वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
पृष्ठ 149, कुल 353 में से
संदर्भ में पढ़ेंDigitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri द्वितीय अध्याय 121 जिसमें एक क्षण, एक वर्ष, एक जीवन नहीं बल्कि विशाल जीवन तथा समग्र समाज पर दृष्टि है। वैदिक सामाजिक विज्ञान दृष्टि को संकुचित नहीं अपितु विशाल बनाता है। दार्शनिक सूक्त :- ऋग्वेद में कतिपय दार्शनिकसूक्त भी प्राप्त होते हैं, जिनमें दार्शनिक विचारों का स्पष्ट उल्लंघन हुआ है। इन सूक्तों में आत्मा-परमात्मा, सुख-दुःख, सृष्टि की उत्पत्ति एवं ब्रह्मादि विषयों के सम्बन्ध में वैदिक ऋषियों के विचारों का स्पष्टीकरण है। अतः ये सूक्त अपनी दार्शनिक गम्भीरता तथा नूतन कल्पना के कारण विख्यात हैं। इस प्रकार के प्रमुख सूक्त निम्नलिखित हैं- (अ) नासदीय सूक्त (१०/१२९) (ब) पुरुष सूक्त (१०/९०) (स) हिरण्यगर्भ सूक्त (१०/१२१) (द) वाक्सूक्त (१०/१४५) पुरुषसूक्त को सर्वेश्वरवाद का स्थापक कहा जा सकता है। यह सूक्त अत्यन्त महनीय, गम्भीर तथा अन्यतम है। इसमें पुरुष के आध्यात्मिक स्वरूप का भव्य निदर्शन है। पुरुष के सम्बन्ध में सर्वाधिक विलक्षण बात तो यह है- पु॒रुष॑ ए॒वेदं सर्वं॒ यद्भू॒तं यच्च॒ भव्य॑म्। उ॒तामृ॑त॒त्वस्येशा॑नो॒ यदन्ने॑नाति॒रोह॑ति॥२॥ (ऋ० १०/९०/२) अर्थात् यह समस्त दृश्यमान वर्तमान विश्व पुरुष ही है। भूतकालीन तथा भविष्यकालीन विश्व भी पुरुष ही है और वह पुरुष देवों का या अमरत्व का स्वामी है, जो पुरुष अन्न अर्थात् प्राणियों के भोग्य पदार्थों के कारण बढ़ता है। यह वेदों में वर्णित सर्वेश्वरवाद का सिद्धान्त पाश्चात्य विद्वानों के अनुसार आर्यों के प्रौढ़ तत्त्वचिन्तन का द्योतक है। ऋग्वेद में एक संसार के नियामक की कल्पना की गई है, जिसे सामान्यतया हिरण्यगर्भ, प्रजापति तथा पुरुष की संज्ञा से सम्बोधित किया गया है। इस सूक्त का द्रष्टाऋषि वस्तुतः निर्णय नहीं कर पाता कि किस देव का हवि से पूजन किया जाये। हिर॑ण्यग॒र्भः सम॑वर्त॒ताग्रे॑ भू॒तस्य॑ जा॒तः पति॒रेक॑ आसीत्। स दा॑धार पृथि॒वीं द्यामु॒तेमां कस्मै॑ दे॒वाय॑ ह॒विषा॑ विधेम॥ (ऋ० १०/१२१/१) CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar