भारतकोश
वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

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पृष्ठ 105

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri द्वितीय अध्याय 77 भाद्रपद, रेवती, अश्विनी, कृत्तिका, रोहिणी, मृगशिरा आदि। सम्प्रति वह मीन की संक्रान्ति से प्रारम्भ होता है। इस संक्रान्ति का प्रारम्भ पूर्वा भाद्रपद के चतुर्थ चरण से होता है। शनैः शनैः नक्षत्र क्रमशः पीछे की ओर हटते गए हैं। नक्षत्रों की कुल संख्या २७ है तथा सूर्य का संक्रमण चक्र ३६० डिग्री का है। इस प्रकार प्रत्येक नक्षत्र की ३६०/२७ = १३११ डिग्री दूरी प्राप्त होती है। प्रत्येक नक्षत्रकाल क्रमानुसार अपने मूल स्थान से हटता रहता है। एक डिग्री पीछे को हट जाने में एक नक्षत्र ७२ वर्ष का समय लेता है। अतः प्रत्येक नक्षत्र अपनी १३११ डिग्री की दूरी तय करने में कुल ७२×१३११= ९७२ वर्ष का समय लेता है। इस प्रकार निष्कर्ष यह निकला कि २५०० वर्ष पूर्व वसन्त-सम्पात हुआ होगा। तिलक जी को ऋग्वेद में कतिपय ऐसे मन्त्र भी उपलब्ध हुए हैं, जिनमें मृगशिरा नक्षत्र पर वसन्त-सम्पात होने का सङ्केत मिलता है। वे मन्त्र हैं- ऋग्वेद १/३३/१२, १/८०/७, १०/८६/५। यह वसन्त-सम्पात और भी आगे पुनर्वसु तक जाता है। कृत्तिका नक्षत्र, मृगशिरा नक्षत्र से दो नक्षत्र पूर्व तथा पुनर्वसु नक्षत्र से चार नक्षत्र पूर्व है। अतः मृगशिरा पर वसन्त-सम्पात का काल ९७२×२ = १९४४ वर्ष कृत्तिका नक्षत्र के वसन्त-सम्पात के काल से पूर्व होगा। इस प्रकार मृगशिरा नक्षत्र में वसन्त- सम्पात होने का काल ४४४४ ई० पहले है। इस प्रकार तिलक जी के अनुसार वेदों का निर्माण लगभग ४५०० वर्ष पूर्व हुआ होगा। अगर पुनर्वसु नक्षत्र में वसन्त-सम्पात को माना जाय तो इस रचनाकाल में २००० वर्षों की वृद्धि और हो जायेगी। (ग) डॉ० जैकोबी का मत :- डॉ० जैकोबी जर्मनी के बोन नगर के निवासी थे। इन्होंने भी ज्योतिषीय गणना के आधार पर ऋग्वेद का काल ४५०० ई०पू० निर्धारित किया है। उनका कथन है कि कल्पसूत्रों में आए विवाह प्रकरण में ध्रुव इवस्थिरा भव वाक्य का तात्पर्य है कि उस समय ध्रुवतारा अधिक चमकीला तथा स्थिर रहा होगा। यह स्थिति २००० ई०पू० सम्भव है। कृत्तिका नक्षत्र पर वसन्त-सम्पात का उल्लेख ब्राह्मण ग्रन्थों में मिलता है। अतः गणना करने पर यह समय लगभग २५०० ई०पू० का प्रतीत होता है। इस प्रकार ब्राह्मण ग्रन्थों तथा कल्प सूत्रों का समय २७०० ई०पू० से लेकर २५०० ई०पू० तक हो सकता है, इसलिये ऋग्वेद का समय इससे भी और पूर्व लगभग ४५०० ई०पू० होना चाहिये। (घ) हाग एवं आर्कविशप प्राट का मत :- हाग एवं आर्कविशप प्राट आदि विदेशी विद्वानों ने भी वेद काल निर्णय हेतु CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar