वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
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98 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता उपलब्ध हुई थी। कश्मीर नरेश राजा रणवीर सिंह ने इसे डॉ० राथ को सन् १८७५ ई० में सौंप दी थी। १८९५ मे राथ साहब के देहावसान हो जाने पर यह प्रति ट्यूबिंजन विश्वविद्यालय की पुस्तकालय में रख दी गई। इस प्रति की एक फोटोस्टेट कापी अमेरिका के वाल्टमोर नगर से तीन जिल्दों में प्रकाशित हुई। भारत में इसकी दो प्रतियाँ जर्मनी जाने से पूर्व ही सुरक्षित कर ली गई थीं। इनमें से एक भाण्डारकर इन्स्टीट्यूट, पूना में तथा दूसरी बम्बई रॉयल एशियाटिक सोसाइटी में सुरक्षित है। प्रपञ्चहृदयकार के अनुसार 'आथर्वणिके पैप्पलाद शाखायां मन्त्री विंशति काण्डः।' तात्पर्य यह है कि पैप्पलाद शाखा में ५० काण्ड थे। महाभाष्यानुसार पैप्पलाद शाखा का प्रारम्भ 'शन्नोदेवीरभिष्टय' मन्त्र द्वारा होता है। किन्तु शौनक संहिता में इसकी स्थिति प्रथम काण्डान्तर्गत छठें सूक्त के आदि में है। इसका केवल एक 'प्रश्नोपनिषद्' प्राप्त होता है। इसमें सुकेशा तथा भारद्वाज आदि ६ ऋषियों द्वारा पूछे गए प्रश्नों के पिप्पलाद मुनि द्वारा दिए गए उत्तर संगृहीत है। शौनकशाखा- शौनक शाखा की संहिता की संरचना १८ काण्डों मे हुई है तथा काण्ड, प्रपाठक, अनुवाक्, सूक्त, मन्त्र, गण, पर्याय तथा अवसानों में इसका विभाजन हुआ है। बृहत् सर्वानुक्रमणिका के काल में यह शाखा १९ काण्डों वाली हो गई। आश्वलायन अनुक्रमणी के अनुसार यह शाखा २० काण्डों की है। वे २०वें काण्ड के ऋषि एवं देवता का भी निर्देश करते हैं। अथर्ववेद की उपलब्ध शौनक शाखा ही मूल संहिता है। सम्प्रति इसमें २० काण्ड, ३४ प्रपाठक, १११ अनुवाक, ६६३ वर्ग, ६३१ सूक्त तथा ५९७७ मन्त्र हैं। वायुपुराणानुसार इस शाखा की संहिता के ६०२६ मन्त्र थे। मौदशाखा- इसका उल्लेख महाभाष्य (४।१।८६) तथा शाबरभाष्य (१।२१।३०) में प्राप्त होता है। अथर्व परिशिष्ट (२।५) में मौद तथा जलद शाखा वाले पुरोहित अत्यन्त गर्हित बतलाए गए हैं। इसके अनुसार इन पुरोहितों की उपस्थिति विनाश की सूचक है। 'पुरोधा जलदो यस्य मौदो वा स्यात् कदाचन। अब्दाद् दशम्यो मासेभ्यो राष्ट्रभ्रंश सगच्छति।।' इस प्रकार का उल्लेख संभवतः अभिचार मारणादि के प्रयोग के कारण हुआ है।
CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar