वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
पृष्ठ 119, कुल 353 में से
संदर्भ में पढ़ेंDigitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri द्वितीय अध्याय 91 यजुर्वेदीय शाखाएँ महाभाष्यकार पतञ्जलि के अनुसार यजुर्वेद की १०१ शाखाएँ हैं। उन्होंने लिखा है— 'एकशतध्वर्युशाखा' प्रपञ्चहृदयकार ने भी द्वितीय प्रकरण में लिखा है— 'यजुर्वेद एकोत्तरशतधा' अर्थात् यजुर्वेद १०१ शाखाओं वाला है। महर्षि दयानन्द भी इस विषय में पतञ्जलि के मत का समर्थन करते हैं। शौनक ने 'चरणव्यूह' में इस वेद की १८६ शाखाओं का निर्देश किया है। अनेक विद्वान् यजुर्वेद की १०० शाखाएँ ही मानते हैं। सूत संहिता, ब्रह्माण्डपुराण, स्कन्दपुराण आदि में यजुर्वेद की १०९ शाखाओं का उल्लेख किया गया है। मुक्तिकोपनिषद् ने यजुर्वेद की १०७ शाखाएँ मानी हैं। यजुर्वेद की १०१ शाखाओं में अधिकांश काल के प्रवाह में नष्ट हो गई, परन्तु प्रपञ्चकार को ३६ शाखाओं की जानकारी थी। बौद्ध ग्रन्थ 'दिव्यावदान' में कठों की १०, काण्व की १०, वाजसनेय की ११, जातुकर्ण की १३, प्रोष्ठ पद की १६ अर्थात् कुल ६० शाखाओं का निर्देश प्राप्त होता है। 'आथर्वण चरणव्यूह' परिशिष्ट में यजुर्वेद की २४ शाखाओं के नाम दिए हैं जिनमें शुक्लयजुर्वेद के १० तथा कृष्णयजुर्वेद की १४ शाखाएँ हैं। वे नाम निम्नलिखित हैं। शुक्ल-यजुर्वेद की शाखाएँ— काण्व, माध्यन्दिन, जाबाल, शापेय, श्वेत, श्वेततर, ताम्रायणीय, पौर्णवत्सा, आवटिका तथा परमावटिका। कृष्ण-यजुर्वेद की शाखाएँ— हौष्याः, धौष्याः, खाडिकाः, आह्नकाः, चरकाः, मैत्राः, मैत्रायणीयाः हरिव्रिविणाः, शालायनीया, मर्चकठाः, प्राच्यकठा, कपिष्ठलकठाः, उपलाः एवं तैत्तरीयाः। इसी प्रकार शुक्लयजुर्वेदीय शाखाओं का नामोल्लेख वायुपुराण अध्याय २/६१, ब्रह्माण्डपुराण अध्याय ३५ तथा चरणव्यूह एवं प्रतिज्ञापरिशिष्ट आदि में हुआ है। इन नामों में परस्पर साम्य नहीं है। 'प्रतिज्ञापरिशिष्ट' में दी गई नामावली इस प्रकार है— जाबाला, बौधेया, काण्वी, माध्यन्दिना, शापेया, तापायनीया, कापाला, पौण्ड्रवत्सा, आवटिका, परमावटिका, पाराशरा, वैनतेया, वैधैया, कौनतेया तथा वैजवाया। आजकल शुक्लयजुर्वेद की दो तथा कृष्णयजुर्वेद की चार शाखाएँ उपलब्ध होती हैं। वे उपलब्ध शाखाओं के नाम इस प्रकार हैं— शुक्ल यजुर्वेद— (१) वाजसनेयी शाखा। (२) काण्व शाखा। कृष्ण यजुर्वेद— (३) तैत्तरीय शाखा। (४) मैत्रायणी शाखा। CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar