वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंDigitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 124 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता जुआरी जुएँ के दाँव पर अपनी पत्नी तक को रखकर दाँव हार जाता है। अतः वह जुएँ के नशे में अन्धा होकर बच्चों की प्रिय, मित्रार्थ, कल्याणकारी तथा स्वयं के लिये शरणदाता पत्नी को घर से निकाल देता है। हारे हुए जुआरी का कोई भी साथ नहीं देता। सास उसे तिरस्कृत कर देती है तथा पुत्री बहिष्कृत कर देती है। उसे कोई भिक्षा भी नहीं देता। जुए में हार जाने पर अन्य लोग उसकी पत्नी का उपभोग करते हैं। माता-पिता, भगिनी-भ्राता उसे अपना रक्त स्वीकार नहीं करते। वह जुएँ न खेलने का निश्चय करता है, किन्तु मित्रगण व्यङ्ग्य बाणों का प्रहार करते हैं। वस्तुतः पासों में विचित्र आकर्षण है। न चाहने पर भी जुआरी इनके समीप पहुँच जाता है। ये अत्यन्त बलवान् हैं। राजा तथा रंक समान रूप से इनके वशीभूत हैं। ये गिरते तो नीचे हैं परन्तु फुदकते ऊपर हैं। ये अंगारों के सदृश है, अतः शीतल होते हुए भी हृदय को विदग्ध करते हैं। जुआरी की पत्नी पीड़ित होकर सोती रहती है। माता बेबस रहती है, ऐस परिस्थिति में जुआरी ऋण हेतु दूसरों के समाने हाथ फैलाता है। दूसरों की सजी- धजी पत्नियों तथा घर की शोभा को देखकर जुआरी को ग्लानि तथा ईर्ष्या होती है। अन्ततः द्यूतकार निम्नलिखित मन्त्र में अपनी मुक्ति हेतु अक्ष की प्रार्थना करता है तथा सविता के आज्ञानुसार द्यूत-त्याग की कामना करता है— अ॒क्षैर्मा दीव्यः॑ कृ॒षिमित्कृ॑षस्व वि॒त्ते र॑मस्व ब॒हु मन्य॑मानः। तत्र॒ गावः॑ कितव॒ तत्र॑ जा॒या तन्मे॒ वि च॑ष्टे सवि॒तायम॒र्यः॥१३॥ (ऋ० १०/३४/१३) अर्थात् हे कितव! तू पासों से मत खेल, अपितु खेती का काम किया कर, परिश्रम से भूमि में कृषि कर तथा उसी को अत्यधिक समझता हुआ प्राप्त सम्पत्ति में आन्दोपलब्धि कर। हे कितव! उसी कार्य में तेरी गौएँ तथा पत्नी को गृहसुख प्राप्त होता है। यह सबका प्रेरक जगदीश मुझ उपासक को उसी का उपदेश करने को कहता है। अभिचार विधान :- कतिपय वैवाहिक आशीर्वादात्मक वचन अभिचार-विधानों में ग्रन्थित हैं। इन अभिचार सम्बन्धी मन्त्रों में भावी पति को हानि पहुँचाने वाले तथा भूतापसारक विधियों द्वारा भूतों से नव-वधू की रक्षा करने वाले नुस्खों का विवेचन है। समग्र ऋग्वेद में लगभग तीस अभिचार सूक्त प्राप्त होते हैं। इन अभिचार सम्बन्धी मन्त्रों में व्याधियों के उपशमनाथं, गर्भ रक्षार्थ, कुदृष्टियों, अपशकुनों तथा दुःस्वप्नों के प्रभाव के समाप्ति हेतु, शत्रुओं के विनाशार्थ विधियों तथा प्रार्थनाओं का संग्रह है। CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar