वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंDigitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 78 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता अपनी गणना का आधार ज्योतिष को ही बनाया है। सर्वप्रथम अपनी गणना द्वारा उन्होंने वेदाङ्ग ज्योतिष का रचना काल निर्धारित किया। यह समय ११८४ ई०पू० निश्चित किया। तत्पश्चात् इसी आधार पर ब्राह्मण ग्रन्थों का निर्माण काल १४०० ई०पू० से लेकर १२०० ई०पू० तक निश्चित किया। उनके अनुसार वैदिक संहिताओं का संकलन २००० ई०पू० से लेकर १४०० ई०पू० तक हुआ तथा मन्त्रों का रचना काल २४०० ई०पू०-२००० ई०पू० के लगभग रहा होगा। (च) पं० दीनानाथ शास्त्री चुल्लैट का मत :- पं० दीनानाथ शास्त्री चुल्लैट तथा उनके पुत्र पं० गोपीनाथ शास्त्री चुल्लैट ने भी वेद के निर्माण काल को निश्चित करने में ज्योतिष को ही अपनी गणना का आधार बनाया है। पं० दीनानाथ जी ने ज्योतिष के प्रमाण द्वारा वेदों का रचनाकाल आज से लगभग ३००००० वर्ष पूर्व निर्धारित किया है। यह निर्णय उन्होंने अपनी पुस्तक वेद- काल निर्णय में दिया है। इसी प्रकार पं० गोपीनाथ जी ने अपनी गणना अपनी पुस्तक युग-परिवर्तन में दी है। उनके अनुसार वर्तमान कला का २८वाँ कलियुग लगभग २४ वर्ष पूर्व समाप्त हो चुका है। सतयुग का आरम्भ सं० १९८१ में हुआ। यह २९वाँ सतयुग था। उनके विचार में एक चतुर्युगी १२ हजार वर्ष में पूरी होती है, न कि ४३ लाख २० हजार वर्ष में, जैसा कि अनेक विद्वान् मानते हैं। अतः गोपीनाथ जी शास्त्री के अनुसार वेदों का निर्माण काल लाखों वर्ष पूर्व ठहरता है किन्तु पाश्चात्य वेदज्ञ तथा तर्कप्रधान भारतीय वेदज्ञ इन विचारों से सहमत नहीं है। (छ) डॉ० लुडविग का मत :- जिन अनेक पाश्चात्य मनीषी तथा संस्कृत मर्मज्ञों ने वेद काल निर्णय का प्रशंसनीय प्रयास किया, उनमें डॉ० लुडविग का प्रयास भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं है। लुडविग जी ने भी वेदों के निर्माणकाल के सम्बन्ध में ज्योतिष का आधार ग्रहण किया। आपने इसके लिये सूर्यग्रहण को आधार मानकर इस प्रकार का एक प्रयत्न किया। ५- भाषा सम्बन्धी तथ्यों पर आधृत मत : कतिपय विद्वानों ने वेद काल निर्णय का आधार वेदों की भाषा को बनाया है। वस्तुतः भाषा ही किसी साहित्य का शरीर होती है। शरीर को देखकर शरीरधारी के समय का निर्णय दिया जा सकता है। तब निर्णय में यह विधि भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। भाषा पर आधृत मत निम्नलिखित है- क- ऋग्वेदीय भाषा एवं अवेस्ताँ की तुलना : ऋग्वेद की भाषा तथा अवेस्ताँ की सर्वप्राचीन गाथाओं की भाषा में परस्पर इतना अधिक साम्य है कि यदि वेद में उपलब्ध मंत्रों में कुछ ध्वनियों का परिवर्तन CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar