भारतकोश
वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

पृष्ठ 103, कुल 353 में से

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पृष्ठ 103

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri द्वितीय अध्याय 75 (क) पं० शङ्कर बालकृष्ण दीक्षित का मत :- महाराष्ट्र निवासी प्रख्यात वेदज्ञ पं० शङ्कर बालकृष्ण दीक्षित ने शतपथ ब्राह्मण का एक अंश उद्धृत किया है, जिसके अनुसार इस ब्राह्मणग्रन्थ के रचनाकाल पर प्रकाश पड़ता है। इस अंश से विदित होता है कि शतपथ ब्राह्मण के रचनाकाल के समय कृत्तिकाओं को ठीक पूर्वीय बिन्दु पर उदित होने का निर्देश है, जहाँ से वे किञ्चिदपि पृथक् नहीं होती। उद्धृत अंश इस प्रकार है— ''एकं द्वे त्रीणि चत्वारीति वा अन्यानि नक्षत्राणि, अथैता एव भूयिष्ठा यत् कृत्तिका स्तद् भूमानमेव एतदुपैति तस्मात् कृत्तिकास्वादधीत। ऐता ह वै प्राच्यादिशो न च्यवन्ते, सर्वाणि ह वा अन्यानि नक्षत्राणि प्राच्यादिशयाच्यन्ते।'' (शतपथ ब्राह्मण २/१/२) आजकल कृत्तिका नक्षत्र पूर्वीय बिन्दु से किंचित् उत्तर की ओर हट कर उदित होता है। अतः दीक्षित जी की गणनानुसार कृतिका नक्षत्र में वसन्त सम्पात सम्भवतः २५०० ई० पूर्व हुआ होगा। यही शतपथ-ब्राह्मण की रचना का समय है। कृत्तिकादि नक्षत्रों का वर्णन करने वाली संहिता तैत्तरीय शतपथ-ब्राह्मण से प्राचीनतर है तथा तैत्तरीय संहिता से भी प्राचीनतर है ऋग्वेद। अतः चतुर्वेद के निर्माण में लगभग एक हजार वर्षों का समय व्यय हुआ होगा। अतः सर्वप्रथम निर्मित ऋग्वेद का निर्माण ३५०० ई० पूर्व हुआ होगा। (ख) लोकमान्य बालगंगाधर तिलक का मत :- स्वर्गीय श्री तिलक जी ने ऋग्वेद में उपलब्ध ज्योतिष विषयक घटनाओं के आधार पर वेद की रचना का सर्वप्राचीन काल ६००० ई०पू० से लेकर ४००० ई०पू० तक निर्धारित किया है। इस तिथिनिर्धारण का मुख्य आधार विभिन्न नक्षत्रों में वसन्त- सम्पात का वर्णन है। उन्होंने वैदिक काल को चार युगों में विभाजित किया है। वे चार युग निम्नलिखित हैं— (१) अदिति-काल :- इस काल की सीमा ६००० ई०पू० से लेकर ४००० ई०पू० तक है। इस काल में किंचित् गद्य में तथा किंचित् पद्य में अर्थात् गद्यपद्य मिश्रित यज्ञीय विधि वाक्यों की रचना हुई। इनकी संज्ञा निविद् है। इनमें देवताओं की संज्ञा, उनके गुणों तथा चरितों का वर्णन उपलब्ध होता है। (२) मृगशिरा-काल :- इस काल की सीमा ४००० ई०पू० से लेकर २५०० ई०पू० तक है। रचना के दृष्टिकोण से इस युग का सर्वाधिक महत्त्व है। इसी युग में ऋग्वेद के अधिकांश सूक्तों CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

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