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वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

पृष्ठ 163, कुल 353 में से

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पृष्ठ 163

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri यजुर्वेद वैदिक संहिताएँ मुख्यतः चार प्रकार की होती हैं- ऋक्संहिता, यजुःसंहिता, सामसंहिता तथा अथर्वसंहिता। ऋक्संहिता के मन्त्रों का लक्ष्य देवताओं का आह्वान है। इस संहिता का विस्तृत विवेचन पिछले अध्याय में किया जा चुका है। यहाँ पर यजुर्वेद का विस्तारपूर्वक विवेचन किया जा रहा है। यजुर्वेद में यजुषों का संग्रह है। विद्वानों ने 'यजुष' शब्द की भिन्न-भिन्न व्युत्पत्तियाँ की है। कतिपय निम्नलिखित हैं- (क) यास्कानुसार यज् (यज्ञ करना) धातु से यजुष शब्द निर्मित हुआ- 'यजुर्यजतेः।' तात्पर्य यह है कि यज्ञ के लिए जो मन्त्र सर्वाधिक उपयोगी हैं, उनका अभिधान 'यजुष्' है। (ख) 'इज्यतेऽनेनेति यजुः' जिसके द्वारा यज्ञ किया जाय, वह 'यजुष्' कहलाता है। (ग) जैमिनि के अनुसार- 'शेषे यजुः शब्दः', इसका तात्पर्य यह है कि ऋक् तथा साम से भिन्न मन्त्र 'यजुष्' है। (घ) 'गद्यात्मको यजुः' अर्थात् गद्यात्मक मन्त्रों की संज्ञा 'यजुष्' है। उपर्युक्त 'यजुष्' शब्द की व्याख्याएँ भले ही अनेक हों किन्तु उनका अभिप्राय लगभग समान है। अतः यज्ञ की दृष्टि से यजुर्वेद का विशेष महत्त्व है। यह 'अध्वर्युवेद' कहलाता है क्योंकि 'यज्ञ' में 'अध्वर्युः' संज्ञक पुरोहित की यह अपनी संहिता है। याग के चारों पुरोहितों में अध्वर्यु का श्रेष्ठ स्थान है। वही यज्ञ का निर्माता है। निम्नलिखित मन्त्र में यही तथ्य प्रकट किया गया है- ऋचां॒ त्वः पोष॑मास्ते पुपु॒ष्वान्‍गाय॒त्रं त्वो॑ गायति॒ शक्व॑रीषु। ब्रह्मा॒ त्वो व॑दति जातवि॒द्यां य॒ज्ञस्य॑ मा॒त्रां वि मि॑मीत उ॒ त्वः॥ (ऋ० १०/७१/११) अर्थात् कोई विद्वान् वेद मन्त्रों के पोषण को पुष्ट करता हुआ रहता है। कोई शक्वरी नामक ऋचाओं में गाने योग्य मन्त्रों (साम) को गाता है। कोई यज्ञ का ब्रह्म या अथर्ववेद का ज्ञाता शिल्प विद्या को कहता है और कोई यज्ञ की विधि को विशेष रीति से बतलाता है। अध्वर्यु शब्द का व्युत्पत्तिमूलक अर्थ यांस्क ने इस प्रकार से किया है- 'अध्वरं युनक्ति, अध्वरस्य नेता'। इसका अभिप्राय यह है कि अध्वर्यु ही यज्ञ का सम्पादक तथा नेता है। कतिपय दृष्टियों से भले ही ऋग्वेद अधिक महत्त्वशाली हो परन्तु यज्ञ में सर्वाधिक उपयोगी यजुर्वेद ही है। प्रख्यात भाष्यकार CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar