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वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

पृष्ठ 109, कुल 353 में से

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पृष्ठ 109

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri द्वितीय अध्याय 81 तथा हित्ति जाति के देवों के साथ मितानि जाति के देवों में मित्र, वरुण, इन्द्र तथा नासत्यों के नाम प्राप्त होते हैं। ये लेख १४०० ई०पू० के हैं। इसका तात्पर्य यह हुआ कि इस समय से अत्यधिक पूर्व काल में आर्यों ने आर्यावर्त में अपने वैदिक धर्म तथा वैदिक देवताओं की कल्पना कर रखी थी। इन्हीं आर्यों की एक शाखा पश्चिमी एशिया से भारतवर्ष में आकर रहने लगी। यहीं पर उस शाखा ने अपने देवगणों तथा धर्म का अत्यधिक प्रचार किया। अतः इसी आधार पर आधुनिककालीन पाश्चात्य वेदज्ञ वेदों का काल २००० ई०पू० से लेकर २५०० ई०पू० तक निर्धारित करते हैं। इसी प्रकार वेदों के रचनाकाल को निर्धारित करने में अनेक विद्वानों ने मोहनजोदाड़ों तथा हड़प्पा में प्राप्त अभिलेखों तथा सभ्यता का आश्रय ग्रहण किया है। इन विद्वानों ने वैदिक सभ्यता को ग्रामीण सभ्यता माना है तथा सिन्धु घाटी की सभ्यता को विकसित नागरिक सभ्यता माना है। अतः नागरिक सभ्यता से ग्रामीण सभ्यता को पुरातन् सिद्ध करते हुए वेदों का काल ३००० वर्ष ईसा पूर्व निश्चित किया है। अनेक विद्वान् इस विचार से सहमत नहीं हैं कि वैदिक सभ्यता ग्रामीण थी तथा सिन्धु घाटी की सभ्यता से निम्न थी। अतः यह मत मान्य नहीं है। ८- भूगर्भ सम्बन्धी तथ्यों का आधृत मत : ऋग्वेद में भूगोल एवं भूगर्भ सम्बन्धी अनेक घटनाएँ उल्लिखित हैं जिनका आधार लेकर ऋग्वेद के काल को निर्धारित किया जा सकता है। अनेक विद्वानों ने ऐसा किया भी है। इनमें नारायण राव भवनराव पारंगी तथा अविनास चन्द्र व्यास आदि प्रमुख हैं। इनके मत को नीचे प्रस्तुत किया गया है— क- डॉ० अविनाश चन्द्र व्यास का मत : डॉ० व्यास ने अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ ऋग्वैदिक इण्डिया में भूगर्भ शास्त्र तथा भूगोल के प्रमाणों के आधार पर ऋग्वेद का निर्माण काल ईसा से २५ हजार वर्ष पूर्व निश्चित किया है। इनके द्वारा किये गये प्रमुख प्रमाण निम्नलिखित हैं— (१) ऋग्वेद में सरस्वती नदी के समुद्र में गिरने का उल्लेख प्राप्त होता है— 'एका चेतत् सरस्वती नदीनाम्, शुचिर्यती गिरिभ्यः आ समुद्रात्।' (ऋ० ७/९५/२) (२) यह समुद्र उस समय राजस्थान में स्थित था। किसी भयंकर भूकम्प ने समुद्र तथा सरस्वती दोनों को नष्ट कर दिया, अतः दोनों लुप्त हो गए। (३) आर्यों के निवासस्थान सप्त सैन्धव प्रदेश के चतुर्दिकू चार समुद्र विद्यमान थे, जहाँ सम्प्रति उत्तर प्रदेश तथा बिहार है। वहाँ पर उस समय पूर्वी समुद्र की स्थिति CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

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