वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंDigitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 90 वैदिक वाङ्गमय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता १. ब्राह्मण- ऐतरेय ब्राह्मण एवं कौषीतकि ब्राह्मण। २. आरण्यक- ऐतरेय आरण्यक एवं कौषीतकि आरण्यक। ३. उपनिषद्- ऐतरेय उपनिषद् तथा कौषीतकि उपनिषद्। ४. सूत्र- आश्वलायन श्रौतसूत्र। इसी शाखा के मन्त्र सामवेद की कौथुमशाखा, अथर्ववेद के पचासवें काण्ड तथा कृष्णयजुर्वेद में प्राप्त होते हैं। इसी कारण यह शाखा वैदिक शाखा में आदरणीय स्थान पर प्रतिष्ठित है। २. वाष्कल शाखा- यह शाखा आजकल प्राप्त नहीं होती है, किन्तु इस शाखा के विषय में यत्र तत्र सामग्री प्राप्त होती है। शाकल शाखा में अन्तिम मन्त्र 'समानीव आकूतिः' शब्दों से प्रारम्भ होता है, परन्तु वाष्कल शाखा का अन्तिम मन्त्र का प्रारम्भ 'तच्छंयोरावृणीमहे' शब्द से होता है। आचार्य शौनक ने अपना विचार प्रकट करते हुए लिखा है कि- ‘एतत् सहस्रं दश सप्त चैवाष्टावती वाष्कलकेऽधिकानि। तान्पारणे शाकले शैशिरोये वदन्तिशिष्टाऽनाखिलेषु विप्राः॥' (अनुवाकानुक्रमणी, ३६) इसके अनुसार वाष्कल शाखा में शाकल शाखा से आठ सूक्त अधिक हैं। शाकल शाखा में कुल १०१६ सूक्त हैं जबकि वाष्कल शाखा में १०२५ सूक्त हैं। इस संहिता का अन्तिम सूक्त संज्ञान सूक्त है। वाष्कल के प्रथम मण्डल के मन्त्रों में शाकल से क्रम-भिन्नता है। इसी कारण अस्त-व्यस्त ढंग से कार्य करने वाले व्यक्ति को 'वाष्कल' कहकर पुकारते हैं। ३. आश्वलायन शाखा- कवीन्द्राचार्य की सूची में आश्वलायन शाखा की संहिता तथा ब्राह्मणों का नामोल्लेख हुआ है, इससे इनके अस्तित्व की पुष्टि होती है। आजकल इस शाखा के केवल 'गृह्यसूत्र' तथा 'श्रौतसूत्र' ही प्राप्त होते हैं, जिनके नाम हैं- आश्वलायन- गृह्यसूत्र तथा आश्वलायन-श्रौतसूत्र। इसके अतिरिक्त अन्य साहित्य अप्राप्य है। ४. शाङ्खायन शाखा- इस शाखा के ब्राह्मण तथा आरण्यक उपलब्ध हैं किन्तु संहिता अनुपलब्ध है। ५. माण्डूकायन शाखा- इस शाखा का आजकल कोई भी ग्रन्थ उपलब्ध नहीं होता है। CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar