वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
पृष्ठ 150, कुल 353 में से
संदर्भ में पढ़ेंDigitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 122 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता अर्थात् परमात्मा का वह हिरण्यमयगर्भ रूप सर्वप्रथम अर्थात् सृष्टि की उत्पत्ति से भी पूर्व उत्पन्न हुआ था। उत्पन्न होते ही वह समस्त प्राणिवर्ग का एकमात्र स्वामी हो गया। वह पृथ्वी तथा द्युलोक को धारण किये हुए हैं। हम हवि के द्वारा ऐसे किस देव का पूजन करें? उक्त समस्त सूक्तों में दर्शन प्राप्त होता है, किन्तु दर्शन की पराकाष्ठा की उपलब्धि नासदीय सूक्त में होती है। इसमें ऋषि इस संसरणशील विश्व के मूल पर विचार करता है और वहाँ न पहुँचकर न प्रकाश को पाता है और न अन्धकार की सत्ता का दर्शन करता है और न अभाव का। इस सूक्त का मन्त्रद्रष्टऋषि जगत् की प्रारम्भिक स्थिति का वर्णन करता हुआ कहता है— न मृत्यु॑रासीद॒मृतं॒ न तर्हि॒ न रात्र्या॒ अह॑ आसीत्प्रके॒तः। आनी॑दवा॒तं स्व॒धया॒ तदेकं॒ तस्मा॑द्धा॒न्यन्न परः किंच॒नास॑।। (ऋ० १०/१२९/२) अर्थात् "उस प्रलय काल में मृत्यु का अभाव था तथा अमृत का भी अभाव था। दिन का एवं रात्रि का ज्ञान भी नहीं था। वह ब्रह्मतत्त्व प्राण से युक्त, अपनी क्रिया से रहित तथा माया के साथ अविभाजित रूप में विद्यमान था। उस माया सहित ब्रह्म से भिन्न कुछ नहीं था और उससे परे भी कुछ नहीं था।" उपर्युक्त सूक्तों में निहित दर्शन स्वच्छ, विशद तथा स्पष्ट है। इसे समझना सुकर है, अधिक कठिन नहीं। ऋग्वेदीय प्रहेलिकाएँ :- ऋग्वेद के प्रथम मण्डलान्तर्गत १६४वें सूक्त में ऋग्वेदीय प्रहेलिकाओं के दर्शन होते हैं। इसके मन्त्रों में निगूढ़स्थित दर्शन का तो आभास लेना भी दुष्कर है। यह अस्यवामीय सूक्त कहकर पुकारा जाता है क्योंकि इस सूक्त का आरम्भ 'अस्य वामस्य पलितस्य होतुः' इन शब्दों के साथ होता हैं। ये रचनाएँ अधिकतर दुर्ज्ञेय तथा दुर्बोध्य हैं। यथा— स॒प्त यु॑ञ्जन्ति॒ रथ॒मेक॑चक्र॒मेको॒ अश्वो॑ वहति स॒प्तना॑मा। त्रि॒नाभि॑ च॒क्रम॒जर॒मन॑र्वं॒ यत्रेमा विश्वा॒ भुव॑नाधि॒ तस्थुः॑।। (ऋ० १/१६४/२) अर्थात् जहाँ एक समस्त कलाओं के भ्रमणार्थ जिसमें चक्कर है, उस विमानादि यान को सप्तनामों वाला एक अश्व तथा सात अश्व तथा अश्व के सात विभिन्न रूप CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar