वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
पृष्ठ 128, कुल 353 में से
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100 $\hspace{5cm}$ वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता
अपौरुषेय हैं। प्रभु की वाणी हैं। वे पुरुषों के द्वारा लिखित नहीं है। स्वयं वेदों में ऐसे मन्त्र होते हैं, जिनमें ऋक्, यजु, साम एव अथर्व का उल्लेख है और उनको यज्ञ पुरुष परमेश्वर से प्रादुर्भूत स्वीकार किया गया है। पाश्चात्य विद्वान् मंत्रों के ऊपर लिखे हुए ऋषियों को मंत्रकर्ता मानते हैं। उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि ऋग्वेद सर्वप्राचीन साहित्य है। अब ऋग्वेद से तात्पर्य क्या है? ऋग्वेद का अर्थ है- ऋचाओं का वेद। तो ऋचा क्या है?' ऋचा की परिभाषा जैमिनीय सूत्रों में उपलब्ध होती है। वह इस प्रकार है— “तेषामृग् यत्रार्थवशेन पाद व्यवस्था” (२/१/३५) अर्थात् जिन मन्त्रों में अर्थवशात् पादव्यवस्था है, उन छन्दोंबद्ध मन्त्रों को 'ऋक्' कहते हैं। वेद का अर्थ है ज्ञान। इस प्रकार ऋचाओं का ज्ञान ऋग्वेद शब्द से अभिहित होता है। ऋग्वेद का विभाजन ऋग्वेद का विभाजन दो प्रकार के क्रमों से किया गया है— (क) अष्टक क्रम, (ख) मण्डल क्रम (क) अष्टक क्रम :- समस्त ऋग्वेद को आठ अष्टकों में विभक्त किया गया है। प्रत्येक अष्टक में आठ- आठ अध्याय हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण ऋग्वेद ६४ अध्यायों में संग्रहीत है। अध्ययन की सुविधा की दृष्टि से प्रत्येक अध्याय को वर्ग नामक अवान्तर विभागों में बाँटा गया है। वर्ग ऋचाओं के समूह का नाम है। इन वर्गों में प्रायः ऋचाओं की संख्या निश्चित नहीं है। सामान्यतया पाँच मन्त्र मिलकर एक वर्ग का निर्माण करते हैं, लेकिन ऐसे भी वर्ग उपलब्ध होते हैं जिनमें मन्त्रों की संख्या १ से लेकर ९ मन्त्रों तक है। इस वैषम्य का कारण अज्ञात है। समस्त वर्गों की संख्या २००६ है। ऋग्वेद संहिता की वाष्कल नामक शाखा इस विभाजन क्रम का प्रतिनिधित्व करती है। अधिकांश वेदज्ञों ने अष्टक विभाजन क्रम को अवैज्ञानिक तथा अप्रामाणिक माना है। (ख) मण्डल क्रम :- ऋग्वेद का द्वितीय विभाग मण्डल क्रम के नाम से जाना जाता है। शाकल शाखा इस विभाजन-क्रम का प्रतिनिधित्व करती है। विद्वानों के मध्य में मण्डल क्रम पर आधारित विभाग अधिक ऐतिहासिक, वैज्ञानिक तथा प्रामाणिक माना जाता है। इसके अनुसार ऋग्वेद १० मण्डलों में विभक्त है। इसी कारण निरुक्तादि ग्रन्थों में ऋग्वेद को दाशतयी की संज्ञा प्रदान की गई है। प्रत्येक मण्डल में अनेक अनुवाक् हैं। प्रत्येक
CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar