भारतकोश
वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

पृष्ठ 195, कुल 353 में से

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पृष्ठ 195

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri द्वितीय अध्याय 167 से किए जाने वाले जादू-टोनों का वर्णन हुआ है। इसमें ज्वर, कास, गण्डमाला, यक्ष्मा, दंतपीड़ा तथा कुष्ठ आदि रोगों तथा उनकी औषधियों का भी वर्णन मिलता है। इन मन्त्रों में कुछ तो चिकित्सात्मक औषधियों के आवाहन के रूप में दिखाई देती हैं। निम्न मन्त्र में कुष्ठ-निवारणार्थ औषधि का आवाहन किया गया है- न॒क्तं॒जा॒तस्योष॑धे॒ रामे॑ कृ॒ष्णे अ॑सि॒क्नि च॑। इ॒दं र॑जनि॒ रजय किलासं॑ प॒लितं॑ च॒ यत्॥ किलासं॑ च प॒लितं॑ च॒ निर्इ॒तो ना॑शया॒ पृष॑त्। आ त्वा॒ स्वो वि॑शतां॒ वर्णः॒ परा॑ शु॒क्ला॒नि॑ पातय॥ (अथर्व १-२३-१-२) अर्थात् हे उष्णता रखने वाली औषधि! तू रात्रि में उत्पन्न हुयी है, तो तू रमण करने वाली, चित्त को आकर्षित करने वाली तथा निर्बन्ध है। हे उत्तम रंग करने वाली! तू यह जो रूप का बिगाड़ने वाला कुष्ठ आदि शरीर का श्वेतपन रोग है, उसे रगड़ दे। अर्थात् (हे औषधि) इस रूप बिगाड़ने वाले कुष्ठ आदि रोग को और शरीर के श्वेतपन और विकृत चिह्न का निरन्तर नाश कर दे। अपना रंग तुझमें प्रविष्ट हो जाये और (तू) श्वेतचिह्नों को गिरा दे। यक्ष्मा-निवारण हेतु प्रार्थना इस प्रकार की गयी है- अ॒क्षीभ्यां॑ ते॒ नासि॑काभ्यां॒ कर्णा॑भ्यां॒ चुबु॑का॒दधि॑। यक्ष्मं॑ शी॒र्ष॒ण्यं॑ म॒स्तिष्का॑ज्जि॒ह्वाया॒ वि वृ॑हामि ते॥ ग्री॒वाभ्य॑स्त उ॒ष्णिहा॑भ्यः॒ कीक॑साभ्यो अनू॒क्या॑त्। यक्ष्मं॑ दो॒षण्य॒मंसा॑भ्यां बा॒हुभ्यां॒ वि वृ॑हामि ते॥ अर्थात् तेरे दोनों नेत्रों से, दोनों नथुनों से, दोनों कर्णों से, ठोड़ी से, तेरे दिमाग से, जिह्वा से तथा शिर से क्षयी रोग को मैं उखाड़ता हूँ। अर्थात् तेरे गले की नाड़ियों से, गुद्दी की नाड़ियों से, हँसली की हड्डियों से, रीढ़ से, तेरे दोनों कंधों से, तेरी दोनों भुजाओं से, मुड्ढे से क्षयी रोग को, मैं उखाड़े देता हूँ। दूसरे प्रकार की प्रार्थनाएँ वे है, जो जलपरक है। इन स्तुतियों में चिकित्सा की विशिष्ट शक्ति का जल में विधान स्वीकार किया गया है। कतिपय प्रार्थनाएँ अग्निपरक है। यह अग्नि भारतीयों के मत में राक्षसों को सर्वाधिक पीड़ित करने वाली हैं। अनेक मन्त्र तक्मन् नामक ज्वर से सम्बन्धित हैं, जिसकी अथर्ववेद में राक्षस के रूप में CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

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