौतसूत्र और जैमिनीय गृह्यसूत्र। कौथुम शाखा- मशक कल्पसूत्र, लाटाय्या श्रौतसूत्र तथा गोभिल गृह्यसूत्र। अब इन शाखाओं का विस्तृत परिचय निम्नलिखित है- राणायनीय शाखा- इस शाखा का प्रचार महाराष्ट्रीय भट्टों में सर्वाधिक है। इस शाखा के अनुयायियों में एक शाखा अन्य भी प्रचलित है। यह अवान्तर शाखा है। इसका नाम 'सात्यमुग्नि शाखा' है। मुनि आपिशलि ने अपने शिक्षा ग्रन्थ में इस शाखा की विशेषता का उल्लेख किया है। उन्होंने लिखा है- 'छन्दोगान सात्यमुग्नि राणायणीयाः ह्रस्वं पठन्ति।' महाभाष्यकार पतञ्जलि भी इस बात पर सहमत है। उनका कथन है- 'न नु च भोः छन्दोगान सात्यमुग्निराराणायनीया अर्धमेकारं अर्धभोंकारञ्जन अधीयते।' अर्थात् सात्यमुग्निराराणायनीय एकार एवं ओंकार का उच्चारण ह्रस्व ही करते हैं। इस वैशिष्ट्य के ग्रीकभाषा का प्रभाव कहने वाले पाश्चात्यभाषावैज्ञानिकों को संस्कृतभाषा के विषय में ऐसे निर्देशों को देखकर अपने विचारों को बदलना पड़ा। जैमिनीय शाखा- यह हर्ष का विषय है कि जैमिनीय शाखा के संहिता, ब्राह्मण, श्रौतसूत्र तथा गृह्यसूत्र सभी उपलब्ध हो चुके हैं। इसकी एक अवान्तर शाखा भी है- 'तवलकार'। केनोपनिषद् का सम्बन्ध इसी अवान्तर शाखा से है। तवलकार नाम के एक ऋषि हुए है। इन्हें जैमिनि के शिष्य के रूप में जाना जाता है। जैमिनीय ब्राह्मण का अभिधान CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar