वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri द्वितीय अध्याय 83 अन्तर किया है। इस पर भी इतना तो अवश्य निश्चित है कि वेद विश्व का अति प्राचीन साहित्य है। इनके अर्थों का पूर्णतः सत्य समझना न केवल विदेशियों के लिए अपितु भारतीय वेदज्ञों के लिये भी एक कठिन कार्य रहा है। भारतीय विचारधारा वेदों को नित्य तथा अपौरुषेय मानकर इनके काल के सम्बन्ध में विचार नहीं करती, किन्तु यह भी निश्चित है कि शीघ्र ही किसी दिन मानविकी के अध्येता इस समस्या को प्रामाणिक ढंग से अन्तिम रूप से सुलझा कर ही मानेंगे। CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri चतुर्थ वेदों की शाखाएँ वैदिकवाङ्मय में 'शाखा' शब्द अत्यधिक प्रचलित है। यह शब्द आजकल के नवीन प्रचलित शब्द 'संस्करण' के अत्यधिक निकट जान पड़ता है। प्राचीन काल में गुरु अपने शिष्यों को वेद का मौखिक ज्ञान कराता था, वह शिष्य अपने शिष्यों को गुरु सदृश पुनः वेद का ज्ञान कराता था। इस प्रकार वेद सम्बन्धी ज्ञान का हर पीढ़ी में नया संस्करण हो जाता था। वस्तुतः वेदों से सम्बन्धित साहित्य को अक्षुण्ण बनाए रखने में इन ब्राह्मण-वंशों का योगदान श्लाघनीय है। उन पुरातन ब्राह्मणवंशों में परम्परा से इस कार्य हेतु जो अभिधान प्रचलित हुआ वह 'शाखा' कहलाता है। शाखाएँ :- आर्य समाज के प्रवर्तक महर्षि दयानन्द के मतानुसार शाखाएँ वेद का मूल नहीं हैं अर्थात् वास्तविक वेद नहीं है। ये तो संहिताओं के प्रवचन मात्र हैं। जिस प्रकार किसी वृक्ष की मूल शाखाएँ तथा उन शाखाओं पर पत्र, पुष्प तथा फलादि की उत्पत्ति होती है, उसी प्रकार वैदिकवाङ्मय रूपी वृक्ष का मूल तो चार वेद ही हैं- ऋक्, यजुः, साम एवं अथर्व, किन्तु शाखाएँ अनेक हैं; यथा- शाकल, वाष्कल, वाजसनेय, मौद तथा पैप्पलाद आदि। वृक्ष के मूल से ही विभिन्न शाखाओं के उत्पन्न होने के सदृश ये शाखाएँ भी मूल वेदों से उत्पन्न हुईं। इस बात की पुष्टि व्यासजी ने भी महाभारत में की है। अपने ग्रंथ महाभारत में उन्होंने लिखा है कि- अपान्तरतमा नाम सुतो वाक्सम्भवः प्रभोः। तेन भिन्नास्तदा वेदाः मनोः स्वायंभुवेन्तरे। (३४५.४२, शान्तिपर्व) अर्थात् वाग्देवी सरस्वती के सुत अपान्तरतमा ने स्वायंभुव मनवन्तर में मूल वेदों को शाखाओं में विभाजित किया। कवि जैमिनि ने भी अपनी 'पूर्वमीमांसा' में लिखा है कि 'आख्या प्रवचनात्' (१/१/३०) अर्थात् 'शाखा' अभिधान का हेतु प्रवचन ही है। जिस प्रकार वृक्ष की शाखाएँ, मूल का उपबृंहण होती है, उसी प्रकार वैदिक शाखाएँ भी मूल वेद-वृक्ष का उपबृंहण है तथा उपबृंहण शब्द प्रवचन एवं व्याख्या शब्दों का पर्याय भी है। महाभाष्यकार पतञ्जलि के अनुसार 'वेद' तो ईश्वरीय ज्ञान है। उनके मन्त्रों को प्राचीन ऋषियों ने लिखा नहीं है, अपितु अपने ध्यान नेत्रों से ईश्वरकृत मन्त्रों का CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri द्वितीय अध्याय 85 साक्षात्कार किया है। किन्तु शाखाओं के साथ यह बात नहीं है। वेद तो अपौरुषेय है किन्तु शाखाएँ पौरुषेय हैं। पतञ्जलि का कथन है कि- “न नु चोक्तं नहि छन्दांसि क्रियन्ते। नित्यानि छन्दासीति। यद्यप्यर्थोनित्यः यत्त्वसौवर्णानुपूर्वीऽसावनित्या। तद्भेदाच्च एतद्भवति काठकं, कापालकं, मौदकं, पैप्लादकं” अर्थात् वेद न तो कहे गए और न बनाए ही गए। वेद तो नित्य हैं। किन्तु जो वर्णानुपूर्वी है वह अनित्य है और वही काठक, कापालक, मौदक तथा पिप्पलाद आदि भेदों में दृष्टिगत होता है। यह भेद मन्त्रपाठ की विभिन्न विधियों में दृष्टिगोचर होता है। याज्ञिक अनुष्ठानों के समुचित सम्पादन के लिए संहिताओं का सङ्कलन हुआ। इस वैदिक पठन-पाठन को नष्ट न होने की दृष्टि से व्यासजी ने अपने चार प्रमुख शिष्यों को पढ़ाया। यह बात भागवत के अन्तर्गत स्पष्ट की गई है— ‘तत्रर्ग्वेदधरः पैलः सामगो जैमिनिः कविः॥ वैशम्पायन एवैको निष्णातो यजुषामृत। अथर्वाङ्गिरसामासीत् सुमन्तुर्दारुणो मुनिः॥’ ( भागवत १/४/२२) अर्थात् ऋषि ‘पैल’ को ऋग्वेद, कवि ‘जैमिनि’ को सामवेद, ‘वैशम्पायन’ को यजुर्वेद तथा ‘सुमन्तु’ मुनि को अथर्ववेद का ज्ञान कराया। इस प्रकार गुरुओं से प्राप्त ज्ञान को शिष्यों में बढ़ाते हुए इन ऋषियों ने वैदिक ज्ञान का अतिशय प्रचार किया। इसी से यह वेदवृक्ष विविध शाखाओं से युक्त होकर विशाल वट वृक्ष के सदृश बन गया। चरण :- वैदिकवाङ्मय में ‘शाखा’ शब्द के अर्थ में ही एक शब्द और भी उपलब्ध होता है, वह शब्द है— ‘चरण’। ‘मालती माधव’ के टीकाकार जगद्धर का कथन है कि ‘चरणशब्दः शाखाविशेषाध्ययनपरैकतापत्रजनसंघवाची’ अर्थात् चरण शब्द विशेष शाखा के अध्ययनकर्ता एकतापत्र मनुष्यों के समूह का वाचक है। इन शाखाओं का विस्तारपूर्वक विवेचन पुराणों एवं ‘चरणव्यूह’ आदि ग्रन्थों में देखा जा सकता है। इस शब्द की व्याख्या तथा अर्थ के विषय में अनेक विद्वानों ने विचार प्रकट किए हैं। महाभाष्यकार पतञ्जलि के अनुसार ‘गोत्रं च चरणैः सह’ अर्थात् ऋषि गोत्र का चरण से सम्बन्ध है। पं० भगवतदत्त जी के मतानुसार शाखाएँ चरणों का ही अवान्तर भाग थीं। शाकल, वाष्कल आदि चरण हैं तथा काण्व, काठक, कापालक आदि शाखाएँ हैं। कैय्यट के अनुसार भी ‘चरण शब्दः अध्ययन वचनः’ अर्थात् ऋषियों के अध्ययन CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 86 वैदिक वाङ्ग्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता कर्म के अनुसार ही शाखा अन्य क्रमों से भिन्न हो गई। शाखा-भेद के कारण- मूल वैदिक संहिताओं से ही अनेक वैदिक शाखाएँ उद्भिन्न हुईं। इस शाखा-भेद का कोई निश्चित कारण नहीं है, अपितु अनेक सम्भावित कारण हैं। क्रमशः उन कारणों पर विस्तारपूर्वक विवेचन प्रस्तुत है। (अ) पाठ-भेद- 'पाठभेद' शाखाओं के भेद का एक प्रमुख कारण है। विद्वानों के मतानुसार भी मन्त्रों के पठन-पाठन की अनेक विधियाँ ही शाखाओं के भेद की जन्मदाता है। रसाचार्य, ब्रह्मवादीआचार्य 'व्याडि' ने अपनी पुस्तक 'विकृतिवल्ली' में इन विकृतियों की विस्तृत चर्चा भी की है। उन्होंने लिखा है कि— 'जटा, माला, शिखा, लेखा, ध्वजो, दण्डो, रथो, घनः। अष्टौविकृतयः प्रोक्ताः क्रमपूर्वा मनीषिभिः॥' (विकृतवल्ली, १/५) इन आठ प्रकार की विकृतियों अर्थात् मन्त्र पाठ की शैलियों के आधार पर ही आठ प्रकार की शाखाओं का प्रचलन हुआ। (ब) देश-काल-भेद प्राचीन काल में गुरुकुलों में वेदज्ञ ऋषि अपने शिष्यों को वेद-विषयक शिक्षा देते थे। भारतवर्ष एक अत्यन्त विशाल देश था। उस समय मुद्रण सम्बन्धी सुविधा भी नहीं उपलब्ध थी। समस्त ज्ञान मौखिक था। अतः विषयों में एकरूपता सुरक्षित न रह सकी। अतः स्थान एवं काल की भिन्नता शाखाओं की भिन्नता का कारण बनी। इसी प्रकार यह वेदाध्ययन विभिन्न कालों में निरन्तर होता रहा। इन विभिन्न कालों में अनेक नूतन ऋचाओं का भी आविर्भाव हुआ। अनेक मन्त्र संहिताओं में उपलब्ध नहीं होते। अतः कालों की भिन्नता भी शाखाओं के भेदों का आधार है। इन उपर्युक्त शाखा-भेद सम्बन्धी दो कारणों से डा० मङ्गलदेव शास्त्री भी सहमत हैं। इस विषय पर उनका कथन है कि "वैदिक परम्परा में एक ऐसा समय था, जबकि अध्ययनाध्यापन का आधार केवल मौखिक था, उसी काल में एक ही गुरु के शिष्य-प्रशिष्य भारत जैसे महान् देश में फैलते हुए विशेषतः गमनागमन की उन दिनों की कठिनाइयों के कारण किसी भी पाठ को पूर्णतः अक्षुण्ण न रख सके थे। पाठ-भेद का हो जाना स्वाभाविक था— CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri द्वितीय अध्याय 87 एवं वेदं तदान्यस्य भगवानृषिसत्तमः। शिष्येभ्यश्च पुनर्दत्त्वा तपस्तप्तुं गतो वनम्॥ तस्य शिष्यप्रशिष्यैस्तु शाखाभेदास्त्विमेकृताः॥ ( वायुपुराण ६१/७७) साथ ही जान बूझकर पाठ का परिवर्तन या परिवर्धन भी अवस्थाविशेष में सम्भावना से बाहर की बात नहीं है। एवं ऐसा भी समय था, जब नवीन ऋचाएँ भी बनाई जाती थीं— ‘अग्निः पूर्वेभिरृषिभिरीड्यो नूतनैरुत।’ (ऋ० १/१/२) ‘इमां प्रत्नाय सुष्टुतिं नवीयसीं वोचेयम्’ (ऋ० १०/९१/१३) इत्यादि ऋचाओं में स्पष्टतः प्राचीन और नवीन ऋषियों का और बिल्कुल नवीन बनाई हुई ऋचाओं का उल्लेख है। तभी वैदिकवाङ्मय में ऐसी भी ऋचाएँ और मन्त्र मिलते हैं, जो उपलब्ध वैदिक संहिताओं में नहीं पाए जाते। ऐसी अवस्था में पाठभेद का हो जाना असम्भावित नहीं हो सकता। अतः शाखाभेद के दो प्रमुख कारण निश्चित हुए। वे हैं— १. अध्ययन भेदाच्छाखा भेदः अर्थात् अध्ययन के भेद से शाखाभेद होना, २ देशभेदनं शाखानां व्यवस्थापनम् अर्थात् देशभेद से शाखाओं में भेद होना। इन दो प्रमुख कारणों के अतिरिक्त कतिपय ‘गौण कारण’ भी हैं, जिन्हें वेदज्ञ शाखाओं के भेदों का हेतु बतलाते हैं, वे निम्नलिखित हैं— (स) उच्चारण-भेद- कुछ सीमा तक वैदिक शाखाओं में भेद-प्रभेद के लिए वेद-मन्त्रों तथा मन्त्रगत पदों का उच्चारण-भेद भी उत्तरदायी है। बहुधा अज्ञानतावश अथवा स्वभावगत त्रुटि के कारण विभिन्न लोगों के उच्चारण में भेद होना सम्भव ही है। जैसे कि अनुष्टुप्- छारदी के स्थान पर क्वचित् अनुष्टुप शारदी का उच्चारण किया जाता है। इसी प्रकार मूर्धन्य ‘ष्’ के स्थान पर ‘ख’ का उच्चारण अच्छे पढ़े-लिखे मनुष्यों के मुख से भी सुना जा सकता है। जैसे ‘इषेत्वा’ को ‘इखेत्वा’ कहना। अतः उच्चारण-भेद भी शाखा-भेद का कारण है किन्तु यह कारण शाखा-भेद का आंशिक कारण ही है। (द) ऋषि-देवता-छंद-भेद- आचार्य शौनक ने ऋषि, देवता तथा छंदों में होने वाले भेदों को भी शाखाओं के भेदों का कारण स्वीकार किया है। उन्होंने बृहद्देवता में लिखा है— “देवताष्यार्षछन्देभ्यो वैविध्यं तस्य जायते।” अर्थात् देवता, ऋषि तथा छंदों की विविधता शाखाओं में भेद की जनक है। प्रत्येक मन्त्र के ऊपर या सूक्त के ऊपर उस CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
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88 वैदिक वाङ्गमय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता मन्त्र या सूक्त के ऋषि एवं छन्द का नामोल्लेख रहता है। भ्रमवश इन नामों में अन्तर भी पड़ा। यह अन्तर इसलिए पड़ा क्योंकि विभिन्न सूक्तों के मन्त्र विभिन्न ऋषियों द्वारा विभिन्न रूपों में देखे गए। इन मन्त्रों का साक्षात् सम्बन्ध देवता तथा अर्थ से होता है। अतः यह कारण सबका परस्पर भेद कराने में सहयोगी रहा। (क) मन्त्रों का व्याख्या भेद- एक-एक मन्त्र की अनेक प्रकार से व्याख्या होने के कारण भी शाखाओं में भेद हुआ है। निरुक्त में एक-एक मन्त्र के तीन-तीन अर्थों का विवेचन किया है- आदिभौतिक-अर्थ, आदिदैविक-अर्थ तथा आध्यात्मिक-अर्थ। इसके अतिरिक्त ‘सम्प्रदाय-भेद' से एक-एक मन्त्र के सात-सात अर्थ निकाले जा सकते हैं। यथा ‘चत्वारि वाक् परिमिता पदानि', इस मन्त्र का सात प्रकार से अर्थ किया जा सकता है। अतः 'सम्प्रदाय-भेद' मन्त्रों के अर्थभेद का कारण है तथा मन्त्रों का अर्थ-भेद ही मन्त्र की विभिन्न व्याख्याओं को जन्म देता है। ये मन्त्रों की विभिन्न व्याख्याएँ ही वैदिक शाखाओं की जननी हैं। इन मतों के विपरीत पं० सत्यव्रत सामश्रमी ने ऐतरेयालोचन में लिखा है- ‘तत्वतो नहि वेदशाखा वृक्षशाखेवऽनापि नदी शाखेव, प्रत्युत् अध्येतृभेदात् सम्प्रदायभेदञ्च अध्ययनविशेष रूपैव।' अर्थात् वे वैदिक ऋचाओं को वृक्ष अथवा नदी की शाखाओं के सदृश नहीं स्वीकार करते हैं। उनके अनुसार ये विशिष्ट अध्ययन के रूप हैं। वैदिकशाखाओं की कुल संख्या- महाभाष्यकार पतञ्जलि ने 'पस्पशाह्निक' में लिखा है कि 'चत्वारो वेदाः। साङ्गा सरहस्याः बहुधाभिन्नाः। एक शतमध्वर्युशाखाः। सहस्त्रवर्त्मा सामवेदः। एक विंशतिधावाह्वृच्यम्। नवधाथर्वणो वेदः। अर्थात् वेद चार हैं, वेदाङ्गों एवं रहस्यों के साथ अनेक रूपों में विभक्त हुए। यजुर्वेद की १०१, सामवेद की १ हजार, ऋग्वेद की २१ तथा अथर्ववेद की ९ शाखाएं है। इस प्रकार भाष्यानुसार कुल शाखाएँ १०१ + १०००+ २१+९ = ११३१ हुई। ‘चरणव्यूह' की गणना इससे भिन्न है। इसके अनुसार- ‘सामवेदस्यकिलसहस्त्रभेदा आसन्। यजुर्वेदस्य षडशीतिर्भेदा, अथर्ववेदस्य नवभेदाभवन्ति' अर्थात् सामवेद की १००० शाखाएँ, यजुर्वेद की ८६ शाखाएँ होती हैं। अथर्ववेद की नौ शाखाएँ हैं। ऋग्वेद की भी २१ शाखाओं का निर्देश किया गया है। इस प्रकार कुल संख्या हुई १०००+८६+२१+९ = १११६। अन्य पुराणों तथा उपनिषदों में भी इन संख्याओं के बारे में किंचित् भिन्नता है। आर्यसमाज के प्रवर्तक
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Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri द्वितीय अध्याय 89 महर्षि दयानन्द भी पतञ्जलि के मत से सहमत हैं, किन्तु कुल संख्या में से चार को वे मूल वेद स्वीकार करते हैं, अतः उनके अनुसार शाखाओं की कुल संख्या ११३१-४ = ११२६ शेष रहती है। अब हम यहाँ पर चारों वेदों की विभिन्न शाखाओं का पृथक् निरूपण प्रस्तुत कर रहे हैं— ऋग्वेदीय शाखाएँ— जैसा कि पहले बतलाया जा चुका है कि महाभाष्यकार पतञ्जलि ने ऋग्वेद की २१ शाखाओं का निर्देश किया है। 'चरणव्यूहकार' के अनुसार उनमें से केवल पाँच शाखाएँ ही मुख्य हैं। वे निम्नलिखित हैं— १. शाकल शाखा २. वाष्कल शाखा ३. आश्वलायन शाखा ४. माण्डूकायन शाखा ५. सांख्र्यायन शाखा जहाँ तक पुराणों का सम्बन्ध है, प्राचीन पुराणों में ऋग्वेद की २१ तथा अवान्तरकालीन पुराणों में केवल तीन शाखाओं का ही निर्देश मिलता है। आथर्वण परिशिष्ट चरणव्यूह में उपर्युक्त पाँच शाखाओं के अतिरिक्त दो शाखाओं का और नामाल्लेख हुआ है। वे नाम हैं— साध्यायन् तथा औदुम्बर। बौद्ध ग्रन्थ दिव्यावदान में भी ऋग्वेदीय शाखाओं के बारे में जानकारी प्राप्त होती है। उसके अनुसार पहले शाखाओं के तीन मुख्य विभाग किए गए हैं, तत्पश्चात् उन तीन भागों के कुल २५ उपविभाग किए गए हैं। तीन भाग हैं— शाकल, वाष्कल तथा माण्डव्य, जिनमें शाकल के १०, वाष्कल के ८ तथा माण्डव्य के ७ अवान्तर भाग होते हैं। वाक्यपदीयकार भर्तृहरि ने भी ऋग्वेद की २१ शाखाएँ मानी हैं। यहाँ ऋग्वेद की प्रमुख ५ शाखाओं के विषय में विशेष जानकारी प्रस्तुत की जा रही है— १. शाकल शाखा— ऋग्वेद की आजतक प्रचलित शाखा 'शाकल' के नाम से विख्यात है। 'कात्यायन' ने 'ऋक् सर्वानुक्रमणी' के आदि में ही लिखा है— 'अथर्ऋग्वेदाम्नाये शाकलके।' शाकल शाखा ही मूलतः ऋग्वेद है। यह दस मण्डलों में विभाजित होने के कारण निरुक्तकार द्वारा 'दशतयी' नाम से सम्बोधित की गई है। इस शाखा में कुल १०२८ सूक्त तथा १०६०० मन्त्र हैं। शाकल शाखा से सम्बन्धित उपलब्ध साहित्य निम्नलिखित है— CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 90 वैदिक वाङ्गमय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता १. ब्राह्मण- ऐतरेय ब्राह्मण एवं कौषीतकि ब्राह्मण। २. आरण्यक- ऐतरेय आरण्यक एवं कौषीतकि आरण्यक। ३. उपनिषद्- ऐतरेय उपनिषद् तथा कौषीतकि उपनिषद्। ४. सूत्र- आश्वलायन श्रौतसूत्र। इसी शाखा के मन्त्र सामवेद की कौथुमशाखा, अथर्ववेद के पचासवें काण्ड तथा कृष्णयजुर्वेद में प्राप्त होते हैं। इसी कारण यह शाखा वैदिक शाखा में आदरणीय स्थान पर प्रतिष्ठित है। २. वाष्कल शाखा- यह शाखा आजकल प्राप्त नहीं होती है, किन्तु इस शाखा के विषय में यत्र तत्र सामग्री प्राप्त होती है। शाकल शाखा में अन्तिम मन्त्र 'समानीव आकूतिः' शब्दों से प्रारम्भ होता है, परन्तु वाष्कल शाखा का अन्तिम मन्त्र का प्रारम्भ 'तच्छंयोरावृणीमहे' शब्द से होता है। आचार्य शौनक ने अपना विचार प्रकट करते हुए लिखा है कि- ‘एतत् सहस्रं दश सप्त चैवाष्टावती वाष्कलकेऽधिकानि। तान्पारणे शाकले शैशिरोये वदन्तिशिष्टाऽनाखिलेषु विप्राः॥' (अनुवाकानुक्रमणी, ३६) इसके अनुसार वाष्कल शाखा में शाकल शाखा से आठ सूक्त अधिक हैं। शाकल शाखा में कुल १०१६ सूक्त हैं जबकि वाष्कल शाखा में १०२५ सूक्त हैं। इस संहिता का अन्तिम सूक्त संज्ञान सूक्त है। वाष्कल के प्रथम मण्डल के मन्त्रों में शाकल से क्रम-भिन्नता है। इसी कारण अस्त-व्यस्त ढंग से कार्य करने वाले व्यक्ति को 'वाष्कल' कहकर पुकारते हैं। ३. आश्वलायन शाखा- कवीन्द्राचार्य की सूची में आश्वलायन शाखा की संहिता तथा ब्राह्मणों का नामोल्लेख हुआ है, इससे इनके अस्तित्व की पुष्टि होती है। आजकल इस शाखा के केवल 'गृह्यसूत्र' तथा 'श्रौतसूत्र' ही प्राप्त होते हैं, जिनके नाम हैं- आश्वलायन- गृह्यसूत्र तथा आश्वलायन-श्रौतसूत्र। इसके अतिरिक्त अन्य साहित्य अप्राप्य है। ४. शाङ्खायन शाखा- इस शाखा के ब्राह्मण तथा आरण्यक उपलब्ध हैं किन्तु संहिता अनुपलब्ध है। ५. माण्डूकायन शाखा- इस शाखा का आजकल कोई भी ग्रन्थ उपलब्ध नहीं होता है। CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri द्वितीय अध्याय 91 यजुर्वेदीय शाखाएँ महाभाष्यकार पतञ्जलि के अनुसार यजुर्वेद की १०१ शाखाएँ हैं। उन्होंने लिखा है— 'एकशतध्वर्युशाखा' प्रपञ्चहृदयकार ने भी द्वितीय प्रकरण में लिखा है— 'यजुर्वेद एकोत्तरशतधा' अर्थात् यजुर्वेद १०१ शाखाओं वाला है। महर्षि दयानन्द भी इस विषय में पतञ्जलि के मत का समर्थन करते हैं। शौनक ने 'चरणव्यूह' में इस वेद की १८६ शाखाओं का निर्देश किया है। अनेक विद्वान् यजुर्वेद की १०० शाखाएँ ही मानते हैं। सूत संहिता, ब्रह्माण्डपुराण, स्कन्दपुराण आदि में यजुर्वेद की १०९ शाखाओं का उल्लेख किया गया है। मुक्तिकोपनिषद् ने यजुर्वेद की १०७ शाखाएँ मानी हैं। यजुर्वेद की १०१ शाखाओं में अधिकांश काल के प्रवाह में नष्ट हो गई, परन्तु प्रपञ्चकार को ३६ शाखाओं की जानकारी थी। बौद्ध ग्रन्थ 'दिव्यावदान' में कठों की १०, काण्व की १०, वाजसनेय की ११, जातुकर्ण की १३, प्रोष्ठ पद की १६ अर्थात् कुल ६० शाखाओं का निर्देश प्राप्त होता है। 'आथर्वण चरणव्यूह' परिशिष्ट में यजुर्वेद की २४ शाखाओं के नाम दिए हैं जिनमें शुक्लयजुर्वेद के १० तथा कृष्णयजुर्वेद की १४ शाखाएँ हैं। वे नाम निम्नलिखित हैं। शुक्ल-यजुर्वेद की शाखाएँ— काण्व, माध्यन्दिन, जाबाल, शापेय, श्वेत, श्वेततर, ताम्रायणीय, पौर्णवत्सा, आवटिका तथा परमावटिका। कृष्ण-यजुर्वेद की शाखाएँ— हौष्याः, धौष्याः, खाडिकाः, आह्नकाः, चरकाः, मैत्राः, मैत्रायणीयाः हरिव्रिविणाः, शालायनीया, मर्चकठाः, प्राच्यकठा, कपिष्ठलकठाः, उपलाः एवं तैत्तरीयाः। इसी प्रकार शुक्लयजुर्वेदीय शाखाओं का नामोल्लेख वायुपुराण अध्याय २/६१, ब्रह्माण्डपुराण अध्याय ३५ तथा चरणव्यूह एवं प्रतिज्ञापरिशिष्ट आदि में हुआ है। इन नामों में परस्पर साम्य नहीं है। 'प्रतिज्ञापरिशिष्ट' में दी गई नामावली इस प्रकार है— जाबाला, बौधेया, काण्वी, माध्यन्दिना, शापेया, तापायनीया, कापाला, पौण्ड्रवत्सा, आवटिका, परमावटिका, पाराशरा, वैनतेया, वैधैया, कौनतेया तथा वैजवाया। आजकल शुक्लयजुर्वेद की दो तथा कृष्णयजुर्वेद की चार शाखाएँ उपलब्ध होती हैं। वे उपलब्ध शाखाओं के नाम इस प्रकार हैं— शुक्ल यजुर्वेद— (१) वाजसनेयी शाखा। (२) काण्व शाखा। कृष्ण यजुर्वेद— (३) तैत्तरीय शाखा। (४) मैत्रायणी शाखा। CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
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92 वैदिक वाङ्ग्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता
(५) कठ शाखा। (६) कठ-कपिष्ठल-शाखा। यजुर्वेद का जो साहित्य सम्प्रति उपलब्ध है, वह निम्नलिखित है— शुक्लयजुर्वेद से सम्बन्धित साहित्य- शतपथ ब्राह्मण, बृहदारण्यक उपनिषद्, ईशोपनिषद् तथा बृहदाहरण्यक ब्राह्मण। कृष्णयजुर्वेद से सम्बन्धित साहित्य- तैत्तरीय आरण्यक, तैत्तरीय उपनिषद्, मैत्रायणी उपनिषद् एवं कठोपनिषद्। इसी वेद से सम्बन्धित आठ सूत्र ग्रन्थ भी प्राप्त होते हैं जो इस प्रकार है— आपस्तम्ब कल्पसूत्र, बोधायन श्रौतसूत्र, हिरण्यकेशी कल्पसूत्र, भारद्वाज श्रौतसूत्र, मानव श्रौतसूत्र, मानव गृह्यसूत्र, वाराह गृह्यसूत्र तथा काठक गृह्यसूत्र। इन उपलब्ध शाखाओं का विस्तृत विवरण निम्नलिखित है— १. वाजसनेयी शाखा- इस शाखा का सम्बन्ध शुक्लयजुर्वेद से है। इसकी संहिता में ४० अध्याय एवं १९७५ मन्त्र हैं। इन अध्यायों में प्रथम २५ अध्याय विषयवस्तु की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है। इसमें अनेक बड़े यज्ञों से सम्बन्धित वैदिक ऋषियों की प्रार्थनाओं एवं गीतों का संग्रह है। यह शाखा सम्पूर्ण उत्तर भारत में विशेषतः प्रचलित है। दक्षिण में महाराष्ट्र तथा मद्रास में इसका किञ्चित प्रचार है। एक विभाग अनुवाकों का भी उपलब्ध होता है जिसमें कुल ३०३ अनुवाक् हैं। इनमें मन्त्रों को 'कण्डिका' संज्ञा प्रदान की गई है। ये कण्डिकाएँ ऋक् यथा यजुः में विभाजित हैं, जिनमें ऋक् पद्यमय तथा यजुः गद्यमय कण्डिकाएँ हैं। प्राचीन काल में इस शाखा के अत्यधिक प्रचार का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि महाराज जनमेजय ने अपने नाग-यज्ञ में केवल वाजसनेयी ब्राह्मणों को आमन्त्रित करके उनका सत्कार किया था। कृष्णयजुर्वेदी ब्राह्मण होने के कारण वैशम्पायन नहीं बुलाए गए। अतः जनमेजय को वैशम्पायन ने शाप दे दिया जिससे वे तक्षक नाग द्वारा ग्रसित हुए। सम्प्रति वाजसनेयी संहिता का अनेक स्थानों से प्रकाशन हो चुका है। यथा— पारडी तथा अजमेर से इसका शतपथ ब्राह्मण भी प्रकाशित हो चुका है। इस संहिता पर अनेक विद्वानों ने भाष्यों का प्रणयन किया है, जैसे— माधव, अनन्तदेव, आनन्दभट्ट, उव्वट, महीधर तथा महर्षि दयानन्द आदि। इस पर हिन्दी भाष्यों की भी रचना हो चुकी है। वे भाष्यकार हैं— स्वामी पूर्णानन्द, पं० जयदेव। २. काण्वशाखा- यह शाखा भी शुक्लयजुर्वेद से सम्बन्धित है। आजकल इस संहिता का प्रचार
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द्वितीय अध्याय 93 दक्षिण में अधिक है जबकि ऋषि कण्व उत्तर भारत के निवासी थे। उनका आश्रम 'मालिनी' नदी के तट पर था। यह नदी उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले में 'मालन' के नाम से अब भी एक छोटी नदी के रूप में उपलब्ध है। यह शाखा उत्तर भारत में व्यास थी, इस बात का प्रमाण इसी संहिता के एक मन्त्र में उपलब्ध होता है। इस मन्त्र में कुरु तथा पञ्चालदेशीय राजाओं का उल्लेख है 'एष वः कुरवो राजा, एष पाञ्चालो राजो।' इसके पश्चात् इसका एक सुन्दर संस्करण मद्रास से प्रकाशित हुआ। श्रीमान् सातवलेकर जी ने औंध से इसका प्रकाशन किया। इस शाखा के अनुयायियों के उत्तरभारत में न मिलने के प्रमुख कारणों में एक तो यह है कि इनका सम्बन्ध पाञ्चरात्रों से है। ये पाञ्चरात्र वैष्णव सम्प्रदाय से सम्बन्धित है। जब वृष्णिवंशी, कृष्ण के साथ दक्षिण चले गए, उसी समय इस शाखा के सभी अनुयायी भी वहाँ पहुँच गए। ३. कठ शाखा- यजुर्वेद की २७ शाखाओं में कठशाखा का विशिष्ट स्थान है। पुराणों में काठक लोगों को 'माध्यम' कहा गया है। अतः अनुमानतः कठानुयायी मध्यप्रदेश के निवासी थे। पतञ्जलि का इसी शाखा से सम्बन्ध था। उन्होंने महाभाष्य में लिखा है- 'ग्रामे ग्रामे काठकं कापालकं च प्रोच्यते' अर्थात् काठक तथा कापालक शाखाएँ गाँव गाँव में पढ़ी जाती थी। आजकल इस संहिता का अध्ययन करने वाले शून्य सदृश हैं। कुछ लोगों के मतानुसार काठक शैव थे तथा आज भी कश्मीर में मिलते हैं। कठ संहिता में पाँच खण्ड हैं- इठिमिका, मध्यमिका, ओरिमिका, याज्यानुवाक्या तथा अश्वमेधाद्यनुवचन। इन खण्डों को स्थानकों में विभाजित किया गया है। इस शाखा में कुल ४० स्थानक, ८४३ अनुवाक, १३ अनुवचन, ३०९१ मन्त्र तथा मन्त्र-ब्राह्मणों की कुल संख्या १८००० है। इनमें इठिमिका के १८ स्थानक हैं, जिनमें पुरोडाश, पशुबन्ध तथा राजसूयादि याज्ञिक क्रियाओं का विवेचन है। मध्यमिका के १२ स्थानकों में सावित्री तथा स्वर्गादि का विवरण है। ओरिमिका में १० स्थानक हैं, जिनमें सत्र, प्रायश्चित्ति, चातुर्मास्य, सौत्रामणियज्ञ वर्णित हैं। 'अश्वमेधाद्यनुवचन' में १३ अनुवचन प्राप्त होते हैं। काठक संहिता की एक हस्तलिखित प्रति भारत से जर्मनी पहुँच गई तथा वहीं १९१० ई० में इसका प्रकाशन हुआ। इसके सम्पादक श्री श्रोदर महोदय थे। भारत मे सन् १९४३ ई० में स्वाध्याय मण्डल की ओर से इसका एक संस्करण प्रकाशित किया गया। डा० कालेण्ड द्वारा भी कठ संहिता के एक भाग का प्रकाशन कराया जा चुका है।
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94 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता (४) कपिष्ठल-कठ संहिता- यह कृष्णयजुर्वेद की प्रसिद्ध शाखा है। चरणव्यूहानुसार चरक शाखा में 'कठाः प्राच्य कठाः' तथा 'कपिष्ठल कठाः' का निर्देश किया गया है। कपिष्ठल किसी प्राचीन प्रसिद्ध ऋषि की संज्ञा है क्योंकि इसका उल्लेख वैयाकरण पाणिनि तथा निरुक्तकार दुर्गाचार्य ने किया है। पाणिनि ने एक सूत्र में लिखा है- 'कपिष्ठलो गोत्रे' (८/३/९१) तथा दुर्गाचार्य ने लिखा है- 'अहं च कापिष्ठिलोवासिष्ठः' (निरुक्तटीका ४४)। कपिष्ठल किसी स्थान का नाम प्रतीत होता है। कपिष्ठल का अपभ्रंश कैथल नामक एक ग्राम है, जो आजकल हरियाणा नामक प्रदेश का अङ्ग है। यह ग्राम प्राचीनकाल से ही अति प्रसिद्ध रहा है। काशिकावृत्ति (८/३/९१) तथा वराहमिहिर की बृहत्संहिता (१४/४) में इस ग्राम का उल्लेख है। इसका मूल ग्रन्थ कई दृष्टि से काठक संहिता से साम्य रखता है, किन्तु इसकी स्वराङ्कन पद्धति ऋग्वेद के सदृश है। इसका विभाजन भी ऋग्वेदीय अष्टकों के समान है। इसमें आठ अष्टक एवं ६४ अध्याय थे जिसमें से आजकल केवल ६ अष्टक जीर्णशीर्ण अवस्था में उपलब्ध होते हैं। चतुर्थ अष्टक का २७वां अध्याय 'रुद्राध्याय' है। सम्प्रति इस संहिता की एक अधूरी प्रति सरस्वती भवन, वाराणसी संस्कृत विश्वविद्यालय में सुरक्षित है। इसी की एक प्रति वेदाध्ययन के लिए यूरोप भेजी गई थी। इस प्रति के आधार पर डा० रघुवीर ने १९३२ में इसे प्रकाशित करवाया। इस पुण्य कार्य के सम्पादन के लिए डा० रघुवीर धन्यवाद के पात्र हैं। मैत्रायणी शाखा- इस शाखा की संहिता 'मैत्रायणी' गद्य पद्यात्मक है। इसमें मन्त्र तथा ब्राह्मणों का सम्मिश्रण है। सम्पूर्ण संहिता चार काण्डों में विभाजित है। प्रथम काण्ड में ११ प्रपाठक हैं, जिनमें दर्श, पौर्णमास, चातुर्मास्य, वाजपेयादि का विवेचन है। द्वितीय काण्ड में १३ प्रपाठक हैं जिनमें काम्येष्टि एवं राजसूय यज्ञों का वर्णन उपलब्ध होता है। तृतीय काण्ड में १२ प्रपाठक हैं जिनमें चिति, सौत्रामणि तथा अश्वमेध यज्ञों की चर्चा की गई है। चतुर्थ काण्ड खिल रूप में है। उसमें १४ प्रपाठक हैं, जिनमें राजसूयादि यज्ञों की सम्पूर्ण जानकारी दी गई है। इस संहिता में कुल मन्त्रों की संख्या २११४ है। इन मन्त्रों में ऋग्वेद के विविध मण्डलों के १७०१ मन्त्र हैं। इस शाखा के अनेक मन्त्र तैत्तरीय तथा काठक संहिताओं में भी प्राप्त होते हैं। इस शाखा के सम्पादक भी जर्मन के वेदज्ञ डा० श्रोदर हैं। भारत में इसका प्रकाशन १९९८ में औंध से हुआ। मैत्रायणी संहिता की एक अन्य संज्ञा भी है- 'कालाप
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Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri द्वितीय अध्याय 95 संहिता'। आचार्य विश्वरूप के अनुसार- 'नहि मैत्रायणी शाखा काठकस्य अत्यन्त विलक्षणा' अर्थात् मैत्रायणी तथा काठक संहिता में कोई अन्तर नहीं है। दोनों समान है। तैत्तिरीय शाखा- इस शाखा की संहिता का दक्षिण के महाराष्ट्र तथा आन्ध्र प्रदेश में विशेष प्रचार हुआ है। तैत्तिरीय संहिता में ६ काण्ड, ४४ प्रपाठक तथा ६३१ अनुवाक हैं। इसमें मंत्रों की संख्या २१९८ है। जैसी ऋग्वेद की सर्वानुक्रमणी है, वैसी इस संहिता की कोई सर्वानुक्रमणी नहीं है। कृष्णयजुर्वेद की अन्य शाखाओं के सदृश इस संहिता में भी गद्य पद्य तथा ब्राह्मण का सम्मिश्रण है। इसमें भी राजसूय, वाजपेय, याजमान तथा पौरोडास आदि यज्ञों की विस्तारपूर्वक समीक्षा की गई है किन्तु इस संहिता की व्याख्याओं में द्रविण प्रभाव छाया है। तैलंग तथा द्रविण ब्राह्मण, तैत्तरीय संहिता को ही आपस्तम्ब कहते हैं। यह संहिता आदिकाल से विद्वानों के मध्य अत्यन्त समादृत रही है। इसका सम्पादन सर्वप्रथम जर्मन वेदज्ञ डॉ० वैवर द्वारा किया गया। इसका प्रकाशन अंग्रेजी मे सन् १९१४ ई० में हारवर्ड ओरियण्टल सीरीज द्वारा किया गया। अनुवादक थे- डा० कीथ। भारतवर्ष में इस संहिता पर सर्वप्रथम भास्कर मिश्र ने अपना भाष्य लिखा। यह भाष्य मैसूर संस्कृत ग्रन्थमाला से प्रकाशित हुआ। इसके पश्चात् आचार्य सायण ने इसका प्रामाणिक भाष्य प्रस्तुत किया। यह भाष्य भी आनन्दाश्रम संस्कृत ग्रन्थमाला द्वारा प्रकाशित किया जा चुका है। इस शाखा की संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषद्, श्रौतसूत्र तथा गृह्यसूत्र आदि सम्पूर्ण संहिता पूर्णतः सुरक्षित है। इसी कारण यह संहिता अपना विशिष्ट स्थान रखती है। सामवेदीय शाखाएँ- महाभाष्यकार पतञ्जलि ने सामवेद की शाखाओं के विषय में लिखा है- 'सहस्रवर्त्मा सामवेदः।' अर्थात् सामवेद एक हजार शाखाओं वाला है। शौनक ने भी अपने ग्रन्थ 'चरणव्यूह' में सामवेद की एक हजार शाखाओं का निर्देश किया है। चरणव्यूह, प्रपञ्चहृदय, जैमिनि गृह्यसूत्र एवं दिव्यावदान के अनुसार सामवेद के १३ आचार्य थे, जिनके नाम ये हैं- राणायन, सत्यमुग्र, व्यास, भागुरि, औलुण्डि, गौलमुलवि, भानुमान, औपमन्यव, काराटिमशक, गार्ग्य, वार्षगण्य, कौथुमि, शालिहोत्र एवं जैमिनि। ऐसा विश्वास किया जाता है कि प्राचीन काल में उपर्युक्त सभी आचार्यों की पृथक्-पृथक् शाखाएँ उपलब्ध थीं किन्तु आजकल ऐसा नहीं है। आज तो केवल तीन शाखाएँ ही दृष्टिगोचर होती हैं। चरणव्यूह के टीकाकार महीदास ने सामवेद की केवल तीन शाखाओं की उपलब्धि होते हुए बतलाया है। वे शाखाएँ निम्नलिखित हैं- CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 96 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता १. राणायनीय शाखा २. कौथुमीय शाखा ३. जैमिनीय शाखा इन शाखाओं का जितना साहित्य उपलब्ध होता है, वह निम्नलिखित है— (अ) ब्राह्मण ग्रन्थ- ताण्ड्य ब्राह्मण (कौथुमीय), षडविंश ब्राह्मण, सामविधान ब्राह्मण एवं जैमिनीय ब्राह्मण। (ब) आरण्यक – छान्दोग्य आरण्यक (कौथुमीय) तथा जैमिनीय आरण्यक। (स) उपनिषद् – छान्दोग्य उपनिषद् (कौथुमीय), केनोपनिषद् (जैमिनीय) एवं जैमिनीय उपनिषद्। सामवेद की तीनों शाखाओं के सूत्र ग्रन्थ उपलब्ध होते हैं, वे इस प्रकार हैं- राणायनीय शाखा- द्राह्यायण श्रौतसूत्र और खदिर गृह्यसूत्र। जैमिनि शाखा- जैमिनीय श्रौतसूत्र और जैमिनीय गृह्यसूत्र। कौथुम शाखा- मशक कल्पसूत्र, लाटाय्या श्रौतसूत्र तथा गोभिल गृह्यसूत्र। अब इन शाखाओं का विस्तृत परिचय निम्नलिखित है- राणायनीय शाखा- इस शाखा का प्रचार महाराष्ट्रीय भट्टों में सर्वाधिक है। इस शाखा के अनुयायियों में एक शाखा अन्य भी प्रचलित है। यह अवान्तर शाखा है। इसका नाम 'सात्यमुग्नि शाखा' है। मुनि आपिशलि ने अपने शिक्षा ग्रन्थ में इस शाखा की विशेषता का उल्लेख किया है। उन्होंने लिखा है- 'छन्दोगान सात्यमुग्नि राणायणीयाः ह्रस्वं पठन्ति।' महाभाष्यकार पतञ्जलि भी इस बात पर सहमत है। उनका कथन है- 'न नु च भोः छन्दोगान सात्यमुग्निराराणायनीया अर्धमेकारं अर्धभोंकारञ्जन अधीयते।' अर्थात् सात्यमुग्निराराणायनीय एकार एवं ओंकार का उच्चारण ह्रस्व ही करते हैं। इस वैशिष्ट्य के ग्रीकभाषा का प्रभाव कहने वाले पाश्चात्यभाषावैज्ञानिकों को संस्कृतभाषा के विषय में ऐसे निर्देशों को देखकर अपने विचारों को बदलना पड़ा। जैमिनीय शाखा- यह हर्ष का विषय है कि जैमिनीय शाखा के संहिता, ब्राह्मण, श्रौतसूत्र तथा गृह्यसूत्र सभी उपलब्ध हो चुके हैं। इसकी एक अवान्तर शाखा भी है- 'तवलकार'। केनोपनिषद् का सम्बन्ध इसी अवान्तर शाखा से है। तवलकार नाम के एक ऋषि हुए है। इन्हें जैमिनि के शिष्य के रूप में जाना जाता है। जैमिनीय ब्राह्मण का अभिधान CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
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द्वितीय अध्याय 97 ही 'तवलकार ब्राह्मण' के रूप में प्रचलित है। यह संहिता नागराक्षर में लाहौर से प्रकाशित हो चुकी है। इसमें कुल १६८७ मन्त्र हैं। इनकी संख्या कौथुम शाखा के मन्त्र संख्या से १८२ कम है। जैमिनीय शाखा के सामगान कौथुम शाखा के सामग़ानों से एक हजार अधिक है। कौथुम गानों की संख्या केवल २७२२ हैं जबकि जैमिनीय गानों की संख्या ३६८१ है। कौथुमीय शाखा- इस शाखा की संहिता सर्वाधिक प्रचलित एवं लोकप्रिय है। कौथुमीशाखा का विशेष प्रचार गुजरात के नागर भट्टों में है। सायणकृत भाष्य कौथुमीय शाखा पर ही उपलब्ध होता है। इस शाखा की एक अवान्तर शाखा भी प्राप्त है- 'ताण्ड्य।' वेदान्त भाष्य के एक स्थल पर आचार्य शंकर ने भी कौथुमीयसंहिता' ताण्डय' तथा 'शाट्यायिन-संहिताओं' का नामोल्लेख किया है- 'अन्येऽपि शाखिनः ताण्डिनः शाट्यायिनः। (शां०भा० ३/३) ताण्ड्य ब्राह्मण तथा छान्दोग्य उपनिषद् कौथुमीय शाखा से सम्बन्धित हैं। अथर्ववेद की शाखाएँ- पतञ्जलि ने महाभाष्य के 'पशपशाह्निक' में अथर्ववेद की नौ शाखाएँ बतलाई हैं। उन्होंने लिखा है- नवधाऽथर्वणो वेदः। श्रीमद्भागवत् एवं वायुपुराण के अनुसार कलियुग के आरम्भ में जब वेदादि को संगृहीत किया गया तो वेदव्यास ने सुमन्तु नामक शिष्य को अथर्ववेद का ज्ञान कराया। इनका दूसरा नाम 'दारुण' भी है। सुमन्तु ने पुनः यह वेद अपन शिष्य कबन्ध को पढ़ाया। कबन्ध के भी दो शिष्य थे- (अ) पथ्य (ब) देवदर्श। इनमें से पथ्य के भी तीन शिष्य हुए। इन तीनों के नाम हैं- जाजलि, कुमुद और शौनक। शौनक के भी दो शिष्य थे- बभू एवं सैन्धवायन। ये नौ शाखाएँ इन्हीं नौ ऋषियों की मानी जाती है। चरणव्यूहकार भी अथर्ववेद की नौ शाखाएँ मानते हैं, किन्तु शाखाओं की संज्ञा के बारे में मत भिन्नता है। आधुनिक प्रख्यात वेदज्ञ पं० भगवत् दत्त जी के अनुसार ६ नाम प्रायः सभी समान बतलाते हैं, वे हैं- पैप्पलाद, मौद, शौनकीय, जाजल, देवदर्श तथा चारणवैद्य। अन्य तीन शाखाएँ अनुमानतः ये हो सकती है- स्तौद, जलद तथा ब्रह्मबल। वर्तमान काल में उन नौ शाखाओं में से दो शाखाएँ ही शेष हैं। शेष ६ तो नष्ट हो चुकी हैं। उपलब्ध शाखाओं का क्रमशः विवेचन प्रस्तुत है। पैप्पलाद शाखा- यह शाखा जीर्णशीर्ण रूप में शारदा लिपि में झर्जपत्र पर उल्लिखित काश्मीर में
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98 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता उपलब्ध हुई थी। कश्मीर नरेश राजा रणवीर सिंह ने इसे डॉ० राथ को सन् १८७५ ई० में सौंप दी थी। १८९५ मे राथ साहब के देहावसान हो जाने पर यह प्रति ट्यूबिंजन विश्वविद्यालय की पुस्तकालय में रख दी गई। इस प्रति की एक फोटोस्टेट कापी अमेरिका के वाल्टमोर नगर से तीन जिल्दों में प्रकाशित हुई। भारत में इसकी दो प्रतियाँ जर्मनी जाने से पूर्व ही सुरक्षित कर ली गई थीं। इनमें से एक भाण्डारकर इन्स्टीट्यूट, पूना में तथा दूसरी बम्बई रॉयल एशियाटिक सोसाइटी में सुरक्षित है। प्रपञ्चहृदयकार के अनुसार 'आथर्वणिके पैप्पलाद शाखायां मन्त्री विंशति काण्डः।' तात्पर्य यह है कि पैप्पलाद शाखा में ५० काण्ड थे। महाभाष्यानुसार पैप्पलाद शाखा का प्रारम्भ 'शन्नोदेवीरभिष्टय' मन्त्र द्वारा होता है। किन्तु शौनक संहिता में इसकी स्थिति प्रथम काण्डान्तर्गत छठें सूक्त के आदि में है। इसका केवल एक 'प्रश्नोपनिषद्' प्राप्त होता है। इसमें सुकेशा तथा भारद्वाज आदि ६ ऋषियों द्वारा पूछे गए प्रश्नों के पिप्पलाद मुनि द्वारा दिए गए उत्तर संगृहीत है। शौनकशाखा- शौनक शाखा की संहिता की संरचना १८ काण्डों मे हुई है तथा काण्ड, प्रपाठक, अनुवाक्, सूक्त, मन्त्र, गण, पर्याय तथा अवसानों में इसका विभाजन हुआ है। बृहत् सर्वानुक्रमणिका के काल में यह शाखा १९ काण्डों वाली हो गई। आश्वलायन अनुक्रमणी के अनुसार यह शाखा २० काण्डों की है। वे २०वें काण्ड के ऋषि एवं देवता का भी निर्देश करते हैं। अथर्ववेद की उपलब्ध शौनक शाखा ही मूल संहिता है। सम्प्रति इसमें २० काण्ड, ३४ प्रपाठक, १११ अनुवाक, ६६३ वर्ग, ६३१ सूक्त तथा ५९७७ मन्त्र हैं। वायुपुराणानुसार इस शाखा की संहिता के ६०२६ मन्त्र थे। मौदशाखा- इसका उल्लेख महाभाष्य (४।१।८६) तथा शाबरभाष्य (१।२१।३०) में प्राप्त होता है। अथर्व परिशिष्ट (२।५) में मौद तथा जलद शाखा वाले पुरोहित अत्यन्त गर्हित बतलाए गए हैं। इसके अनुसार इन पुरोहितों की उपस्थिति विनाश की सूचक है। 'पुरोधा जलदो यस्य मौदो वा स्यात् कदाचन। अब्दाद् दशम्यो मासेभ्यो राष्ट्रभ्रंश सगच्छति।।' इस प्रकार का उल्लेख संभवतः अभिचार मारणादि के प्रयोग के कारण हुआ है।
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Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri संहिताएँ प्रथम - ऋग्वेद वैदिक मन्त्रों के संग्रहों को 'संहिता' कहा जाता है। वैदिक संहिताएँ मुख्यतः चार हैं :- ऋक् संहिता, यजुः सहिता, साम संहिता तथा अथर्व संहिता। इन चारों संहिताओं में से प्रत्येक का कुछ न कुछ निजी वैशिष्ट्य है किन्तु सम्पूर्ण वैदिक साहित्य की विभिन्न रचनाओं में ऋक् संहिता अति महत्त्वपूर्ण एवं गौरवयुक्त है। विश्व के इतिहास में सभी विद्वान् एवं विचारक निर्विवाद रूप से ऋक् संहिता को प्रथम स्थान पर प्रतिष्ठित करते हैं। 'ऋक् संहिता' ही ऋग्वेद के नाम से प्रख्यात है। भारतीय धर्म तथा दर्शन की दृष्टि से भी ऋग्वेद की पूजनीयता सर्वत्र स्वीकार की गई है। तैत्तरीय संहिता में लिखा है कि- "यद् वै यज्ञस्य साम्ना यजुषा क्रियते शिथिलं तत्, यद् ऋचा तदृढमिति" (तै०स० ६/५/१०/३) "अर्थात् जो विधान साम और यजुः के द्वारा सम्पादित होता है, वह शिथिल है, किन्तु ऋक् के द्वार सम्पादित अनुष्ठान ही दृढ़ होता है।" पुरुषसूक्तानुसार भी ऋचाओं का प्रथम आगम हुआ- "तस्माद् यज्ञात् सर्वहुत ऋचः सामानि जज्ञिरे। छन्दांसि जज्ञिरे तस्मात् यजुस्तस्मादजायत।।" (ऋ० १०/९०/९) "अर्थात् जिस यज्ञ में सभी कुछ अर्थात् सबका आत्मरूप पुरुष आहुत कर दिया जाता है, ऐसे उस यज्ञ से ऋग्वेद और सामवेद उत्पन्न हुए। उससे गायत्री आदि छन्द उत्पन्न हुए, उससे यजुर्वेद उत्पन्न हुआ।" पाश्चात्य वेदज्ञों के अनुसार ऋग्वेद भाषा एवं भाव की दृष्टि से भी अन्य वेदों की अपेक्षा नितान्त प्राचीन है। यह प्राचीनतम भारतीय साहित्य अवश्य है। ऋग्वेद की भाषा से यह भी सिद्ध होता है कि इसका प्रणयन किसी एक काल की निश्चित अवधि में नहीं हुआ। इसमें अति प्राचीन तत्त्वों तथा नवीन तत्त्वों का समन्वय दृष्टिगोचर होता है। इनकी स्थिति भी हिब्रू के स्स्रोतों के समान है, जिनकी रचना एक दीर्घ काल तक की गई और उसके पश्चात् उन्हें एक ग्रन्थ के रूप में पिरो दिया गया। ऋग्वेद का निर्माण काल कितना प्राचीन है, यह अद्यावधि अनुमान का ही विषय है। विद्वानों तथा वेद प्रेमियों के इस विषय में भिन्न-भिन्न विचार हैं। भारतीय मनीषियों के अनुसार वेद CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
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100 $\hspace{5cm}$ वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता
अपौरुषेय हैं। प्रभु की वाणी हैं। वे पुरुषों के द्वारा लिखित नहीं है। स्वयं वेदों में ऐसे मन्त्र होते हैं, जिनमें ऋक्, यजु, साम एव अथर्व का उल्लेख है और उनको यज्ञ पुरुष परमेश्वर से प्रादुर्भूत स्वीकार किया गया है। पाश्चात्य विद्वान् मंत्रों के ऊपर लिखे हुए ऋषियों को मंत्रकर्ता मानते हैं। उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि ऋग्वेद सर्वप्राचीन साहित्य है। अब ऋग्वेद से तात्पर्य क्या है? ऋग्वेद का अर्थ है- ऋचाओं का वेद। तो ऋचा क्या है?' ऋचा की परिभाषा जैमिनीय सूत्रों में उपलब्ध होती है। वह इस प्रकार है— “तेषामृग् यत्रार्थवशेन पाद व्यवस्था” (२/१/३५) अर्थात् जिन मन्त्रों में अर्थवशात् पादव्यवस्था है, उन छन्दोंबद्ध मन्त्रों को 'ऋक्' कहते हैं। वेद का अर्थ है ज्ञान। इस प्रकार ऋचाओं का ज्ञान ऋग्वेद शब्द से अभिहित होता है। ऋग्वेद का विभाजन ऋग्वेद का विभाजन दो प्रकार के क्रमों से किया गया है— (क) अष्टक क्रम, (ख) मण्डल क्रम (क) अष्टक क्रम :- समस्त ऋग्वेद को आठ अष्टकों में विभक्त किया गया है। प्रत्येक अष्टक में आठ- आठ अध्याय हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण ऋग्वेद ६४ अध्यायों में संग्रहीत है। अध्ययन की सुविधा की दृष्टि से प्रत्येक अध्याय को वर्ग नामक अवान्तर विभागों में बाँटा गया है। वर्ग ऋचाओं के समूह का नाम है। इन वर्गों में प्रायः ऋचाओं की संख्या निश्चित नहीं है। सामान्यतया पाँच मन्त्र मिलकर एक वर्ग का निर्माण करते हैं, लेकिन ऐसे भी वर्ग उपलब्ध होते हैं जिनमें मन्त्रों की संख्या १ से लेकर ९ मन्त्रों तक है। इस वैषम्य का कारण अज्ञात है। समस्त वर्गों की संख्या २००६ है। ऋग्वेद संहिता की वाष्कल नामक शाखा इस विभाजन क्रम का प्रतिनिधित्व करती है। अधिकांश वेदज्ञों ने अष्टक विभाजन क्रम को अवैज्ञानिक तथा अप्रामाणिक माना है। (ख) मण्डल क्रम :- ऋग्वेद का द्वितीय विभाग मण्डल क्रम के नाम से जाना जाता है। शाकल शाखा इस विभाजन-क्रम का प्रतिनिधित्व करती है। विद्वानों के मध्य में मण्डल क्रम पर आधारित विभाग अधिक ऐतिहासिक, वैज्ञानिक तथा प्रामाणिक माना जाता है। इसके अनुसार ऋग्वेद १० मण्डलों में विभक्त है। इसी कारण निरुक्तादि ग्रन्थों में ऋग्वेद को दाशतयी की संज्ञा प्रदान की गई है। प्रत्येक मण्डल में अनेक अनुवाक् हैं। प्रत्येक
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द्वितीय अध्याय 101 अनुवाक् में अनेक सूक्त तथा उन सूक्तों में अनेक ऋचाएँ अथवा मन्त्र संग्रहीत हैं। कात्यायन ने अपनी सर्वानुक्रमणी में इन सभी मन्त्रों की संख्या की गणना करके सपरिश्रम एकत्र उल्लेख किया है। प्राचीन वेद मर्मज्ञों ने वेदों की शुद्धता के निर्वाहार्थ ऋचाओं की क्या, अक्षरों तक की गणना कर रखी है। इससे कोई भी व्यक्ति इन वेदों में स्वनिर्मित नवीन मन्त्रों को देने का दुःसाहस नहीं कर सकता। ऋग्वेद के १० मण्डलों में कुल ८५ अनुवाक् हैं। इन अनुवाकों में १०१७ सूक्त हैं। इन सूक्तों के अतिरिक्त ११ सूक्त और भी हैं, जिन्हें बालखिल्य कहा जाता है। दोनों को योग करने पर सूक्तों की कुल संख्या १०१७+११ = १०२८ हो जाती है। इन बालखिल्य सूक्तों का अधिक महत्त्व नहीं है क्योंकि इनको स्वाध्याय काल में पढ़ा जाता है। इन खिल सूक्तों का न तो पाठ उपलब्ध होता है और न ही इनके अक्षरों की गणना की जाती है। खिल का अर्थ होता है- परिशिष्ट अर्थात् अन्त में संलग्न किए गए मन्त्र। इन सूक्तों का स्थान अष्टम मण्डल में सूक्त ४९ से लेकर सूक्त ५९ तक है। इनके मन्त्रों की संख्या ८० है। इनके स्वरूप का यथार्थ ज्ञान अनुपलब्ध है। अनुवाकानुक्रमणी के ४३वें श्लोक के अनुसार ऋग्वेद के समस्त सूक्तों में निहित मन्त्रों की संख्या 10580¼ है- “ऋचां दश सहस्त्राणि ऋचां पञ्चशतानि च। ऋचामशीतिः पादश्च पारणं संप्रकीर्तितम्॥’’ (अनु० ४३) अतः स्पष्ट है कि प्रत्येक सूक्त में औसतन १० मन्त्र हैं। इसी प्रकार अनुवाकानुक्रमणी के ही ४५वें श्लोक के शब्दों की संख्या के बारे में निर्देश है- “शाकल्यदृष्टेः पदलक्षमेकं सार्धं च वेदे त्रिसहस्रयुक्तम्। शतानि चाष्टौ दशकद्वयं च पदानि षट् चेति हि चर्चितानि।’’ (अनु० ४५) इस श्लोकानुसार ऋग्वेद में शब्दों की कुल संख्या १ लाख ५३ हजार ८ सौ छब्बीस है। ऋग्वेदीय ऋचाओं की संख्या :- मण्डलक्रम के विवेचन में ऋग्वेदीय ऋचाओं की संख्या 10580¼ कही गई है, इसलिए अब ऋग्वेदीय ऋचाओं की संख्या के पृथक् स्पष्टीकरण की क्या आवश्यकता ? वस्तुतः ऋग्वेद में ऋक् मन्त्रों की संख्या का निर्धारण भी एक जटिल समस्या है, विवादग्रस्त विषय है, विभिन्न पुरातन एवं नवीन वेदज्ञों ने इस समस्या को अपने अनुसार पृथक्-पृथक् ढंग से सुलझाया है। ऋचाओं की संख्या निर्धारण में
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102 वैदिक वाङ्ग्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता
भिन्नता के दो कारण हैं— (१) प्राचीन वैदिक विद्वानों की गणना में शाखा-भेद का होना। (२) नवीन अथवा आधुनिक विद्वानों की गणना में व्यास भ्रम। भ्रम का मुख्य कारण यह है कि ऋग्वेद में कुछ ऋचाएँ ऐसी भी है जो प्रयोग काल में द्विपदा तथा अध्ययन काल में चतुष्पदा व्यवहृत होती हैं। ऋक् सर्वानुक्रमणी में लिखा है— “द्विर्द्विपदास्त्वृचः समामनन्ति।” ऋग्वेद में कुछ ऋचाएँ ऐसी भी हैं जो सदैव द्विपदा ही रहती है, कभी भी अपने द्विपदा रूप का परित्याग नहीं करती। इन्हें नित्य द्विपदा की संज्ञा प्राप्त है। ये मात्र १७ ऋचाएँ हैं। इन्हीं नित्य-नैमित्तिक द्विपदाओं के वास्तविक रूप से अनभिज्ञ होने के कारण मैक्समूलर, मैक्डानल आदि अनेक वैदिक विद्वानों ने भी अपनी गणना में त्रुटि की है। अतः नैमित्तिक द्विपदाएँ प्रयोगकाल में १४० तथा अध्ययन काल में केवल ७० ही रह जाती हैं। मन्त्रों की बड़ी संख्या में गड़बड़ी का एक अन्य कारण भी है; कहीं-कहीं खिलमन्त्रों की गणना ऋग्वेद के मन्त्रों के साथ नहीं करते। खिलमन्त्रों की कुल संख्या ८० है। इस प्रकार ऋग्वेद की कुल ऋक् संख्या १०५५२ है किन्तु अध्ययन काल में १४० नैमित्तिक द्विपदाओं के चतुष्पदा हो जाने के कारण ऋक् संख्या १०४८२ हो जाती है। इसमें बालखिल्य मन्त्र सम्मिलित हैं।
प्राचीनतम सूक्त :- पाश्चात्य विद्वानों के अनुसार ऋग्वेद के मण्डलों में प्राचीन तथा अर्वाचीन मन्त्रों का संग्रह है। प्राचीनतम सूक्त द्वितीय मण्डल से लेकर सप्तम मण्डल तक उपलब्ध होते हैं। प्रत्येक मण्डल किसी ऋषि के वंश विशेष से सम्बद्ध है। इसीलिए इन मण्डलों को वंशमण्डल (Family Book) कहते हैं। भारतीय परम्परानुसार ये ऋषि ही मन्त्रों के प्रत्यक्षकर्ता हैं। ये छह ऋषि हैं— गृत्समद द्वितीय मण्डल के, विश्वामित्र तृतीय के, चतुर्थ के वामदेव, पञ्चम के अत्रि, षष्ठ के भरद्वाज तथा सप्तम के वसिष्ठ। यही ऋषि द्वितीय से सप्तम मण्डल तक के कर्ता के रूप में मान्य हैं। अष्टम मण्डल के सूक्तों के साक्षात्कर्ता ऋषि कण्व तथा अंगिरा वंश के हैं। नवम् मण्डल में समस्त मन्त्रों का प्रतिपाद्य सोम-देवता विषयक है। सोम का एक अभिधान पवमान भी है। अतः सोम विषयक मन्त्रों के संग्रह के कारण इसे पवमान मण्डल भी कहते है। अनुमानतः द्वितीय से लेकर अष्टम मण्डल तक संग्रहीत मन्त्रों को चुनकर ग्रन्थान्त में संलग्न कर दिया गया। उसके पश्चात् ग्रन्थ के प्रारम्भ तथा अन्त में एक एक मण्डल युक्त किए गए। अतः प्रथम तथा दशम मण्डल अपेक्षाकृत नवीन हैं। भारतीय परम्परा के अनुसार इन मण्डलों का संकलनकर्ता एवं विभाजनकर्ता एक ही व्यक्ति है। दशम मण्डल के ऋषि
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