वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
पृष्ठ 147, कुल 353 में से
संदर्भ में पढ़ेंDigitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri द्वितीय अध्याय 119 लौकिक सूक्त :- दशममण्डल के अनेक सूक्तों में लौकिक व्यवहार से सम्बन्धित विषयों का मनोरंजक प्रतिपादन हुआ है। इन सूक्तों में अनेक सूक्तों का प्रतिपाद्य यक्ष्मा का नाश है। इसके लिये विशेष रूप से १६१वाँ तथा १६३वाँ सूक्त उल्लेखनीय है। १६२वें सूक्त में गर्भ के बाधक राक्षसों के विघ्नों के रक्षा व प्रबन्ध वर्णित हैं। यह सूक्त रक्षोहा के नाम से प्रख्यात है। ऋग्वेदीय दशममण्डलान्तर्गत १४५वें सूक्त में पत्नी द्वारा पति को प्राप्त करने का वर्णन है— इ॒मां ख॑ना॒म्योर्ष॑धिं वी॒रुधं॑ ब॒लव॑त्तमाम्। यया॑ स॒पत्नीं॑ बाध॑ते॒ यया॑ सं॒विन्द॑ते॒ पति॑म्॥१॥ (ऋ०सू० १०/१४५/१) अर्थात् मैं इस पौधे रूप अथवा विपरीतता से अवरुद्ध करने वाली अथवा विशेष की अवरोधक औषधि का खनन करती हूँ, जिससे सौत बाधा प्रदान करती है, जिससे वह पति को प्राप्त कर लेती है। इस मन्त्र में पतिकाम नारी द्वारा सपत्नी को हटाकर स्वयं अनुरूप पति पाने का वर्णन है। एक सूक्त में शत्रुओं के पलायनार्थ प्रार्थना की गई है— ऋ॒षभं मां समा॒नानां॑ स॒पत्नी॑नां विषास॒हिम्। ह॒न्तारं॒ शत्रू॑णां कृ॒धि वि॒राजं॒ गोप॑तिं ग॒वाम्॥१॥ (ऋ०१०/१६६/१) अर्थात् हे परमात्मा! मुझे एक समान आदरणीयों में श्रेष्ठ तथा शत्रुओं को विशेषतः परास्त करने में समर्थ, प्रहार करने वाले शत्रुओं का नाशक, पृथ्वियों के पृथ्वीपति तथा विशेष कान्ति सम्पन्न विभिन्न देशों का शासक बना। इस प्रकार यहाँ पर शत्रुओं को परास्त करके स्वयं शासक बनने की अभिलाषा से प्रार्थना की गई है। १०/५८ सूक्त मन आवर्तन सूक्त के नाम से प्रसिद्ध है। इस सम्पूर्ण सूक्त में भूमि, आकाश, सागर, उषा, पहाड़ तथा संसार भर में भ्रमण करने वाले मन को लौट आने के लिए प्रार्थना की गई है। यथा- CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar