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वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

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पृष्ठ 165

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri द्वितीय अध्याय 137 कृष्ण तथा शुक्ल यजुर्वेद :- कृष्ण यजुर्वेद के कृष्णत्व का तथा शुक्ल यजुर्वेद के शुक्लत्व का क्या कारण है ? यह भेद किस आधार पर किया गया है ? इस प्रश्न पर गम्भीरतापूर्वक विचार करने पर विदित होता है कि शुक्ल यजुर्वेद में केवल प्रार्थनाओं एवं याज्ञिक नियमों से सम्बन्धित वे मन्त्र हैं जो यज्ञ के अवसर पर पुरोहित द्वारा उच्चारित होते हैं। इसके विपरीत कृष्ण यजुर्वेदीय शाखाओं में मन्त्रों के साथ याज्ञिक विधियों तथा उन विधियों पर वाद-विवाद युक्त अंशों का भी समावेश हुआ है। यही पृथक्-पृथक् प्रकार का संयोजन तथा रचनाक्रम कृष्ण यजुर्वेद के कृष्णत्व का तथा शुक्ल यजुर्वेद के शुक्लत्व का हेतु है तथापि यजुर्वेद के कृष्ण एवं शुक्ल रूप में विभाजन के आधार को लेकर भिन्न-भिन्न विद्वानों ने भिन्न-भिन्न मत व्यक्त किए हैं। इनमें से कतिपय प्रमुख मत निम्नलिखित हैं- मैक्डानल का मत :- प्रो० मैक्डानल का मत है कि शुक्ल यजुर्वेद का वर्ण्यविषय निर्मल, स्पष्ट तथा सुबोध है, अतः वह शुक्ल है, जबकि कृष्ण यजुर्वेद का वर्ण्यविषय सांकर्य युक्त है। कृष्ण यजुर्वेद में पद्य के साथ गद्य का भी सम्मिश्रण है। यह शैली पाठकों को क्लिष्ट प्रतीत होती है, अतः यह कृष्ण है। डॉ० मङ्गलदेव शास्त्री का मत :- डॉ० मङ्गलदेव शास्त्री ने भी इस विषय पर अपने विचार प्रस्तुत किए हैं। उनका मत है कि शुक्ल यजुर्वेद का उत्तर भारत में व्यापक प्रसार तथा प्रचार है, जबकि कृष्ण यजुर्वेद दाक्षिणात्यों में अधिक प्रचलित है। दक्षिण में अधिक प्रचलित होने के कारण कृष्ण यजुर्वेद में वैदिकेतर विचार धारा का भी पर्याप्त समावेश उपलब्ध होता है। शुक्ल यजुर्वेद इस प्रभाव से वंचित है। उसमें विशुद्ध वैदिक तत्त्वों का निरूपण हुआ है। अतः शास्त्री जी के विचार से शुद्ध विचार धारा से सज्जित होने के कारण शुक्ल यजुर्वेद को 'शुक्ल' तथा मिश्रित विचार धारा के संयोजन से कृष्ण यजुर्वेद को 'कृष्ण' अभिधान प्राप्त हुआ। विन्टरनिट्ज का मत :- विन्टरनिट्ज ने कृष्ण तथा शुक्ल यजुर्वेद के इस प्रकार के विभाजनों को स्वीकार नहीं किया है। उन्होंने इनके विभाजन को सामान्य भाव से निरूपित किया है। उनके अनुसार कृष्ण यजुर्वेद के सापेक्ष में शुक्ल यजुर्वेद अधिक प्रचलित है, इसीलिए अधिक महत्त्वपूर्ण भी है। इसके अतिरिक्त इनके विभाजन का कोई विशेष कारण नहीं है। पं० बलदेव उपाध्याय का मत :- उपाध्याय जी ने पुराणों में प्राप्त एक साम्प्रदायिक कथा को कृष्ण तथा शुक्ल के नामकरण का आधार बतलाया है। इन्हीं के शब्दों में यह कथा निम्नलिखित है- "वेदव्यास ने अपने शिष्य वैशम्पायन को यजुर्वेद सिखलाया जिन्होंने इसे याज्ञवल्क्य ऋषि को पढ़ाया। किसी कारण गुरु अपने शिष्य से CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar