भारतकोश
वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

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पृष्ठ 148

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 120 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता यत्त॑ य॒मं वै॑वस्व॒तं मनो॑ ज॒गाम॑ दू॒रकम्। त॒त्त आ व॑र्तयामसी॒ह क्षया॑य जी॒वसै॑ ॥१॥ (ऋ० १०/५८/१) अर्थात् हे मानस रोगी! जो तेरा यह मन अन्तरतम कल्पना से अत्यन्त दूर चला गया है, तुम्हारे उसको भी हम लोग यहाँ निवास करने तथा जीवन लाभार्थ पुनः लौटाते हैं। १०/९७ सूक्त की ओषधि सूक्त संज्ञा है। इसमें अनेक रोगों के नाश करने में समर्थ विभिन्न लाभदायक औषधियों का निरूपण हुआ है। इस मन्त्र में विभिन्न ओषधियों का स्पष्ट संकेत किया गया है- याः फ॒लिनी॒र्या अ॑फ॒ला अ॑पु॒ष्पा याश्च॑ पु॒ष्पिणी॑:। बृह॒स्पति॑प्रसूतास्ता नो॑ मुञ्चन्त्वं॒हस॑: ॥१५॥ (ऋ० १०/९७/१५) अर्थात् जो फल सम्पन्न हैं, जो फलहीन हैं, जो पुष्पहीन तथा पुष्पसम्पन्न हैं, वे रवि से एवं विद्वत्जनों द्वारा प्रदत्त अथवा निर्मित होकर हमें पापयुक्त कष्टों या दुःखों से छुटकारा प्रदान करें। अतः आयुर्वेद के दृष्टिकोण से इस सूक्त का विशेष महत्त्व है। कतिपय सूक्तों में राजनीतिक विषयक चर्चा दृष्टिगत होती है। इन सूक्तों में राजा की प्रशंसा में अनेक मन्त्र प्राप्त हैं। इनसे ज्ञात होता है कि उस युग में राजा का निर्वाचन होता था- अ॒भि त्वा॑ दे॒वः स॑वि॒ताभि सोमो॑ अवीवृतत्। अ॒भि त्वा॒ विश्वा॑ भू॒तान्य॒भीव॒र्तो य॑थास॑सि ॥३॥ (ऋ० १०/१७४/३) अर्थात् हे महाराज! सूर्य देवता एवं चन्द्र देवता आपको आगे बढ़ावें अर्थात् नैसर्गिक शक्तियाँ आपके अनुकूल हों। समस्त प्राणिवर्ग तथा सभी प्राकृतिक पदार्थ तुम्हें आगे बढ़ावें, विजयी बनावें, जिस प्रकार से तुम विजय प्राप्त करों। इस प्रकार हम देखते हैं कि आजकल जिस समाज शास्त्र (Sociology) की सर्वत्र धूम है, चर्चा है, उसका ऋग्वेद में स्पष्ट दिग्दर्शन है। इस वैदिक बन्धुभाव की ओर वैज्ञानिकों का ध्यान आकृष्ट नहीं होता। वैदिक समाजवाद वस्तुतः मानवतावाद है, CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar