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वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

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द्वितीय अध्याय 117 इमा गाव॑: सरमे या ऐच्छ॑: परि॑ दिवो अन्ता॑न्त्सुभगे॒ पत॑न्ती। कस्त॑ एना॒ अव॑ सृजा॒दय॑र्ध्युत्यास्माक॒मायु॑धा सन्ति ति॒ग्मा।। (ऋ० १०/१०८/५) अर्थात् हे सौभाग्यशालिनी सरमे! द्युलोक के सुदूर प्रदेशों से आगमन करती हुई तुम जिन गायों की अभिलाषा करती हो, वे गायें यह हैं। इन गायों को बिना युद्ध किए भला कौन निकाल कर (छीन कर) ले जा सकता है और हमारे शस्त्र भी तीव्र हैं। उसे प्रलोभन देते हुए पणिगण आगे कहते हैं कि हे सुभग सरमा! तुम्हारी गायों को हम लोग आपस में बाँट लेंगे— ए॒वा च॒ त्वं सर॑म आज॒गन्थे प्रबा॑धिता॒ सह॑सा॒ दैव्ये॑न। स्वसा॑रं त्वा कृणवै॒ मा पुन॒र्गा अप॑ ते॒ गवां॑ सुभगे भजाम।। (ऋ० १०/१०८/९) अर्थात् हे सरमा देवों के बल से पीड़ित होती हुई ही तुम यदि यहाँ हम लोगों के बलपुर में आ गई हो तो तुमको हम अपनी बहन बना लेते हैं। तुम पुनः वापस मत जाओ। हे सौभाग्यशालिनी सरमे! हम तुम्हारे साथ गायों का बँटवारा कर लेते हैं। सरमा-पणि सम्वाद में कुल ११ मन्त्र हैं। इन मन्त्रों में १, ३, ५, ७, ९ अर्थात् विषम संख्या के मन्त्रों में पणियों का कथन है तथा २, ४, ६, ८, १०, ११ अर्थात् सम संख्या के मन्त्रों में सरमा के उत्तर हैं। भारतीय साहित्य में संवाद-सूक्तों का महत्त्व :- ऋग्वेद के सम्वाद सूक्तों के सदृश अन्य रचनाएँ भारतीय साहित्य में अनेक स्थानों पर प्राप्त होती हैं। महाभारत, पुराणों तथा विशेषकर बौद्धसाहित्य में सम्वाद प्रधान तथा कथोपकथन प्रधान अर्द्धमहाकाव्यीय तथा अर्द्धनाटकीय रचनाएँ प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होती हैं। ये प्राचीन सम्वाद-सूक्त महाकाव्य तथा नाटक दोनों प्रकार की साहित्यिक विधाओं के उद्गम स्थल हैं। इनमें नाटकीय तत्त्वों का पूर्ण समावेश दृष्टिगोचर होता है। ऋग्वेद के अनेक सम्वाद-सूक्तों ने परवर्ती संस्कृत साहित्य की कथावस्तु के रूप में प्रचुर सामग्री प्रदान की है। इस प्रकार के सम्वाद-सूक्तों में पुरुरवा-उर्वशी सम्वाद विशेष उल्लेखनीय है। पुरुरवा तथा उर्वशी की कथा का भारतीय साहित्य में बारम्बार विभिन्न स्थानों पर प्रयोग दृष्टिगोचर होता है। कृष्ण व यजुर्वेद की काठक शाखा में बौद्धायनश्रौतसूत्र में ऋग्वेद पर सर्वानुक्रमणी पर सद्गुरुशिष्य की टीका में महाभारत के परिशिष्ट स्वरूप हरिवंशपुराण में, विष्णुपुराण

CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar