भारतकोश
वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

पृष्ठ 125, कुल 353 में से

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पृष्ठ 125

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द्वितीय अध्याय 97 ही 'तवलकार ब्राह्मण' के रूप में प्रचलित है। यह संहिता नागराक्षर में लाहौर से प्रकाशित हो चुकी है। इसमें कुल १६८७ मन्त्र हैं। इनकी संख्या कौथुम शाखा के मन्त्र संख्या से १८२ कम है। जैमिनीय शाखा के सामगान कौथुम शाखा के सामग़ानों से एक हजार अधिक है। कौथुम गानों की संख्या केवल २७२२ हैं जबकि जैमिनीय गानों की संख्या ३६८१ है। कौथुमीय शाखा- इस शाखा की संहिता सर्वाधिक प्रचलित एवं लोकप्रिय है। कौथुमीशाखा का विशेष प्रचार गुजरात के नागर भट्टों में है। सायणकृत भाष्य कौथुमीय शाखा पर ही उपलब्ध होता है। इस शाखा की एक अवान्तर शाखा भी प्राप्त है- 'ताण्ड्य।' वेदान्त भाष्य के एक स्थल पर आचार्य शंकर ने भी कौथुमीयसंहिता' ताण्डय' तथा 'शाट्यायिन-संहिताओं' का नामोल्लेख किया है- 'अन्येऽपि शाखिनः ताण्डिनः शाट्यायिनः। (शां०भा० ३/३) ताण्ड्य ब्राह्मण तथा छान्दोग्य उपनिषद् कौथुमीय शाखा से सम्बन्धित हैं। अथर्ववेद की शाखाएँ- पतञ्जलि ने महाभाष्य के 'पशपशाह्निक' में अथर्ववेद की नौ शाखाएँ बतलाई हैं। उन्होंने लिखा है- नवधाऽथर्वणो वेदः। श्रीमद्भागवत् एवं वायुपुराण के अनुसार कलियुग के आरम्भ में जब वेदादि को संगृहीत किया गया तो वेदव्यास ने सुमन्तु नामक शिष्य को अथर्ववेद का ज्ञान कराया। इनका दूसरा नाम 'दारुण' भी है। सुमन्तु ने पुनः यह वेद अपन शिष्य कबन्ध को पढ़ाया। कबन्ध के भी दो शिष्य थे- (अ) पथ्य (ब) देवदर्श। इनमें से पथ्य के भी तीन शिष्य हुए। इन तीनों के नाम हैं- जाजलि, कुमुद और शौनक। शौनक के भी दो शिष्य थे- बभू एवं सैन्धवायन। ये नौ शाखाएँ इन्हीं नौ ऋषियों की मानी जाती है। चरणव्यूहकार भी अथर्ववेद की नौ शाखाएँ मानते हैं, किन्तु शाखाओं की संज्ञा के बारे में मत भिन्नता है। आधुनिक प्रख्यात वेदज्ञ पं० भगवत् दत्त जी के अनुसार ६ नाम प्रायः सभी समान बतलाते हैं, वे हैं- पैप्पलाद, मौद, शौनकीय, जाजल, देवदर्श तथा चारणवैद्य। अन्य तीन शाखाएँ अनुमानतः ये हो सकती है- स्तौद, जलद तथा ब्रह्मबल। वर्तमान काल में उन नौ शाखाओं में से दो शाखाएँ ही शेष हैं। शेष ६ तो नष्ट हो चुकी हैं। उपलब्ध शाखाओं का क्रमशः विवेचन प्रस्तुत है। पैप्पलाद शाखा- यह शाखा जीर्णशीर्ण रूप में शारदा लिपि में झर्जपत्र पर उल्लिखित काश्मीर में

CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

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