वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
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द्वितीय अध्याय 151 सामवेद वैदिक संहिताओं में सामवेद को सर्वोत्कृष्ट माना जाता है। संहितासाहित्य में साम अत्यन्त महत्त्वपूर्ण तथा गौरवमण्डित स्थान पर आसीन है। जिस प्रकार अग्नि तथा वायु से आदित्य अर्थात् सूर्य श्रेष्ठ है, उसी प्रकार ऋग्वेद तथा यजुर्वेद की तुलना में सामवेद श्रेष्ठ है। मनु तथा याज्ञवल्क्य आदि अनेक ऋषियों के अनुसार ऋग्वेद की उत्पत्ति अग्नि से और यजुर्वेद की उत्पत्ति वायु से हुई है। जबकि सामवेद की उत्पत्ति आदित्य से हुई है। छान्दोग्यउपनिषद् के अनुसार 'सामवेद एवं पुष्पम्' अर्थात् सामवेद वेदरूपी वृक्ष का पुष्प है। इसका तात्पर्य यह हुआ कि सामवेद भी पुष्पित वृक्ष के सदृश अपने अनुरागियों को मात्र आकर्षित ही नहीं करता, अपितु आह्लादित भी करता है। छान्दोग्यउपनिषद् में सामवेद की प्रशंसा में एक उक्ति लिखी है— 'वाचः ऋक् रसः, ऋचः सामः रसः, साम्नः उद्गीथो रस' (१/१/२) अर्थात् वाणी का रस ऋचा है, ऋचा का रस साम है तथा साम का भी रस उद्गीथ है। इस प्रकार उद्गीथ को सामवेद का सार कहा गया है। उद्गीथ ओंकार शब्द का पर्यायवाची है। गीता के कथनानुसार भी 'प्रणवः सर्ववेदेषु' (७/८) तथा अनुगीता में भी 'ओंकारः सर्ववेदानाम्' कहकर समस्त वैदिक संहिताओं में ओङ्कार को सर्वोत्तम बतलाया गया है। ओङ्कार की श्रेष्ठता का प्रतिपादन ही सामवेद की श्रेष्ठता का प्रतिपादन है। भगवद्गीता में भी भगवान् श्री कृष्ण सामवेद को स्वयं का स्वरूप बतलाते हैं— 'वेदानां सामवेदोऽस्मि' अर्थात् मैं वेदों में सामवेद हूँ। ऋग्वेद तथा अथर्ववेद में भी अनेक स्थलों पर सामवेद की पर्याप्त प्रशंसा उपलब्ध होती है। जैसे— यो जा॒गार॒ तमृच॑ः कामयन्ते॒ यो जा॒गार॒ तमु॒ सामा॑नि यन्ति। यो जा॒गार॒ तम॒यं सोम॑ आह॒ तवा॒हम॑स्मि स॒ख्ये न्यौकाः॥१४॥ (ऋ० ५/४४/१४) अर्थात् जो अविद्यारूपी निद्रा से उठके जागरणशील है, उसको ऋचाओं के सदृश जन कामना करते हैं तथा जो अविद्यारूपनिद्रा से उठ के जागरणशील हैं, उसको भी सामवेद के विभाग प्राप्त होते हैं और जो अविद्यारूप निद्रा से उठके जागरणशील हैं उनको यह सोम सदृश निश्चित स्थान वाला मित्रत्व में आपका मैं हूँ, इस प्रकार कहता है। तथा— उद्गा॒तेव॑ शकुने॒ साम॑ गायसि, ब्रह्मपुत्रइ॑व॒ सर्वनेषु शंससि।। (ऋ० २/४३/२)
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152 | वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता
अर्थात् हे परवेश के सदृश शक्ति सम्पन्न ! जो तुम उर्ध्व स्वर से वेद का गान करते हुए के सदृश सामवेद का गान करते हो, जैसे चतुर्वेद के ज्ञाता ब्रह्मा के पुत्र के सदृश यज्ञ सम्बन्धी प्रातः कालीन क्रियादि में स्तुति करते हो। तथा- विभिन्न स्थलों में साम की अत्यधिक प्रशंसा की गई है। उसमें 'उच्छिष्ट' तथा 'स्कम्भ' से साम का आविर्भाव बतलाया गया है। एक ऋषि का कथन है कि- 'सामानि॒ यस्य॒ लोमा॑न्यथर्वाङ्गिरसो मुखं स्क॒म्भं तं ब्रू॑हि कत॒मः स्वि॑दे॒व सः' (अथर्व० १०/७/२०) अर्थात् साम जिसके लोम हैं और अथर्वमन्त्र मुख के सदृश हैं, वह कौन सा स्कम्भ है तू निश्चय करके कह। इसी प्रकार एक अन्य मंत्र में भी 'उच्छिष्ट' से ऋक् तथा साम का आविर्भाव बतलाया गया है- ऋच॒ः सामा॑नि॒ च्छन्दां॑सि पुरा॒णं यजु॑षा स॒ह। उच्छिष्टाज्जज्ञिरे॒ सर्वे॑ दि॒वि दे॒वा दि॑वि॒श्रित॑ः।। (अथर्व० ११/७/२७) अर्थात् ऋचाएँ, सामवेद मन्त्र, यजुर्वेद सहित अथर्ववेद मन्त्र तथा पुराण आकाश में सूर्य में ठहरे हुए गतिमान लोक (उच्छिष्ट) से उत्पन्न हुए। एक मन्त्र में ऋक् तथा साम की स्तुति की गई है- ऋचं साम॑ यजामहे याभ्यां॒ कर्मा॑णि कुर्वते॑। ए॒ते सद॑सि राजतो य॒ज्ञं दे॒वेषु॑ यच्छतः।। (अथर्व० ७/५६/१) अर्थात् ऋचाएँ तथा साम का हम सत्कार करते हैं, जिन दोनों के द्वारा वे (समस्त प्राणी) कर्मों को करते हैं। ये दोनों बैठक में विराजते हैं तथा विद्वानों के बीच में संगति दान करते हैं। अतः यह निर्विवाद सिद्ध है कि सामगायन अत्यन्त प्राचीन है। अनेक प्रशंसात्मक उक्तियों के अतिरिक्त वैदिक साहित्य में अनेक स्थानों पर वैदिक सामों का उल्लेख इनकी प्राचीनता को द्योतित करता है। जैसे- ऋग्वेद में वैरूप, वृहत, रैवत, गायत्र, भद्र आदि, यजुर्वेद में रथन्तर, वैराज, वैखानस, वामदेव्य, शाक्वर, रैवत, अभीवर्त तथा ऐतरेय ब्राह्मण में नौधस, रौरव, यौधाजय, अग्निष्टोमीय आदि विभिन्न सामों का उल्लेख है। अतः अति प्राचीन काल में भी साम गायनों का अस्तित्व पूर्णतः सिद्ध हो जाता है।
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द्वितीय अध्याय 153 साम का अर्थ- 'साम' शब्द का एक अतीव सुन्दर निर्वचन बृहदारण्यक- उपनिषद् में उपलब्ध होता है। उसके अनुसार 'सा च अमश्चेति तत्साम्नः सामत्वम्' (बृह०उ० १/३/२२)। अर्थात् साम का निर्वचन सा+अम हुआ। 'सा' का अर्थ है ऋचा तथा 'अम' का अर्थ है स्वर। यह स्वर ही ऋचा को साम का रूप देता है। अतः 'साम' शब्द का निष्पत्ति से प्राप्त अर्थ हुआ ऋक् के साथ सम्बन्धित स्वर प्रधान गायन अर्थात् 'तया सहसम्बद्ध अमो नामस्वरः यत्र वर्तते तत् साम्।' ऋग्वेद में भी अनेक पदों द्वारा स्तुति को गान के साथ संयुक्त किया गया है। जैसे 'एतोन्विन्द्रं स्तवाम शुद्धं शुद्धेन साम्न' (ऋ० ८/९५/७) अर्थात् हम शुद्ध प्रभु की शुद्ध साम गान से स्तुति करें तथा 'इन्द्राय साम गायत' (ऋ० ८/९८/१) अर्थात् प्रभु के लिए साम को गाओ, आदि के द्वारा स्तुति को गान से जोड़ा गया है। स्तुति परमेश्वर की है तथा स्तोता कवि है। कवि की उत्पत्ति साम स्वरावली से होती है- 'त्वष्टा जनयत् साम्नः कविः' (ऋ०२/२३/१७) अर्थात् साम का कवि सर्वज्ञ आपको प्रकट करता है। वे ऋचाएँ जिन पर साम का गायन किया जाता है, 'सामयोनि' कहलाती हैं। साम संहिता इन्हीं सामयोनियों का संकलन है। 'साम' शब्द के मुख्य वाच्य गानों का संकलन- 'गान संहिता' के नाम से जाना जाता है। वस्तुतः 'साम' शब्द दो अर्थों में प्रयुक्त होता है। एक तो ऋक् मन्त्रों के लिए तथा दूसरे ऋक् मन्त्रों के ऊपर गाए जाने वाले गानों के लिए। अतः साम का मूलाधार ऋक् मन्त्र ही है। ऋषियों ने साम तथा ऋक् के प्रगाढ़ सम्बन्ध को द्योतित करने के लिए दाम्पत्य-भाव की कल्पना की है। अथर्ववेद के अनुसार 'अमोऽहमस्मि सा त्वं सामाहमस्म्यृक्त्वं द्यौरहं पृथिवी त्वम्, ताविह सं भवाव प्रजाम जनयावहै' (अथर्व० (१४/२/७१), अर्थात् (हे वधू!) मैं ज्ञानवान हूँ, सो तू (ज्ञानवती है।) मैं सामवेद हूँ, तू ऋग्वेद की ऋचा हैं। मैं सूर्य हूँ और तू पृथिवी है। वे हम दोनों यहाँ पराक्रमी होवें तथा प्रजा को उत्पन्न करें। जब ऋचा संगीत के स्वरों, तानों तथा लयों से बँधी होती है, तो वह 'साम' कहलाती है। जैमिनि ने अपनी मीमांसा के सूत्र २/१/३६ में कहा है- 'गीतिषु सामाख्या' अर्थात् सामवेद की साम संज्ञा गीतों के कारण है। छान्दोग्य उपनिषद् 'स्वर' के साम का स्वरूप कहा गया है। उसके अनुसार 'का साम्नों गतिः ? स्वर इति होवाच' (छा०उ०१/८/४) अर्थात् साम की गति क्या है ? साम की गति स्वर अथवा तान में है। अतः संगीत का सौन्दर्य ही सामवेद को साम संज्ञा से विभूषित करता है। सामवेद का विभाजन :- सामवेद मुख्यतः दो भागों में संविभक्त है- आर्चिक तथा गान। आर्चिक का तात्पर्य है- ऋक् समूह। आर्चिक के भी पूर्वार्चिक तथा
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Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 154 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता उत्तरार्चिक दो भाग हैं। पूर्वार्चिक में ५ अध्याय तथा उत्तरार्चिक में ९ अध्याय हैं। ये अध्याय 'प्रपाठक' की संज्ञा से विभूषित है। पूर्वार्चिक के प्रत्येक प्रपाठक में दो खण्ड उपलब्ध होते हैं। प्रत्येक खण्ड में एक 'दशति' प्राप्त होती है तथा दस ऋचाएँ मिलकर एक दशति का निर्माण करती है। किन्तु ऋचाओं की संख्या के विषय में १० ऋचाओं के नियम का पूर्णतः पालन नहीं किया गया है। किसी खण्ड में दस से कम ऋचाएँ प्राप्त होती हैं, किसी में दस से अधिक प्राप्त होती हैं। इन दशितयों में मन्त्रों के संग्रह का मुख्य आधार छन्द तथा देवताओं की एकता है। इसी आधार को लेकर भिन्न-भिन्न मण्डलों वाली तथा भिन्न-भिन्न ऋषियों द्वारा साक्षात्कृत ऋग्वेदीय ऋचाएँ एक देवता से सम्बन्धित होने के कारण एक स्थान पर एकत्रित कर दी गई हैं। पूर्वार्चिक के ५ प्रपाठकों के नाम निम्नलिखित हैं- १. आग्नेय काण्ड २. ऐन्द्र काण्ड ३. पवमान काण्ड ४. आरण्यक काण्ड ५. महानाम्नी ऋचाएँ आग्नेय में अग्निविषयक मन्त्रों का समूह है। द्वितीय से लेकर चतुर्थ अध्याय तक एक ऐन्द्र पर्व या काण्ड है, इसमें इन्द्र पूर्ण ऐश्वर्य के साथ सबके नियन्त्रण की शक्ति से सम्पन्न वर्णित है। पवमान काण्ड में सोम सम्बन्धी ऋचाओं का संग्रह है। ये ऋग्वेद के नवममण्डल से उद्धृत की गई हैं। इसमें पवमान सोम उद्गीथ अर्थात् ऊपर उठाने वाला है। आरण्डयक काण्ड में उस एक ब्रह्म के अतिरिक्त समस्त सांसारिक प्रपञ्च को अमरणीय सिद्ध किया गया है। प्रभु के सम्पर्क में रहने वालों को आनन्द ही आनन्द है, दुःख नहीं। इसमें अनेक देवता तथा छन्द हैं किन्तु गान विषयक एकता है। अन्त में परिशिष्ट रूप में १० ऋचाएँ दी गई हैं। ये महानाम्नी ऋचाएँ कहलाती हैं। ये अपने अभिधान से ही महानाम वाली है। पूर्वार्चिक में संगृहीत मन्त्रों की कुल संख्या २५० है। जैसा कि पहले भी कहा जा चुका है उत्तरार्चिक में ९ प्रपाठक हैं। आदि के पाँच प्रपाठकों में दो-दो भाग हैं अथवा अध्याय हैं, किन्तु अन्तिम चार प्रपाठकों में तीन- तीन भाग या अध्याय हैं। उत्तरार्चिक में कुल १२२५ मन्त्र हैं। यह संख्या पूर्णतः शुद्ध नहीं है क्योंकि उत्तरार्चिक में से २६७ मन्त्र पूर्वार्चिक से ही उद्धृत हैं। अतः दोनों आर्चिकों की संख्या १८७५ में २६७ पुनरुक्त मन्त्र तथा ९९ नवीन तथा ५ नवीन पुनरुक्त मन्त्रों को निकाल देने पर ऋग्वेद के उद्धृत मन्त्रों की संख्या १५०४ शेष रहती है। इस विषय को निम्नलिखित तालिका द्वारा समझा जा सकता है- CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri द्वितीय अध्याय 155 ऋग्वेद की ऋचाएँ १५०४ + पुनरुक्त २६७ = कुल १७७१ नवीन ऋचाएँ ९९ + पुनरुक्त ५ = कुल १०४ सामवेद की कुल ऋचाएँ = १८७५ पूर्वार्चिक में ऋचाओं की रचना कतिपय छन्दों के आधार पर कतिपय देवताओं के आधार पर होती है, जबकि उत्तरार्चिक में गीतों की रचना प्रमुख यज्ञों के आधार पर की गई है। वस्तुतः उत्तरार्चिक पूर्वार्चिक की एक महत्त्वपूर्ण पूर्ति है। उत्तरार्चिक में जो तीन-चार ऋचाओं के सूक्त हैं, उनमें से अधिकांश की प्रारम्भिक ऋचाएँ पूर्वार्चिक में उपलब्ध होती हैं। शाखाएँ- पतञ्जलि ने सामवेद की एक हजार शाखाएँ बतलाई हैं। शौनक के भी 'चरण व्यूह' में सामवेद की एक हजार शाखाएँ हैं, किन्तु चरणव्यूह के टीकाकार 'महीदास' सामवेद की कुल तीन शाखाओं की उपलब्धि की सूचना देते हैं— १. कोथुमीय शाखा। २. राणायनीय शाखा। ३. जैमिनीय शाखा। कौथुमीय शाखा गुर्जर देश में, राणायनीय शाखा महाराष्ट्र में तथा जैमिनीय शाखा कर्नाटक प्रदेश में अधिक प्रसिद्ध है। विषय विवेचन :- पूर्वार्चिक के पाँच भागों में प्रथम भाग 'आग्नेय काण्ड' में अग्नि आगे ले जाने वाला है। इसमें अग्नि विषयक मन्त्रों का समवाय उपस्थित किया गया है। दूसरा काण्ड 'ऐन्द्र काण्ड' है। यह द्वितीय से लेकर चतुर्थ अध्याय तक फैला है। इसमें इन्द्र की स्तुति सम्बन्धी मन्त्रों का संग्रह है। इन्द्र सर्वाधिक शक्तिशाली देव के रूप में वर्णित है। उससे अधिक शक्ति सम्पन्न हो जाने का तो प्रश्न ही नहीं है। वह अभिञ्जु है, वजबाहु है, सब उसके नियन्त्रण में रहते हैं। वह अपने बल द्वारा पर्वतों को कँपा देता है, जिससे पृथ्वी में भूकम्प आ जाता है। सामवेद के अनुसार 'शस्त्रेण रक्षिते राष्ट्रे शास्त्रचिन्ता प्रवर्तते' अर्थात् शास्त्र से रक्षित राष्ट्र में शास्त्रचिन्ता प्रवृत्त होती है। सम्राट को ऐसा होना चाहिए जिसका शासन प्रजा की रक्षा कर सके। सामवेदानुसार पीड़ित व्यक्ति की रक्षा आवश्यक है, अगर शासन इसमें समर्थ नहीं है तो यह पाप है। ऐन्द्र-काण्ड- अग्नि के अग्रनयन का मार्ग प्रशस्त करता है। समस्त साधक अग्नि से प्रार्थना करते हैं- CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 156 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता 'अग्नि आ याहि वीतये गृणानो हव्यदातये। नि होता सत्सि बर्हिषि।' अर्थात् हे अग्नि देवता! आ जाओ। हमको आगे ले चलो, आलोक में, ज्ञान में, कर्म में भी। हम आपसे हव्य दाति के लिए प्रार्थना करते हैं। तीसरा काण्ड 'पावमान काण्ड' की संज्ञा से विभूषित है। इसमें पवमान-सोम से सम्बद्ध ऋचाएँ संगृहीत हैं। यह सोम भी कवि है। पवमान-सोम का स्वरूप उर्ध्वारोहणकारी है। यह निम्नलिखित पदों से प्रकट होता है— १. 'वायुमारोह धर्मणा' (४८३) २. 'अजीजनद् दिवः ज्योतिर्वैश्वानरं बृहत्' (४८४) ३. 'सिन्धोरूर्मावधिश्रितः' (४८६) १. अर्थात् प्राणायाम रूप धर्म से हवा में चढ़कर चल। २. अर्थात् पतितपावन परमात्मा ने द्युलोक की विचित्र वस्तु के सदृश महान् सूर्य के प्रकाश को उत्पन्न किया। ३. अर्थात् (मेधावी पुरुष) नदी की तरंग पर बैठकर, उसके साथ अति सरलता से बहता है। इसी काण्ड में भक्त सोम का आह्वान करता हुआ कहता है— आ सोम स्वानो अद्रिभिस्तिरो वाराण्यव्यया। जनो न पुरि चम्वोर्विशद्धरिः सदो वनेषु दधिषे॥ (साम० ५१३) अर्थात् हे सोम देवता! आओ, अचल शक्तियों के साथ, शोभन प्राण के साथ मेघ सदृशमन्द ध्वनि करते हुए आओ। अवि से सम्बद्ध ऋत से परिवृत, चारों ओर आक्षादायक हरीतिमा छिटकाते हुए, आवरणों को पार करते हुए आओ। मेरे परमेश्वर! द्यावा पृथ्वी के मध्यस्थित हृदयपुरी में प्रवेश करें। इन्हीं के मध्य में स्थित वेदी पर अपना आसन ग्रहण करो। चतुर्थ काण्ड 'अरण्य काण्ड' के नाम से जाना जाता है। इसमें ईश्वर की व्यवस्था में सभी ऋतुओं को मनोहर बतलाया गया है— वसन्त इन्तु रन्यो ग्रीष्म इन्तु रन्यः। वर्षाण्यनु शरदो हेमन्तः शिशिरः इन्तु रन्यः॥ (साम० ६१६) अर्थात् (चैत्र तथा वैशाख मास) वसन्त ऋतु निश्चय ही रमणीय है, (ज्येष्ठ और आषाढ़ मास) ग्रीष्म ऋतु निश्चय ही मनोहर है, (श्रावण तथा भाद्रपद मास) वर्षा ऋतु, उसके पश्चात् होने वाली (आश्विन तथा कार्तिक मास) शरद ऋतु, (अग्रहायण CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
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द्वितीय अध्याय 157 तथा पौष) हेमन्त ऋतु, (माघ तथा फाल्गुन मास) शिशिर ऋतु निश्चित ही रमणीय होता है। यहाँ पर अरण्य होते हुए भी रण्य दशा है। यहाँ पर शुभ-अशुभ का भेद समाप्त हो जाता है। पूर्वार्चिक के अन्त में दस महानाम्नी ऋचाएँ हैं। उदाहरणार्थ इन ऋचाओं का प्रथम मन्त्र यहाँ उद्धृत किया जाता है- विदा मघवन् विदा गातुमनुश१सिषो दिशः। शिक्षा शचीनां पते पूर्वींणां पुरूवसो॥ (साम० ६४१) अर्थात् हे पर्याप्त धन वाले प्रभो ! तू सर्वज्ञ है, समस्त अपूर्व श्रेष्ठ शक्तियों का स्वामी है। आप ही गन्तव्य स्थान पर ज्ञान कराइए, मार्गों की शिक्षा दीजिए। तू अनेक ज्ञानों का स्वामी है, सनातन है। पूर्वार्चिक के सदृश उत्तरार्चिक भी पाँच एवं चार अर्थात् कुल ९ प्रपाठकों में संविभक्त है, किन्तु उनमें मन्त्र क्रमबद्ध नहीं हैं। जबकि पूर्वार्चिक के मन्त्र क्रमबद्ध हैं। पूर्वार्चिक के समान ही उत्तरार्चिक में भी अनेक विषयों का प्रतिपादन हुआ है। इसकी अन्तिम ऋचाओं में युद्धकला का विस्तृत विवेचन उपलब्ध होता है। उत्तरार्चिक के सम्बन्ध में पाश्चात्य विद्वान् विन्टरनिट्ज़ का कथन है- “We may compare the uttarārcika to a song in which the complete text of the song is given while it is presumed that the melodies are already known.” सामगान पद्धति :- वेदज्ञ ऋषियों ने सामयोनि मन्त्रों के माध्यम से गान मन्त्रों का निर्माण किया। ये गान चार प्रकार के होते हैं। उनके नाम निम्नांकित हैं- १. गेयगान २. आरण्यगान ३. ऊहगान ४. ऊह्यगान (रहस्य गान) इन गानों में प्रथम है- 'गेय गान' अथवा 'ग्रामे गेय गान।' जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है ये गान गाँवों में, साधारण जनता के मध्य पाया जाता था। यह गान पूर्वार्चिक के प्रारम्भिक पाँच अध्यायों के ऊपर होता है। द्वितीय है- आरण्यगान। ये गान आरण्यक काण्ड में प्राप्त मन्त्रों का होता है। गेय-गान के विपरीत ये गान अरण्य में गाने योग्य होते हैं। सामवेद के मर्मज्ञों के अनुसार आरण्य गान के स्तोत्र विचित्र विलक्षणता से पूर्ण है। वे अत्यन्त पावन हैं। अरण्य का पावन वातावरण ही आरण्य
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३. अध्याय ५-६: १४ विद्याएं, ६४ कलाएं, वेदांग एवं व्यावहारिक विज्ञान का समन्वय
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 158 | वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता गान के लिए उपयुक्त है। सामान्य जनता के मध्य इनका अनर्थ हो सकता है। तृतीय है- ऊहगान। यह विशेष रूप से उत्तरार्चिक में उपलब्ध मन्त्रों का होता है। 'ऊह' का अभिप्राय है ऊहन्, किसी उपयुक्त अवसर पर मन्त्रों का सामयिक परिवर्तन। इस विवेचनानुसार ऊहगान सोमयागों के अवसर पर प्रयोग किया जाना चाहिए। चतुर्थ है- ऊह्यगान। ये भी उत्तरार्चिक में प्राप्त मन्त्रों का होता है। ऊह्यगान को 'ऊह्य- रहस्यगान' के नाम से पुकारा जाता है क्योंकि ये रहस्यात्मक हैं। ये गान भी अरण्य गान के सदृश रहस्यात्मक होने के कारण सामान्य जनता के मध्य गायन के लिए वर्जित है। ऊह-गान तथा ऊह्य-गान, गेयगान एवं अरण्य गान की विकृति माने जाते हैं अर्थात् गेयगान में प्रयोग किए जाने वाले स्वर एवं रागादि के आधार पर ऊह-गान तथा अरण्य गान में प्रयोग किए जाने वाले स्वर एवं रागादि के आधार पर ऊह्य-गान का निर्माण हुआ है। पृथक्-पृथक् शाखाओं में ये गान पृथक्-पृथक् संख्या में उपलब्ध होते हैं। सर्वाधिक संख्या में गान जैमिनीय शाखा में निहित हैं-
| कौथुमीय गान | जैमिनीय गान | |
|---|---|---|
| गेय-गान | ११९७ | १२३२ |
| अरण्य-गान | २९४ | २९१ |
| ऊह-गान | १०२६ | १८०२ |
| ऊह्य-गान | २०५ | ३५६ |
| कुल योग | २७२२ | ३६८१ |
| साम के समस्त स्वरमण्डलों की संख्या 'नारद शिक्षा' में उपलब्ध होती है। कुल | ||
| स्वरमण्डल इस प्रकार है- ७ स्वर, ३ ग्राम, २१ मूर्छना और ४९ तान। | ||
| इन सात स्वरों की तुलना वेणु स्वरों में निम्नलिखित ढंग से की जा सकती है- | ||
| साम | वेणु | |
| :--- | :--- | |
| १. प्रथम | मध्यम/म | |
| २. द्वितीय | गान्धार/ग | |
| ३. तृतीय | ऋषभ्/रे | |
| ४. चतुर्थ | षडज/सा | |
| ५. पञ्चम | निषाद/नि | |
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Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri द्वितीय अध्याय 159 | ६. षष्ठ | धैवत/ध | | ७. सप्तम | पञ्चम/प | सामगानों में ये ही ७ तक के अंक विभिन्न स्वरों के स्वरूप को प्रकट करते हैं। सामविकार :- साम संहिता के दोनों भागों में मात्र संहिता पाठ उपलब्ध होता है। इन्हें 'गान' की संज्ञा अवान्तर काल में दी गई है। गान शब्द 'गै' (गान) धातु से निष्पन्न होता है। इन गानों द्वारा संगीत के तत्त्वों के माध्यम से ताल तथा लय का ज्ञान होता है। साम मन्त्रों का सामगानों के रूप में परिवर्तन करने के लिए अनेक शाब्दिक परिवर्तन किए जाते हैं। ये 'सामविकार' कहलाते हैं। सामविकारों की कुल संख्या ६ है, जो निम्नलिखित हैं- १. विकार- यह शाब्दिक परिवर्तन है। यथा 'अग्ने' के स्थान पर 'ओग्नायि' करना। २. विश्लेषण- इसमें एक पद पृथक् कर दिया जाता है। जैसे 'वीतये' के स्थान पर 'वोयि तोया तोया यि' कर दिया जाता है। ३. विकर्षण- इसमें एक ही स्वर का दीर्घकाल तक विभिन्न प्रकार से उच्चारण किया जाता है। जैसे- ये को या २३ यि करके उच्चारित करना। ४. अभ्यास- इसमें किसी भी पद का एक से अधिक बार उच्चारण किया जाता है। जैसे 'तोयायि' का दो बार उच्चारण किया जाता है। ५. विश्रामार्थ- किसी भी पद के मध्य में रुक जाने पर 'विराम' नामक 'सामविकार' होता है। जैसे- 'गृणानों हव्यदातये' में 'ह' पर विराम लिया जाता है। ६. स्तोभ- गायन के अनुकल पदों की 'स्तोभ' संज्ञा है, जैसे औ, होवा, हाउआ आदि। भाषाशास्त्र में इन विकारों का बड़ा महत्त्व है। स्तोभ एवं विष्टुति- स्तुति का एक दूसरा रूप 'स्तोभ' कहलाता है। ये स्तोभ यज्ञ यागों के अवसर पर प्रयुक्त किए जाते हैं। ताण्ड्य ब्राह्मण में इनका विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है। इन स्तोभों की कुल संख्या नौ हैं, जो इस प्रकार है। १. त्रिवृत २. पञ्चदश ३. सप्तदश ४. एकविंश ५. त्रिणव ६. त्रयस्त्रिंश ७. चतुर्विंश ८. चतुश्चत्वारिंश ९. अष्टचत्वारिंश 'विष्टुति' एक विशेष प्रकार की स्तुति की संज्ञा है। इस स्तुति में स्तोभ को तृचों CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 160 वैदिक वाङ्गमय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता पर साम के गानों की आवृत्ति की जाती है। प्रत्येक तृच तीन पर्यायों में गाया जाता है। अतः नौ स्तोभों की कुल विष्टुतियाँ २८ हुई। सामगान के पञ्चभाग :- सामगान की प्रणाली अत्यन्त जटिल है। सामगान के पञ्चविभाग होते हैं- १. प्रस्ताव- वह मन्त्र पूर्वांश है। प्रस्तोता को 'प्रस्तोत' संज्ञक ऋत्विज् गाता है। २. उद्गीथ- इसका प्रारम्भ ओ३म् से किया जाता है। इसे 'उद्गाता' गाता है। ३. प्रतिहार- इसे प्रतिहर्त्ता गाता है। यह कभी-कभी दो भागों में विभाजित कर दिया जाता है। ४. उपद्रव- यह पुनः उद्गाता द्वारा ही गया जाता है। ५. निधन- इसमें ओ३म् रहता है। इसे प्रस्तोता, उद्गाता एवं प्रतिहर्त्ता- तीनों ऋत्विजों द्वारा गया जाता है। उदाहरणार्थ सामवेद का प्रथम मन्त्र प्रस्तुत है- अग्न आ याहि वीतये गृणानो हव्यदातये। नि होता सत्सि बर्हिषि॥ १॥ इसका गायन निम्नलिखित रूप में होगा। १. हुँ ओग्नाई (प्रस्ताव) २. ओ३म् आयाहि वीतये गृणानो हव्यदातये (उद्गीथ) ३. नि होता सत्सि बर्हिषि ओ३म् (प्रतिहार) ४. नि होता सत्सिब (उपद्रव) ५. र्हिषि ओ३म् (निधन)। यह साम जब तीन बार गाया जाता है, तो 'स्तोभ' कहलाता है। छान्दोग्य उपनिषद् के अनुसार साम के सात प्रकार हैं- १. हिंकार, २. प्रस्ताव, ३. आदि, ४. उद्गीथ, ५. प्रतिहार, ६. उपद्रव, ७. निधन। सामवेद का महत्त्व :- इस प्रकार सामसंहिता का भारतीय यज्ञों एवं आभिचारिक इतिहास के लिए अति महत्त्व है। यज्ञीय आवश्यकता के अतिरिक्त भारतीय संगीत-शास्त्र का मूल आधार इसके साम-गायन में ही है। इसका अर्थ यह है कि विनियोगात्मक, कलात्मक एवं आध्यात्मिक दृष्टि से भी साम-संहिता वैदिक वाङ्गमय में अत्यन्त उपयोगी संहिता के रूप में मान्य है। एक ओर तो साम-संगीत · CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
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द्वितीय अध्याय 161 हमारे हृदय की वीणा के तारों को झंकृत करते हैं, तो दूसरी ओर साम-संहिता के प्रार्थना मन्त्रों का संग्रह भक्ति रूपी गंगा में स्नान का आनन्द प्रदान करता है। सामवेद में सोम विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है, तथा दार्शनिक दृष्टि से यह सोम शिवतत्त्व के रूप में स्वीकृत है। अतः सामसंहिता संगीत एवं भक्ति के माध्यम से शिव तत्त्व की प्राप्ति का साधन है। शतपथ-ब्राह्मण में तो सामवेद तथा सामगान के महत्त्व के विषय में यहाँ तक लिखा है कि "न असाम यज्ञो भवति। नवा अहिंकृत्य सामगीयते।" अर्थात् कोई भी यज्ञ सामगान के बिना पूर्ण नहीं होता है तथा सामगान भी हिंकार के बिना सम्भव नहीं। इससे सामवेद तथा उसके सामगान का महत्त्व स्पष्ट हो जाता है।
CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 162 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता अथर्ववेद अपनी विशिष्ट विषयसामग्री के कारण अथर्ववेद चतुर्वेदों में अन्यतम है। अथर्ववेद के महत्त्व के अनेक कारण हैं। वेदत्रयी आमुष्मिक फलप्रद हैं, परन्तु अथर्ववेद ऐहिक तथा आमुष्मिक अर्थात् परलोक सम्बन्धी फलों का प्रदाता है। इस ऐहिक जीवन में मनुष्य अपने जीवन को आनन्दमय बनाना चाहता है, इस कार्य के लिए अनेक साधनों की आवश्यकता होती है। उन साधनों को प्राप्त करने के लिए नाना प्रकार के अनुष्ठान किए जाते हैं। उन अनुष्ठानों का विस्तृत विवेचन इस वेद में उपलब्ध होता है। इस विषय में आचार्य सायण का कथन प्रस्तुत है— व्याख्याय वेदत्रितयमामुष्कि फलप्रदम्। ऐहिकामुष्मिक फलं चतुर्थ व्याचिकीर्षति॥ यज्ञ चार पुरोहितों द्वारा सम्पादित होता है— श्रोता, अध्वर्यु, उद्गाता तथा ब्रह्मा। इनमें से चतुर्थ पुरोहित (ब्रह्मा) का साक्षात् सम्बन्ध इसी वेद से है। सर्वकर्माभिज्ञ होने के कारण ब्रह्मा यज्ञ का अध्यक्ष होता है। वह शेष तीन पुरोहितों द्वारा होने वाली यज्ञ सम्बन्धी त्रुटियों का निराकरण भी करता है। चतुर्वेद का ज्ञाता होते हुए भी उसका मुख्य वेद अथर्ववेद ही है। गोपथ-ब्राह्मण के अनुसार वेदत्रयी द्वारा सम्पादित यज्ञ में यज्ञ का एक पक्षीय संस्कार हो पाता है। ब्रह्मा ही मन के द्वारा यज्ञ के द्वितीय पक्ष का संस्कार करता है— स वा एष त्रिभिर्वेदैर्यज्ञस्यान्तरः पक्षः संस्क्रियते। मनसैव ब्रह्मा यज्ञस्यान्यतरं पक्षं संस्करोति॥ (गो०ब्रा० ३।१२) ऐतरेय ब्राह्मण ने भी इस विषय का समर्थन किया है— 'अयं वैयज्ञो योऽयं पवेतः। तस्य वाक् च मनश्च वर्तन्यौ। वाचा चहि मनसा च यज्ञोऽवर्तत। इयं वै वाम्। अदोमनः। तद्वाचा त्रय्या विद्यैकं पक्षम्, संस्कुर्वन्ति मनसैव ब्रह्मा संस्करोति।।' (ऐत०ब्रा० ५/३३) अर्थात् स्वयं अथर्ववेद के परिशिष्ट में कहा गया है कि जिस राजा के राज्य में अथर्ववेद का विद्वान् रहता है, वह राष्ट्र विघ्नरहित होकर निरन्तर प्रगति के पथ पर अग्रसर होता है— यस्य राज्ञो जनपदे अथर्वा शान्तिपारगः। निवसत्यपि तद् राष्ट्रं वर्धते निरूपद्रवम्॥ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri द्वितीय अध्याय 163 तस्माद् राजा विशेषेण अथर्वाण जितेन्द्रियम्। दान सम्मान सत्कारैर्नित्यं समभिपूजयेत्॥ आचार्य सायण का स्पष्ट मत है कि ऐहिक फल के प्रदाता शान्तिक एवं पौष्टिक कर्म, राज्याभिषेक आदि राजा कर्म, असीमित फलदायक तुला पुरुषादि दोनों का प्रतिपादन अथर्ववेद में ही उपलब्ध होता है, अतः पौरोहित्यार्थ अथर्ववेद श्रेष्ठ है। अथर्ववेद की प्रशंसा में स्कन्द पुराण में कहा गया है— 'नतिथिर्न च नक्षत्रा न ग्रहो न च चन्द्रमाः। अथर्वमन्त्र सम्प्राप्त्या सर्वसिद्धिर्भविष्यति।' और भी— यस्तत्राथर्ववणान् मन्त्रान् जपेच्छ्रद्धासमन्वितः। तेषामर्थोद्भवं कृत्स्नं फलं प्राप्नोति स ध्रुवम्॥ अथर्ववेद के अनेक अभिधान प्राप्त होते हैं। यथा- अथर्ववेद, सोमवेद, ब्रह्मवेद, अङ्गिरोवेद, अथर्वाङ्गिरस वेद आदि। यजुर्वेद में सोम को ब्राह्मणों का राजा कहा गया है। ब्रह्मा यज्ञकर्म का अध्यक्ष होने से राजा के सदृश है। अतः ब्रह्मा की भी सोम संज्ञा हो जाती है। इस कारण अथर्ववेद को 'ब्रह्मवेद' एवं 'सोमवेद' के अभिधान प्राप्त हुए हैं। गोपथ ब्राह्मणानुसार अथर्व भृगु के पुत्र थे तथा भृगु ब्रह्मा के पुत्र थे। एक ही नाम के कई ऋषि हुए हैं, इसीलिए कहीं अथर्वा भार्गव है, तो कहीं भृगु आथर्वण हैं। कुछ विद्वानों के अनुसार ये पृथक्-पृथक् ऋषि हैं, केवल उनकी संज्ञा समान है। अथर्वण तथा आङ्गिस आदि ऋषियों ने ही इस वेद के अधिकांश मन्त्रों का साक्षात्कार किया है, अतः यह वेद 'अथर्वाङ्गिरसवेद' कहलाता है। इस संज्ञा के होने का एक और कारण भी हो सकता है। वह यह कि आङ्गिरस का अर्थ होता है अभिचार मंत्र। इन मन्त्रों का प्रयोग मारण तथा मोहन के लिए बहुधा किया जाता है। इस प्रकार के अनेक मन्त्र इस वेद में संगृहीत हैं। इस वेद की अथर्ववेद संज्ञा होने को विद्वानों ने भिन्न-भिन्न कारणों द्वारा सिद्ध किया है। कतिपय विद्वानों का मत है कि अथर्वा ऋषि द्वारा साक्षात्कृत होने के कारण यह अथर्वसिद्ध कहलाता है। जिन ऋषियों ने अथर्वमन्त्रों का साक्षात्कार किया, वे अनेक हैं। जैसे- काण्व, बादरायण, मरीचि, पुरुमीढ, अगस्त्य, जमदग्नि, वामदेव, ब्रह्मा तथा अथर्वा आदि। इन सबमें अथर्वा का नाम बहुलता से प्राप्त होता है। इसीलिए इसकी 'अथर्ववेद' संज्ञा हुई। गोपथ ब्राह्मण (१/४) तथा निरुक्त (११/२/१७) दोनों में 'अथर्व' शब्द की व्याख्या की गई है। गोपथ ब्राह्मणकार ने तो अथर्व की पूर्णतः नवीन रूप में निरुक्ति की है। उसका कथन है— CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 164 वैदिक वाङ्गमय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता 'अथर्वाङ्गः एनमेता स्वेव अप्सु अन्विच्छ इति। तद्यद् अब्रवीत् अथ अर्वाङ् एन मे तास्वे अप्सु, अन्विच्छ इति तदथर्वाऽभवत्॥' (१/४) इसका अभिप्राय यह है कि इस आत्मतत्त्व को इस ओर, यहीं इन भाव प्रवाहों में, अपने कर्मों में ढूँढों। बाह्य जगत् में अस्तित्त्वार्थ संघर्ष प्रवर्तमान है। शान्ति तो भीतर है। अतः इसे अन्दर ही खोजों, यह कहने वाला 'अथर्वा' कहलाता है, इसीलिए यह वेद 'अथर्ववेद' की संज्ञा से विभूषित हो गया। निरुक्तकार ने अथर्वा को कुछ पृथक् ढंग से सिद्ध किया है। उसके अनुसार अ+थर्व। अथर्वाणः अथनवन्तः। थर्वतिश्चरति कर्मातत्प्रति सेधः (११/१८)। 'थर्व' धातु कौटिल्य तथा हिंसार्थक हैं, अतः 'अथर्व' शब्द का अर्थ होता है- अकुटिलता तथा अहिंसा वृत्ति द्वारा मन को अविचल रखने वाला व्यक्ति इस निर्वचन को सिद्ध करने वाले मंत्रों तथा प्रसंगों का वेद में बाहुल्य है, अतः 'अथर्ववेद' नाम सार्थक है। प्रायः अधिकांश भाष्यकारों ने इस व्युत्पत्ति को स्वीकार किया है। शाखाएँ :- पतञ्जलि ने अपने 'महाभाष्य' के 'पस्पशाह्निक' में 'नवधाऽथर्वणो वेदः' कहकर अथर्ववेद की नौ शाखाओं का नामोल्लेख किया है। 'प्रपञ्च हृदय', 'चरणव्यूह' तथा 'सायणभाष्य' के उपोद्घात में भी नौ शाखाओं का उल्लेख किया गया है किन्तु उनके नामों में भिन्नता है। इनकी परस्पर तुलना करने पर नाम निम्नलिखित प्रकार से होंगे- १. पिप्पलाद, २. स्तौद, ३. मौद, ४. शौनकीय, ५. जाजल, ६. जलद, ७. ब्रह्मवद, ८. देवदर्श, ९. चारण। इन नौ शाखाओं में से पिप्पलाद तथा शौनक शाखाओं से सम्बन्धित कुछ ग्रन्थ प्राप्त होते हैं। अन्य शाखाएँ तो नामावशेष ही हैं। अथर्ववेद का विभाजन :- अथर्ववेद का विभाजन काण्डों, सूक्तों में किया गया है। सूक्त के अन्तर्गत मन्त्र संगृहीत है। अथर्ववेद में २० काण्ड, ६३१ सूक्त और लगभग ६ हजार मन्त्र हैं। प्रारम्भिक सात काण्ड अति लघु है। प्रथम काण्ड के हर एक सूक्त में नियमतः ४ मन्त्र, द्वितीय काण्ड के प्रत्येक सूक्त में ५ मन्त्र, तृतीय काण्ड के प्रत्येक सूक्त में ६ मन्त्र, चतुर्थ काण्ड के प्रत्येक सूक्त में ७ मन्त्र तथा पञ्चम काण्ड के प्रत्येक सूक्त में ८ मन्त्र प्राप्त होते हैं। षष्ठ काण्ड में कुल १४२ सूक्त हैं। इसके प्रत्येक सूक्त में लगभग तीन मन्त्र हैं। सप्तम काण्ड के ११८ सूक्तों में अधिकांश सूक्त एक या दो मन्त्रों वाले हैं। ८ से लेकर १२ तक के काण्डों में बृहत्काय सूक्त CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
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द्वितीय अध्याय 165 संकलित हैं। इन सूक्तों में विषयों की विविधता दृष्टिगोचर होती हैं। तेरहवें काण्ड से लेकर अठारहवें काण्ड तक के सूक्तों के विषयों में एकरूपता के दर्शन होते हैं। चौदहवें काण्ड में केवल दो वृहत्काय सूक्त हैं। सोलहवें काण्ड में १०३ मन्त्र हैं। सत्राहवें काण्ड में केवल एक सूक्त है जिसमें कुल ३० मन्त्र हैं। १८वें काण्ड में भी बड़े-बड़े सूक्तों में विविध विषय वर्णित हैं। अन्तिम दो काण्ड 'खिल काण्ड' के नाम से प्रसिद्ध हैं। ये अपेक्षाकृत नवीन माने जाते हैं। उन्नीसवें काण्ड में ७२ सूक्त हैं। अन्तिम काण्ड में ९५८ मन्त्र हैं जो ऋग्वेद से लिए गए हैं। अथर्ववेद का पञ्चमांश अर्थात् १२०० मन्त्र ऋग्वेद से उद्धृत किये गए हैं। ये मन्त्र मुख्यतः प्रथम, अष्टम तथा दशम मण्डलों से लिए गए हैं। 'अथर्ववेद' के अन्तिम काण्ड में निहित कुन्तापसूक्त के मन्त्र ऋग्वेद में नहीं प्राप्त होते हैं। अतः संभवतः उन्हें ऋग्वेद की किसी अन्य शाखा से ग्रहण किया गया है। विषय-विवेचन :- अथर्ववेद में दार्शनिक, सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, आयुर्वेदिक, अभिचारिक आदि विषयों का विस्तृत विवेचन हुआ है। आचार्य सायण ने अपनी अथर्ववेदीय भाष्य-भूमि में अथर्ववेद प्रतिपाद्य विषयों को प्रस्तुत किया है। काण्डों के क्रम से अथर्ववेद का प्रतिपाद्य विषय इस प्रकार है- १. प्रथम काण्ड में विभिन्न रोगों की निवृत्ति, पाशमोचन एवं शान्ति प्राप्ति प्रभृति विषय वर्णित हैं। २. द्वितीय काण्ड में रोग, शत्रु एवं कृमि विनाशपरक तथा दीर्घायुष्यदायक मन्त्र संगृहीत हैं। ३. तृतीय काण्ड में शत्रु, सैन्य, सम्मोहन, राजनिवार्चन, कृषि एवं पशुपालनादि वर्णित हैं। ४. चतुर्थ काण्ड में ब्रह्मविद्या एवं विषनाशन, राज्याभिषेक, वृष्टि आदि से सम्बन्धित मन्त्र हैं। ५. पञ्चम काण्ड में ब्रह्मविद्या एवं कृत्या परिहारपरक मन्त्र संकलित हैं। ६. षष्ठ काण्ड में दुःस्वप्न नाशक तथा अन्य प्रकार की समृद्धि सम्बन्धी मन्त्र एकत्रित हैं। ७. सप्तम काण्ड में वे मन्त्र संगृहीत हैं, जिनमें आत्मतत्त्व का चिन्तन एवं विवेचन परिलक्षित होता है। ८. अष्टम काण्ड में उपलब्ध मन्त्रों में विराट् ब्रह्म के स्वरूप की चर्चा की गई है।
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Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 166 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता ९. नवम काण्ड में मधुविनाशकपरक मन्त्रों का संग्रह है। १०. दशम काण्ड वें ब्रह्मविद्या, सर्पविनाशन, ज्येष्ठ-ब्रह्म का महत्त्व वर्णित है। ११. ग्यारहवें काण्ड में ब्रह्मोदन, रुद्र आदि विषयों पर सामग्री प्रस्तुत की गई है। १२. बारहवें काण्ड में पृथ्वी सूक्त है जिसमें मातृभूमि की उपासना की गई है। १३. तेरहवाँ काण्ड अध्यात्म भावना से परिपूर्ण हैं, उसमें दार्शनिक विवेचन दृष्टिगत होता है। १४. चौदहवें काण्ड में विवाह संस्कार का प्रमुख रूप से वर्णन किया गया है। १५. पन्द्रहवाँ काण्ड व्रात्य काण्ड है, इसमें व्रात्यों का वर्णन हुआ है। १६. सोलहवें काण्ड में दुःस्वप्न का नाश करने वाले मन्त्रों का संग्रह उपलब्ध होता है। १७. सत्रहवें काण्ड में अपने अभ्युदय के लिए प्रार्थना विषयक मन्त्रों का संग्रह हुआ है। १८ अठारहवें काण्ड में पितृमेध यज्ञ परक मन्त्र संगृहीत हुए हैं। १९. उन्नीसवें काण्ड में यज्ञ, नक्षत्र, मणि तथा छन्दों के नाम आदि अनेक विषयों का विवेचन है। २०. बीसवें काण्ड में सोमयाग सम्बन्धी तथा इन्द्रश्रुतिपरक मन्त्र प्राप्त होते हैं। इस प्रकार हम देखते हैं कि अथर्ववेद की विषयवस्तु, वेदत्रयी की विषयवस्तु की तुलना में अत्यधिक विस्तृत तथा आश्चर्यजनक है। इसमें जिन विषयों की चर्चा की गई है उन्हें मुख्य रूप से तीन भागों में बाँटा जा सकता है— १. अध्यात्म, २. अधिभूत, ३. अधिदैवत इनमें से अध्यात्म प्रकरण में ब्रह्म तथा चार आश्रमों का वर्णन किया गया है। अधिभूत प्रकरण में सम्राट, शासन-व्यवस्था, संघर्ष, शत्रुवाहनादि नाना विषयों का वर्णन मिलता है। अधिदैवत प्रकरण में अनेक देवताओं, यज्ञों तथा कालविषयक सामग्री का संकलन किया गया है। अब तक किए गये स्थूल विवेचन के पश्चात् सम्प्रति कतिपय महत्त्वपूर्ण सूक्तों तथा विषयों का विस्तारपूर्वक विवेचन प्रस्तुत है— १. भैषज्य सूक्त :- अथर्ववेद के इस प्रकरण में ऐसे मन्त्रों का संग्रह है जो कि विभिन्न रोगों की चिकित्सा से सम्बद्ध है। भारतवासियों का एक वर्ग यह विश्वास करता है कि राक्षस परम्परा ही विभिन्न रोगों का मूल कारण है। ये राक्षस कदाचित् बाह्य या आन्तरिक रूप से शरीर को कष्ट पहुँचाते हैं। इस सूक्त के मन्त्रों में औषधि औषधिलता तथा जल की प्रशंसा की गई है। कौशिक-सूक्त में इन मन्त्रों की सहायता CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri द्वितीय अध्याय 167 से किए जाने वाले जादू-टोनों का वर्णन हुआ है। इसमें ज्वर, कास, गण्डमाला, यक्ष्मा, दंतपीड़ा तथा कुष्ठ आदि रोगों तथा उनकी औषधियों का भी वर्णन मिलता है। इन मन्त्रों में कुछ तो चिकित्सात्मक औषधियों के आवाहन के रूप में दिखाई देती हैं। निम्न मन्त्र में कुष्ठ-निवारणार्थ औषधि का आवाहन किया गया है- न॒क्तं॒जा॒तस्योष॑धे॒ रामे॑ कृ॒ष्णे अ॑सि॒क्नि च॑। इ॒दं र॑जनि॒ रजय किलासं॑ प॒लितं॑ च॒ यत्॥ किलासं॑ च प॒लितं॑ च॒ निर्इ॒तो ना॑शया॒ पृष॑त्। आ त्वा॒ स्वो वि॑शतां॒ वर्णः॒ परा॑ शु॒क्ला॒नि॑ पातय॥ (अथर्व १-२३-१-२) अर्थात् हे उष्णता रखने वाली औषधि! तू रात्रि में उत्पन्न हुयी है, तो तू रमण करने वाली, चित्त को आकर्षित करने वाली तथा निर्बन्ध है। हे उत्तम रंग करने वाली! तू यह जो रूप का बिगाड़ने वाला कुष्ठ आदि शरीर का श्वेतपन रोग है, उसे रगड़ दे। अर्थात् (हे औषधि) इस रूप बिगाड़ने वाले कुष्ठ आदि रोग को और शरीर के श्वेतपन और विकृत चिह्न का निरन्तर नाश कर दे। अपना रंग तुझमें प्रविष्ट हो जाये और (तू) श्वेतचिह्नों को गिरा दे। यक्ष्मा-निवारण हेतु प्रार्थना इस प्रकार की गयी है- अ॒क्षीभ्यां॑ ते॒ नासि॑काभ्यां॒ कर्णा॑भ्यां॒ चुबु॑का॒दधि॑। यक्ष्मं॑ शी॒र्ष॒ण्यं॑ म॒स्तिष्का॑ज्जि॒ह्वाया॒ वि वृ॑हामि ते॥ ग्री॒वाभ्य॑स्त उ॒ष्णिहा॑भ्यः॒ कीक॑साभ्यो अनू॒क्या॑त्। यक्ष्मं॑ दो॒षण्य॒मंसा॑भ्यां बा॒हुभ्यां॒ वि वृ॑हामि ते॥ अर्थात् तेरे दोनों नेत्रों से, दोनों नथुनों से, दोनों कर्णों से, ठोड़ी से, तेरे दिमाग से, जिह्वा से तथा शिर से क्षयी रोग को मैं उखाड़ता हूँ। अर्थात् तेरे गले की नाड़ियों से, गुद्दी की नाड़ियों से, हँसली की हड्डियों से, रीढ़ से, तेरे दोनों कंधों से, तेरी दोनों भुजाओं से, मुड्ढे से क्षयी रोग को, मैं उखाड़े देता हूँ। दूसरे प्रकार की प्रार्थनाएँ वे है, जो जलपरक है। इन स्तुतियों में चिकित्सा की विशिष्ट शक्ति का जल में विधान स्वीकार किया गया है। कतिपय प्रार्थनाएँ अग्निपरक है। यह अग्नि भारतीयों के मत में राक्षसों को सर्वाधिक पीड़ित करने वाली हैं। अनेक मन्त्र तक्मन् नामक ज्वर से सम्बन्धित हैं, जिसकी अथर्ववेद में राक्षस के रूप में CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
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168 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता कल्पना की गई है। अथर्ववेद में अनेक वृक्षों से सम्बन्धित मन्त्र हैं। ये वृक्ष रोग शमनार्थ प्रभावशाली हैं। अथर्ववेद में विभिन्न प्रकार के मानवीय रोगों की कुल संख्या ९९ बतलाई गयी है। कतिपय मन्त्रों में रोग का प्रसार करने वाली कीटाणुओं का भी वर्णन उपलब्ध होता है। अथर्ववेद में अनेक मन्त्रों में एक व्यक्ति को छोड़कर दूसरे व्यक्ति के पास रोग को पहुँचा देने या किसी दूसरे देश में भेज देने का भी वर्णन प्राप्त होता है निम्नलिखित मन्त्र में रोग को अन्य देश में भेजने की प्रार्थना है— यथा॒ मनो॑ मनस्कृ॒तैः परा॑पत॒त्याशु॒मत्। ए॒वा त्वं का॒से प्र प॑त॒ मनु॑सो॒ऽनु॑ प्र॒वाय्य॒म्॥ (अथर्व ६/१०५/१) जैसे मन, मन के विषयों के साथ शीघ्रता से आगे बढ़ता है, वैसे ही तू कास ज्ञान या उपाय के बीच मन के प्राप्ति योग्य देश की ओर आगे बढ़। इस प्रकार यह सिद्ध होता है कि इस वेद में आयुर्वेद का विपुल महत्त्व वर्णित है। आयुष्य सूक्त :- अथर्ववेद में ऐसे अनेक मन्त्र संगृहीत हैं जो स्वास्थ्य तथा दीर्घ जीवन से सम्बन्धित हैं। इस प्रकार के मन्त्र 'आयुष्मनि सूक्तानि' के नाम से पुकारे जाते हैं। इनका तात्पर्य स्पष्टतः दीर्घआयुदायक सूक्त है। आयुष्य-सूक्त में मिलने वाले मन्त्र मुख्यतः पारिवारिक उत्सवों के अवसर पर प्रयुक्त होते हैं। यथा— बालक का मुण्डन, युवक का गोदान एवं उपनयन संस्कारादि। इन मन्त्रों में शतायु तथा पूर्णतः नीरोग होने की परमात्मा से प्रार्थना की गई है। इन मन्त्रों में सौ प्रकार की मृत्युओं से स्वयं की रक्षा करने तथा लगभग सभी रोगों से बचने के लिए प्रार्थनाएँ ग्रथित हैं। इन रोगों के निवारणार्थ जिन औषधियों का आह्वान किया जाता है, इन औषधियों का प्रयोग एन्द्रजातिक चिकित्सक के द्वारा किया जाता है। इन प्रार्थना- मन्त्रों में आयु की वृद्धि हेतु कुछ ऐसे भी मन्त्र मिलते हैं, जिनमें इस विषय के निमित्त हाथ में 'रक्षासूत्र' अथवा 'रक्षा-करण्ड' को बाँधने का विधान बतलाया गया है। इस रक्षा-करण्ड को बाँधने वाला जीवधारी जीवन पर्यन्त उत्तम स्वास्थ्य का लाभ करता है। अथर्ववेद का १७वाँ काण्ड इसी प्रकार के सूक्तों से परिपूर्ण है। इस काण्ड में मात्र एक-एक ऋचा वाले तीस मन्त्र उपलब्ध होते हैं। निम्नलिखित मन्त्र में देवों तथा मानुषी दोनों प्रकार की शक्तियों से रक्षार्थ प्रार्थना निहित है— परी॑वृतो॒ ब्रह्म॑णा॒ वर्म॑णाहं कश्य॒पस्य॒ ज्योति॑षा॒ वर्च॑सा च। मा मा॑ प्राप॒न्त्रिष॑वो॒ दैव्या॑ या मा मानु॑षी॒रव॑सृष्टा व॒धाय॑॥ (अथर्व० १७/२८)
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Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri द्वितीय अध्याय 169 अर्थात् कश्यप के वेदज्ञान से, आश्रय से, ज्योति से और प्रताप से मैं ढका हूँ। जो दैवी वाण हैं, वे मुझको न पहुँचे और मानुषी छोड़े हुए (वाण) मारने के लिए न पहुँचे। पौष्टिक सूक्त :- पौष्टिक सूक्तों में ऐसे मन्त्र उपलब्ध होते हैं जिनमें विभिन्न वर्गों के लोग अपनी समृद्धि के लिए परमात्मा से प्रार्थना करते हैं। इन सूक्तों में गृहस्थ जन गृह निर्माण के लिए, कृषक वर्ग हल जोतने के लिए, बीज बोने के लिए, शस्य की समृद्धि के लिए परमात्मा की उपासना करते हैं। इन्हीं मन्त्रों के द्वारा समाज, व्यवसायी तथा श्रमिक वर्ग अपनी-अपनी महत्त्वाकांक्षाओं की पूर्ति की आशा करता है। इन्हें आशीर्वचन की संज्ञा से विभूषित किया जा सकता है। वन्य पशुओं से गायों की रक्षा तथा चोरादि सामाजिक अपराधियों से धन-धान्य की रक्षा हेतु मन्त्र संकलित है। इन मन्त्रों में अनेक मन्त्र ऐसे भी मिलते हैं जिनमें उच्च कोटि का साहित्य उपलब्ध होता है। इन मन्त्रों में कल्पना की उर्वरता, विचारों की नवीनता, विन्यास की मञ्जुलता तथा अलंकारों की रमणीयता दर्शनीय है। निम्नलिखित मन्त्र दृष्टि-सूक्त से उद्धृत है। इसमें वृष्टि का अत्यन्त आकर्षक, सरस तथा स्वाभाविक वर्णन प्राप्त होता है- अ॒भि क्र॑न्द स्तन॒यार्द॑योद॒धिं भूमिं॑ पर्जन्य॒ पय॑सा सम॒ङ्ग्धि। त्वया॑ सृ॒ष्टं ब॑हु॒लमैटु॑ वृ॒र्षमाशा॑रे॒षी कृ॒शगु॒रैत्वस्त॑म्॥ (अथर्व० ४/१५/६) अर्थात् हे मेघ ! तू सभी ओर गर्जन कर, गड़गड़ा, समुद्र को हिला दे, भूमि को जल से भर दे। तेरे द्वारा भेजा हुआ वृष्टि जल आवें। अधिक पदार्थ लाने वाला, शरण चाहने वाला, दुर्बल गाय तथा बैलों वाला किसान स्वगृह की ओर प्रस्थान करे। शृङ्गार सूक्त :- अथर्ववेद में ऐसे मन्त्रों का भी एक विशाल संग्रह प्राप्त हैं जिनमें जीवन की प्रसन्नता तथा भय से सुरक्षा आदि के लिए प्रार्थनाएँ की गई हैं, इन्हें शृङ्गार सूक्त के नाम से पुकारा जाता है। इन सूक्तों का एक नाम और भी है- प्रसाद सूक्त। इनमें भूतों इत्यादि से रक्षा के लिए मंत्र मिलते हैं। इस प्रकार के मन्त्रों का प्राप्तिस्थल प्रधानतः चौथे काण्ड के अन्तर्गत निहित २३वें सूक्त से २९वें सूक्त तक हैं। इस प्रकार ये कुल सात सूक्त हैं। इन समस्त सूक्तों में से हर एक सूक्त सात ऋचाओं वाला है। इन सूक्तों में जिनके प्रति सम्बोधन किया गया है, वे देव क्रमशः इस प्रकार हैं- अग्नि, इन्द्र, वायु, सविता, स्वर्गमरूत, भव तथा शर्व, मित्र एवं वरुण। इन सूक्तों का प्रत्येक मन्त्र कष्ट निवारणार्थ की जाने वाली प्रार्थना के रूप में है- CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
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170 \hspace{3cm} वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता अप॒ः स॑मु॒द्राद् दिव॒मुद् व॑हन्ति दिव॒स्पृथि॒वीम॒भि ये सृज॑न्ति। ये अ॒द्भििरीशा॑ना म॒रुत॒श्चर॑न्ति ते नो॑ मुञ्चन्त्वंह॑सः॥ \hspace{8cm} अथर्व० (४/२७/४) अर्थात् जो (वायुगण) जल को पृथ्वी (समुद्र) से उठाकर आकाश में पहुँचाते हैं और आकाश से पृथिवी पर त्याग देते हैं और जो समर्थ वायुगण जल के साथ चलते हैं, वे हमें कष्ट से छुड़ावें। प्रायश्चित सूक्त :- अथर्ववेद में कतिपय सूक्त ऐसे भी प्राप्त होते हैं जिनमें किए गए पापों के प्रायश्चितपरक मन्त्र संगृहीत होते हैं, इस प्रकार के सूक्तों की संज्ञा प्रायश्चित-सूक्त है। इन सूक्तों में अपराधों की निवृत्ति के लिए प्रार्थनाएँ की गई हैं। इनमें केवल पापों के निवारणार्थ ही नहीं बल्कि यज्ञादि में होने वाले स्खलनों के लिए भी प्रायश्चित का विधान है। इसके अतिरिक्त चरित्रहीनता, धार्मिक भावनाओं की शून्यता तथा दूसरे शास्त्र विरोधी कर्मों के करने से मनुष्य जितने प्रकार से भी पापग्रस्त हो जाता है, उन सभी से मुक्ति प्राप्त करने के लिए इनमें प्रायश्चितपरक मन्त्र हैं। इन सूक्तों में ऐसे भी मन्त्र मिल जाते हैं जिनसे मनुष्य अपना शारीरिक तथा मानसिक दौर्बल्य, बुरे स्वप्न तथा अपशकुनों का भी निराकरण कर सकता है। यहाँ उन पापों के निवारणार्थ भी मन्त्र प्राप्त होते हैं जो पाप माता, पिता, भाई तथा बहन द्वारा किए गए हों। अशुभ नक्षत्रों के कुप्रभावों को दूर करने के लिए भी मन्त्र हैं, ऐसा कतिपय विद्वानों का अभिमत है। सामाजिक अपराध :- जैसे बड़े भाई के अविवाहित रहते हुए भी छोटे भाई द्वारा विवाह कर लेना, धर्मशास्त्र विरोधी विवाह कर लेना, ग्रहण किए गए ऋण का प्रतिदान न करना आदि के लिए भी प्रायश्चित सम्बन्धी मन्त्र दृष्टिगोचर होते हैं। स्त्रीकर्माणि सूक्त :- अथर्ववेद में ऐसे मन्त्रों का भी विशाल समूह है जो कि विवाहादि का निर्देश करने वाले तथा पति-पत्नी में परस्पर अनुराग को बढ़ाने वाले हैं। इन्हें ही स्त्री कर्माणि अथवा प्रेम सूक्त कहा जाता है। इन मन्त्रों के द्वारा वधू और वर क्रमशः वर और वधू को प्राप्त करते हैं। कतिपय ऐसे भी मन्त्र हैं जो कि इन्द्र- जाल, अभिशाप तथा वशीकरण से सम्बन्धित हैं। विवाह, प्रेम तथा पुत्रोत्पत्ति आदि विषयों का विवेचन करने वाले मन्त्रों से उस समय समाज में प्रचलित विभिन्न रीति- रिवाजों तथा मान्यताओं का ज्ञान होता है। स्त्री-कर्माणि सूक्तों में उपलब्ध मन्त्रों में विषय की दृष्टि से तीन वर्ग परिलक्षित होते हैं, अतः वैषयिक दृष्टि से ये मन्त्र तीन प्रकार के कहे जा सकते हैं-
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