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वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

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पृष्ठ 151

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द्वितीय अध्याय 123 अथवा शीघ्रगामी वायु या अग्नि पहुँचाता है। अथवा जहाँ सात कलों के गृह युक्त होते हैं या जहाँ ये समस्त लोक लोकान्तर अधिष्ठित होते हैं, वहाँ प्राकृत प्रसिद्ध घोड़ों से रहित और जीर्णता से रहित तीन जिसमें बन्धन हैं, उस एक चक्कर को शिल्पी जन स्थापित करें। इसी प्रकार प्रहेलिकाओं के सम्भावित विभिन्न उत्तरों की अनेक परिकल्पनाएँ की गई है। कुछ ऋचाएँ ऐसी भी प्राप्त होती हैं जिनका अर्थ विंटरनिट्ज़ के मतानुसार कथमपि स्पष्ट हो जाय, यह असम्भव ही है। इस प्रकार की दुरूह ऋचाओं में से दो ऋचाएँ उदाहरण स्वरूप निम्नलिखित है— १. ति॒स्रो मा॒तॄंस्त्रीन्पि॒तॄन्बिभ्र॒देक॑ ऊ॒र्ध्वस्त॑स्थौ॒ नेमव॑ ग्लापयन्ति। मन्त्रय॑न्ते दि॒वो अ॒मुष्य॑ पृ॒ष्ठे वि॑श्व॒विदं॒ वाच॑मवि॒श्वमि॑न्वाम्॥ (ऋ० १/१६४/१०) २. द्यौर्मे॑ पि॒ता ज॑नि॒ता नाभि॒रत्र॒ बन्धु॑र्मे मा॒ता पृ॑थि॒वी म॒हीयम्। उ॒त्ता॒नयो॑श्च॒म्वो॒३र्योनि॑र॒न्तरत्रा॑ पि॒ता दु॑हि॒तुर्गर्भ॒माधा॑त्॥ (ऋ० १/१६४/३३) इसी प्रकार सारा सूक्त पहेलियों का पुलिन्दा है, अटकलों का भण्डार है, सम्भावनाओं की पिटारी है तथा परतम दर्शन का कूजा है। इन मन्त्रों की सर्वमान्य प्रामाणिक व्याख्या न हो पाई है तथा न ही आगे कभी होने की सम्भावना ही है। ये प्रहेलिकात्मक समस्याएँ पुरातन काल में अत्यधिक लोकप्रिय थी। इनका क्वचित् यज्ञादि के अवसर पर विधि के रूप में प्रयोग हुआ है। इस प्रकार की प्रहेलिकाएँ यजुर्वेद तथा अथर्ववेद में भी उपलब्ध होती हैं किन्तु उन प्रहेलिकाओं में विषय तथा उद्देश्य का पार्थक्य स्पष्ट परिलक्षित होता है। धर्मरहित काव्य :- ऋग्वेद में धर्महीन काव्य अनेक स्थलों पर धार्मिक तथा याज्ञिक कविताओं के साथ मिल गया है किन्तु किसी-किसी सूक्त का प्रयोग आद्योपान्त धर्महीन विषय को लेकर ही हुआ है। इस प्रकार का एक सूक्त दशम मण्डल में उपलब्ध होता है। यह ३४वाँ सूक्त है, इसमें द्यूत की महिमा का गुणगान है। भोग, विलास तथा शक्ति के उदय में जुआँ पनप उठता है। इस सूक्त में जुएँ का फड़कता चित्रण है। इन ऋचाओं में स्वाभाविकता की मार्मिक अभिव्यंजना है, भावों की कलात्मकता का निखार है। इस सूक्त का संक्षिप्त विषय इस प्रकार है—

CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar