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वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

पृष्ठ 166, कुल 353 में से

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पृष्ठ 166

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138 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता रुष्ट हो गए और पठित विद्या को उनसे माँगने लगे। याज्ञवल्क्य ने पठित यजुषों का वमन कर दिया। तब अन्य शिष्यों ने तित्तिर रूप धारण कर उन्हें चुग लिया। यही कृष्ण यजुः हुआ, उधर याज्ञवल्क्य ने सूर्य की आराधना कर नवीन यजुषों को उत्पन्न किया, वही हुआ शुक्ल यजुर्वेद। इन दोनों के रूप में महान् अन्तर है। शुक्ल यजुः में केवल मन्त्रों का ही संग्रह है जिसमें विनियोग वाक्य नहीं है। अतः ब्राह्मण से अभिश्रित होने के कारण यह शुक्ल कहा जाता है। परन्तु 'कृष्ण यजुर्वेद' में छन्दोबद्ध मन्त्रों तथा गद्यात्मक विनियोगों का मिश्रण है। इसी मिलावट के कारण इसे कृष्ण यजुर्वेद कहते हैं। शुक्ल यजुर्वेद की संहिता वाजसनेयी संहिता कहलाती है क्योंकि सूर्य ने वाजी (घोड़े) का रूप धारण कर इसका उपदेश दिया था।'' शुक्ल यजुर्वेद की श्रेष्ठता- पाश्चात्य तथा पौरस्तय वेदज्ञों ने कृष्ण यजुर्वेद की तुलना में शुक्ल यजुर्वेद को अधिक महत्त्वपूर्ण तथा उत्तम बतलाया है। इसीलिए यजुर्वेद के वर्ण्य विषय के विवेचन में शुक्ल यजुर्वेद को ही सर्वत्र आधार बनाया है। यजुर्वेद में मुख्यतः यज्ञ का ही प्रतिपादन हुआ है। यज्ञ के सम्पादन से ही मानव राक्षसी शक्तियों तथा अमानवीय प्रवृत्तियों को परास्त कर अमृतत्व को प्राप्त करता है- 'उद्वयं तमसस्परि स्वः पश्यन्त उत्तरम्। देवं देवत्रा सूर्य्यगन्म ज्योतिरुत्तमम्॥' अर्थात् अज्ञान से प्रकाश की ओर अग्रसर होना, मृत्यु से अमरता की ओर अग्रसर होना, आत्मा की निरन्तर समुन्नति ही अमृतत्व है। कृष्ण यजुर्वेद की अपेक्षा शुक्ल यजुर्वेद में मानवीय जीवन के शुक्ल पक्ष को अधिक स्थान मिला है। उसमें जीवन का उदात्त तथा समुज्ज्वल पक्ष के महत्त्व को स्वीकार किया गया है- 'अस्माकं सन्त्वाशिषः सत्यावः सन्त्वाशिषः॥' (२१६) अर्थात् हमारे नेक विचार तथा श्रेष्ठ मनोकामनाएँ पूर्णता को प्राप्त हों। यजुर्वेद में दीर्घ जीवन की कामना की गई है- 'कुर्वन्नेवेह कर्माणिजिजीविषेच्छतं समाः।' अर्थात् यहाँ हम कर्मरत होकर सौ वर्ष तक जीवित रहें। शुक्ल यजुर्वेद में वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना का स्पष्ट उद्घोष किया गया है-

CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar