वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंDigitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 76 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता की रचना हुई। (३) कृत्तिका-काल :- इस काल की सीमा २५०० ई०पू० से लेकर १४०० ई०पू० तक है। इसी युग में चारों मन्त्र संहिताओं का सम्पादन तथा तैत्तरीय संहिता एवं शतपथ ब्राह्मणादि कतिपय ब्राह्मण ग्रन्थों की रचना हुई। वस्तुतः मन्त्रों का निर्माण तो ६००० ई०पू० में ही आरम्भ हो गया था, परन्तु यज्ञीय दृष्टिकोण से उन मन्त्रों का परिमार्जन, परिष्कार तथा संकलन इसी काल में सम्पन्न हुआ- ‘‘It was at this time that the Saṁhitas were probably compiled into systematic books and attempts made to ascertain the meaning of the oldest hymns and formulae’’. (The Orion, Page 207) इसके अन्तिम भाग में वेदाङ्ग ज्योतिष की रचना हुई। इसमें सूर्य एवं चन्द्र के श्रविष्ठा के आदि में उत्तर दिशा की ओर घूम जाने का वर्णन है तथा यह स्थिति गणित के आधार पर लगभग १४०० ई०पू० के निकट होती है- ‘‘प्रपद्येते श्रविष्ठादौ सूर्याचन्द्रमसावुदक्। सर्वार्धे दक्षिणार्कस्तु माघ श्रवणवोः सदा॥’’ (४) अन्तिम काल :- इस काल की सीमा १४०० ई०पू० से लेकर ५०० ई०पू० तक है। इस काल में विशेष रूप से श्रौत-सूत्रों, गृह्य-सूत्रों तथा अन्य दर्शन सूत्रों का निर्माण हुआ। इसके अन्तिम भाग में वैदिक धर्म के विरुद्ध प्रतिक्रिया स्वरूप बौद्ध धर्म का उदय हुआ। अन्त में स्व० तिलक जी ने विचार प्रकट किया कि यदि वेदों का निर्माण काल ४००० ई०पू० स्वीकार कर लिया जाये तो भारतीय तथा पाश्चात्य विद्वानों के मतों का समन्वय हो जायेगा- ‘We can thus satisfactorily account for all the opinions and traditions current about the age of the Vedas amongst ancient and modern scholars in India and Europe if we place the Vedic period at about 4000 B.C. in strict accordance with the astronomical references and facts recorded in the ancient literature of India.’ तिलक की गणना प्रक्रिया :- ऋतु-चक्र, सूर्य-संक्रमण पर आधारित है। इसी के आधार पर ऋतुएँ आती जाती हैं। ऋतुएँ निरन्तर पीछे की ओर हट जाती हैं। प्रथम वर्ष का प्रारम्भ वसन्त से होता है। इस काल में वसन्त सम्पात क्रमशः जिन नक्षत्रों पर होता है, वे हैं- उत्तरा, CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar