वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
पृष्ठ 179, कुल 353 में से
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द्वितीय अध्याय 151 सामवेद वैदिक संहिताओं में सामवेद को सर्वोत्कृष्ट माना जाता है। संहितासाहित्य में साम अत्यन्त महत्त्वपूर्ण तथा गौरवमण्डित स्थान पर आसीन है। जिस प्रकार अग्नि तथा वायु से आदित्य अर्थात् सूर्य श्रेष्ठ है, उसी प्रकार ऋग्वेद तथा यजुर्वेद की तुलना में सामवेद श्रेष्ठ है। मनु तथा याज्ञवल्क्य आदि अनेक ऋषियों के अनुसार ऋग्वेद की उत्पत्ति अग्नि से और यजुर्वेद की उत्पत्ति वायु से हुई है। जबकि सामवेद की उत्पत्ति आदित्य से हुई है। छान्दोग्यउपनिषद् के अनुसार 'सामवेद एवं पुष्पम्' अर्थात् सामवेद वेदरूपी वृक्ष का पुष्प है। इसका तात्पर्य यह हुआ कि सामवेद भी पुष्पित वृक्ष के सदृश अपने अनुरागियों को मात्र आकर्षित ही नहीं करता, अपितु आह्लादित भी करता है। छान्दोग्यउपनिषद् में सामवेद की प्रशंसा में एक उक्ति लिखी है— 'वाचः ऋक् रसः, ऋचः सामः रसः, साम्नः उद्गीथो रस' (१/१/२) अर्थात् वाणी का रस ऋचा है, ऋचा का रस साम है तथा साम का भी रस उद्गीथ है। इस प्रकार उद्गीथ को सामवेद का सार कहा गया है। उद्गीथ ओंकार शब्द का पर्यायवाची है। गीता के कथनानुसार भी 'प्रणवः सर्ववेदेषु' (७/८) तथा अनुगीता में भी 'ओंकारः सर्ववेदानाम्' कहकर समस्त वैदिक संहिताओं में ओङ्कार को सर्वोत्तम बतलाया गया है। ओङ्कार की श्रेष्ठता का प्रतिपादन ही सामवेद की श्रेष्ठता का प्रतिपादन है। भगवद्गीता में भी भगवान् श्री कृष्ण सामवेद को स्वयं का स्वरूप बतलाते हैं— 'वेदानां सामवेदोऽस्मि' अर्थात् मैं वेदों में सामवेद हूँ। ऋग्वेद तथा अथर्ववेद में भी अनेक स्थलों पर सामवेद की पर्याप्त प्रशंसा उपलब्ध होती है। जैसे— यो जा॒गार॒ तमृच॑ः कामयन्ते॒ यो जा॒गार॒ तमु॒ सामा॑नि यन्ति। यो जा॒गार॒ तम॒यं सोम॑ आह॒ तवा॒हम॑स्मि स॒ख्ये न्यौकाः॥१४॥ (ऋ० ५/४४/१४) अर्थात् जो अविद्यारूपी निद्रा से उठके जागरणशील है, उसको ऋचाओं के सदृश जन कामना करते हैं तथा जो अविद्यारूपनिद्रा से उठ के जागरणशील हैं, उसको भी सामवेद के विभाग प्राप्त होते हैं और जो अविद्यारूप निद्रा से उठके जागरणशील हैं उनको यह सोम सदृश निश्चित स्थान वाला मित्रत्व में आपका मैं हूँ, इस प्रकार कहता है। तथा— उद्गा॒तेव॑ शकुने॒ साम॑ गायसि, ब्रह्मपुत्रइ॑व॒ सर्वनेषु शंससि।। (ऋ० २/४३/२)
CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar