वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
पृष्ठ 194, कुल 353 में से
संदर्भ में पढ़ेंDigitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 166 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता ९. नवम काण्ड में मधुविनाशकपरक मन्त्रों का संग्रह है। १०. दशम काण्ड वें ब्रह्मविद्या, सर्पविनाशन, ज्येष्ठ-ब्रह्म का महत्त्व वर्णित है। ११. ग्यारहवें काण्ड में ब्रह्मोदन, रुद्र आदि विषयों पर सामग्री प्रस्तुत की गई है। १२. बारहवें काण्ड में पृथ्वी सूक्त है जिसमें मातृभूमि की उपासना की गई है। १३. तेरहवाँ काण्ड अध्यात्म भावना से परिपूर्ण हैं, उसमें दार्शनिक विवेचन दृष्टिगत होता है। १४. चौदहवें काण्ड में विवाह संस्कार का प्रमुख रूप से वर्णन किया गया है। १५. पन्द्रहवाँ काण्ड व्रात्य काण्ड है, इसमें व्रात्यों का वर्णन हुआ है। १६. सोलहवें काण्ड में दुःस्वप्न का नाश करने वाले मन्त्रों का संग्रह उपलब्ध होता है। १७. सत्रहवें काण्ड में अपने अभ्युदय के लिए प्रार्थना विषयक मन्त्रों का संग्रह हुआ है। १८ अठारहवें काण्ड में पितृमेध यज्ञ परक मन्त्र संगृहीत हुए हैं। १९. उन्नीसवें काण्ड में यज्ञ, नक्षत्र, मणि तथा छन्दों के नाम आदि अनेक विषयों का विवेचन है। २०. बीसवें काण्ड में सोमयाग सम्बन्धी तथा इन्द्रश्रुतिपरक मन्त्र प्राप्त होते हैं। इस प्रकार हम देखते हैं कि अथर्ववेद की विषयवस्तु, वेदत्रयी की विषयवस्तु की तुलना में अत्यधिक विस्तृत तथा आश्चर्यजनक है। इसमें जिन विषयों की चर्चा की गई है उन्हें मुख्य रूप से तीन भागों में बाँटा जा सकता है— १. अध्यात्म, २. अधिभूत, ३. अधिदैवत इनमें से अध्यात्म प्रकरण में ब्रह्म तथा चार आश्रमों का वर्णन किया गया है। अधिभूत प्रकरण में सम्राट, शासन-व्यवस्था, संघर्ष, शत्रुवाहनादि नाना विषयों का वर्णन मिलता है। अधिदैवत प्रकरण में अनेक देवताओं, यज्ञों तथा कालविषयक सामग्री का संकलन किया गया है। अब तक किए गये स्थूल विवेचन के पश्चात् सम्प्रति कतिपय महत्त्वपूर्ण सूक्तों तथा विषयों का विस्तारपूर्वक विवेचन प्रस्तुत है— १. भैषज्य सूक्त :- अथर्ववेद के इस प्रकरण में ऐसे मन्त्रों का संग्रह है जो कि विभिन्न रोगों की चिकित्सा से सम्बद्ध है। भारतवासियों का एक वर्ग यह विश्वास करता है कि राक्षस परम्परा ही विभिन्न रोगों का मूल कारण है। ये राक्षस कदाचित् बाह्य या आन्तरिक रूप से शरीर को कष्ट पहुँचाते हैं। इस सूक्त के मन्त्रों में औषधि औषधिलता तथा जल की प्रशंसा की गई है। कौशिक-सूक्त में इन मन्त्रों की सहायता CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar