वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
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74 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता में विभक्त किया। वे भाग हैं— छन्द, मन्त्र, ब्राह्मण एवं सूत्र। उनका कथन है कि प्रत्येक भाग के विकास का एक निश्चित समय रहा होगा। सर्वप्रथम छन्दों, तत्पश्चात् मन्त्रों, तदुपरान्त ब्राह्मणों एवं उसके बाद सूत्रों की रचना हुई। मैक्समूलर के विचार में प्रत्येक विभाग के विकास में तथा उसकी पूर्णता के लिए २०० वर्षों का समय पर्याप्त है। गौतम बुद्ध का आविर्भाव काल विक्रम से लगभग ५०० वर्ष पूर्व हुआ। अतः सूत्र काल का प्रारम्भ ६०० वि० पूर्व माना गया है। इन सूत्रों में प्रमुख रूप से श्रौत सूत्रों तथा गृह्य सूत्रों की गणना की जाती है। इन सूत्रों की रचना से २०० वर्ष पूर्व अर्थात् ८०० वि० पूर्व ब्राह्मणों की रचना हुई। इस काल में ही याज्ञिक अनुष्ठानों का विस्तार तथा उपनिषदों के आध्यात्मिक सिद्धान्त का विवेचन हुआ। उससे २०० वर्ष पूर्व मन्त्रों की रचना हुई। वेदों को दो भागों में विभाजित किया जा सकता है— छन्द तथा मन्त्र। मन्त्रों का विनियोग यज्ञीय अनुष्ठानों में किया जाता है, शेष छन्द हैं। मन्त्रों का निर्माण तथा विकास उससे पूर्व के २०० वर्षों में अर्थात् १२०० ई० पूर्व में हुआ। ऋग्वेद में सर्वप्राचीन छन्द तथा मन्त्र हैं। इस प्रकार ऋग्वेद का काल १२०० वि० पूर्व हुआ। इस काल-गणना के विषय में मैक्समूलर पूरी तरह स्वयं भी सन्तुष्ट नहीं थे। उनके अनुसार यह समय निर्धारण तो मात्र सम्भावना पर आधारित है क्योंकि वेदों के समय को ठीक-ठीक निर्धारित करना असम्भव सा है। वेदों का अस्तित्व इसके पूर्व का भी हो सकता है। विल्सन, कीथ, कोलब्रुक आदि पाश्चात्य मनीषियों ने ऋग्वेद की रचना के काल निर्णय के विषय में मैक्समूलर का समर्थन किया है। ऋग्वेद के काल निर्णय के सम्बन्ध में अनेक विद्वानों ने मैक्समूलर की पद्धति को तो स्वीकार किया है, परन्तु प्रत्येक स्तर के विकास के लिए २०० वर्ष के समय को पर्याप्त नहीं माना है। सन् १८८९ ई० को भौतिक धर्म शीर्षक अपने जिफोर्ड व्याख्यानमाला के अवसर पर स्वयं मैक्समूलर ने स्पष्टतः अपने मत को एक अनुमान बतलाया तथा कहा कि विश्व की कोई भी शक्ति वेदों के काल को निर्धारित नहीं कर सकती है। ओल्डन वर्ग के अनुसार ऋग्वेद की रचना का काल २५०० ई० पूर्व का होना चाहिए। (४) ज्योतिष-सम्बन्धी तथ्यों पर आधृत मत :- वैदिक संहिताओं तथा ब्राह्मण ग्रन्थों में अनेक स्थलों पर ऋतु-सम्बन्धी एवं नक्षत्र-सम्बन्धी जानकारी प्राप्त होती है। कतिपय विद्वानों ने इन ऋतु एवं नक्षत्र विषयक जानकारी का उपयोग वेदों के रचना काल को निर्धारित करने के लिए किया है। उनमें से प्रमुख मत निम्नलिखित हैं—
CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar