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वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

पृष्ठ 146, कुल 353 में से

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पृष्ठ 146

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 118 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता में तथा कथासरित्सागर में इस कथानक का सांकेतिक दर्शन उपलब्ध होता है। यह आख्यान ब्राह्मणग्रन्थों में भी प्राप्त होता है। इस कथानक के प्रयोग का सबसे सफल प्रयास महाकवि कालिदास ने किया है। कालिदास का नाटक विक्रमोर्वशीय इसी कथानक पर आधारित है। वेदों में अति संक्षिप्त रूप में प्राप्त इस पुरूरवा उर्वशी के सम्वाद सूक्त को कविता कामिनी के विलास कालिदास ने अपनी काव्य प्रतिभा के बल पर रोचक रूप में प्रस्तुत किया है। संवाद सूक्तों के लिए इससे अधिक महत्त्व की बात अन्य क्या हो सकती है कि अनेक पाश्चात्य तथा पौरस्त्य विद्वान नाटकों की उत्पत्ति इन्हीं संवाद सूक्तों से मानते हैं। उनके अनुसार इन्हीं संवाद-सूक्तों में नाट्य के बीज अन्तर्निहित है। कालान्तर में इन्हीं बीजों के अंकुरित होने से नाट्यकला का विकास हुआ। जर्मन विद्वान् डॉ० श्रोदर के अनुसार संवाद सूक्त गायन एवं नर्तन के साथ अभिनीत किया जाते थे। ये स्वयं धार्मिक नाटक है। इनका यज्ञादि अवसरों पर गायन, नर्तन तथा वादन के साथ अभिनय किया जाता था। डॉ० हर्टल के अनुसार सम्वाद-सूक्तों में गायनार्थ एक से अधिक व्यक्ति नियोजित किये जाते थे क्योंकि एक व्यक्ति के द्वारा कथनोपकथन सम्भव नहीं। अतः ये सूक्त ही नाटकों के मूल स्रोत हैं। डॉ० कीथ का मत इसके विपरीत है। उनके अनुसार ऋग्वेद में उपलब्ध इन सम्वाद-सूक्तों का मात्र शंसज्ञ ही होता था क्योंकि ये सम्वाद-सूक्त विभिन्न प्रकार के होते हैं किन्तु पुरातत्त्व विचार है, तो किसी में ऐतिहासिक घटना वर्णित है, मूलतः इनका विषय व्यावहारिक है। डॉ० विण्डिश थोल्डन वर्ग तथा पिशेलादि विद्वानों ने इन सम्वाद सूक्तों के स्वरूप का विवेचन कुछ पृथक् ढंग से किया है। उनके अनुसार ये सम्वाद सूक्त गद्य पद्यात्मक थे जिसमें व्याख्यात्मक गद्यांश का लोप हो गया तथा ललित पद्यांश ही रह गया। इन विद्वानों ने इन्हें आख्यान की संज्ञा प्रदान की है। डॉ० विशेल का मत है कि नाटकों में गद्य पद्य दोनों का होना इन सम्वाद सूक्तों का स्पष्ट अनुकरण है। इन सम्वाद सूक्तों से तत्कालीन लोक साहित्य तथा समाज की झलक मिलने के कारण इनका महत्त्व और भी बढ़ जाता है। यम-यमी के सम्वाद से वैदिक काल की नैतिकता का ज्ञान होता है। पुरुरवा-उर्वशी सम्वाद में विद्याधर योनि के पात्रों का चित्रण होने से उसमें अद्भुत कथा के तत्त्वों का समावेश है। इन ऋग्वेदीय सम्वादों में अलौकिक विषयों का वर्णन, मोक्ष प्राप्ति की अभिलाषा के अतिरिक्त दीर्घायु, ऐश्वर्य तथा सन्तान-प्राप्ति की प्रार्थनाएँ भी विद्यमान हैं। इन आख्यानों में स्वर्ग प्राप्ति से अधिक भौतिक आवश्यकता तथा सम्पत्ति को प्राप्त करने वाली प्रार्थनाएँ हैं। इस प्रकार ऋग्वेदीय सम्वाद सूक्तों का महत्त्व बहुविध है। CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar