वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
पृष्ठ 180, कुल 353 में से
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152 | वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता
अर्थात् हे परवेश के सदृश शक्ति सम्पन्न ! जो तुम उर्ध्व स्वर से वेद का गान करते हुए के सदृश सामवेद का गान करते हो, जैसे चतुर्वेद के ज्ञाता ब्रह्मा के पुत्र के सदृश यज्ञ सम्बन्धी प्रातः कालीन क्रियादि में स्तुति करते हो। तथा- विभिन्न स्थलों में साम की अत्यधिक प्रशंसा की गई है। उसमें 'उच्छिष्ट' तथा 'स्कम्भ' से साम का आविर्भाव बतलाया गया है। एक ऋषि का कथन है कि- 'सामानि॒ यस्य॒ लोमा॑न्यथर्वाङ्गिरसो मुखं स्क॒म्भं तं ब्रू॑हि कत॒मः स्वि॑दे॒व सः' (अथर्व० १०/७/२०) अर्थात् साम जिसके लोम हैं और अथर्वमन्त्र मुख के सदृश हैं, वह कौन सा स्कम्भ है तू निश्चय करके कह। इसी प्रकार एक अन्य मंत्र में भी 'उच्छिष्ट' से ऋक् तथा साम का आविर्भाव बतलाया गया है- ऋच॒ः सामा॑नि॒ च्छन्दां॑सि पुरा॒णं यजु॑षा स॒ह। उच्छिष्टाज्जज्ञिरे॒ सर्वे॑ दि॒वि दे॒वा दि॑वि॒श्रित॑ः।। (अथर्व० ११/७/२७) अर्थात् ऋचाएँ, सामवेद मन्त्र, यजुर्वेद सहित अथर्ववेद मन्त्र तथा पुराण आकाश में सूर्य में ठहरे हुए गतिमान लोक (उच्छिष्ट) से उत्पन्न हुए। एक मन्त्र में ऋक् तथा साम की स्तुति की गई है- ऋचं साम॑ यजामहे याभ्यां॒ कर्मा॑णि कुर्वते॑। ए॒ते सद॑सि राजतो य॒ज्ञं दे॒वेषु॑ यच्छतः।। (अथर्व० ७/५६/१) अर्थात् ऋचाएँ तथा साम का हम सत्कार करते हैं, जिन दोनों के द्वारा वे (समस्त प्राणी) कर्मों को करते हैं। ये दोनों बैठक में विराजते हैं तथा विद्वानों के बीच में संगति दान करते हैं। अतः यह निर्विवाद सिद्ध है कि सामगायन अत्यन्त प्राचीन है। अनेक प्रशंसात्मक उक्तियों के अतिरिक्त वैदिक साहित्य में अनेक स्थानों पर वैदिक सामों का उल्लेख इनकी प्राचीनता को द्योतित करता है। जैसे- ऋग्वेद में वैरूप, वृहत, रैवत, गायत्र, भद्र आदि, यजुर्वेद में रथन्तर, वैराज, वैखानस, वामदेव्य, शाक्वर, रैवत, अभीवर्त तथा ऐतरेय ब्राह्मण में नौधस, रौरव, यौधाजय, अग्निष्टोमीय आदि विभिन्न सामों का उल्लेख है। अतः अति प्राचीन काल में भी साम गायनों का अस्तित्व पूर्णतः सिद्ध हो जाता है।
CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar