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वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

पृष्ठ 196, कुल 353 में से

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पृष्ठ 196

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168 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता कल्पना की गई है। अथर्ववेद में अनेक वृक्षों से सम्बन्धित मन्त्र हैं। ये वृक्ष रोग शमनार्थ प्रभावशाली हैं। अथर्ववेद में विभिन्न प्रकार के मानवीय रोगों की कुल संख्या ९९ बतलाई गयी है। कतिपय मन्त्रों में रोग का प्रसार करने वाली कीटाणुओं का भी वर्णन उपलब्ध होता है। अथर्ववेद में अनेक मन्त्रों में एक व्यक्ति को छोड़कर दूसरे व्यक्ति के पास रोग को पहुँचा देने या किसी दूसरे देश में भेज देने का भी वर्णन प्राप्त होता है निम्नलिखित मन्त्र में रोग को अन्य देश में भेजने की प्रार्थना है— यथा॒ मनो॑ मनस्कृ॒तैः परा॑पत॒त्याशु॒मत्। ए॒वा त्वं का॒से प्र प॑त॒ मनु॑सो॒ऽनु॑ प्र॒वाय्य॒म्॥ (अथर्व ६/१०५/१) जैसे मन, मन के विषयों के साथ शीघ्रता से आगे बढ़ता है, वैसे ही तू कास ज्ञान या उपाय के बीच मन के प्राप्ति योग्य देश की ओर आगे बढ़। इस प्रकार यह सिद्ध होता है कि इस वेद में आयुर्वेद का विपुल महत्त्व वर्णित है। आयुष्य सूक्त :- अथर्ववेद में ऐसे अनेक मन्त्र संगृहीत हैं जो स्वास्थ्य तथा दीर्घ जीवन से सम्बन्धित हैं। इस प्रकार के मन्त्र 'आयुष्मनि सूक्तानि' के नाम से पुकारे जाते हैं। इनका तात्पर्य स्पष्टतः दीर्घआयुदायक सूक्त है। आयुष्य-सूक्त में मिलने वाले मन्त्र मुख्यतः पारिवारिक उत्सवों के अवसर पर प्रयुक्त होते हैं। यथा— बालक का मुण्डन, युवक का गोदान एवं उपनयन संस्कारादि। इन मन्त्रों में शतायु तथा पूर्णतः नीरोग होने की परमात्मा से प्रार्थना की गई है। इन मन्त्रों में सौ प्रकार की मृत्युओं से स्वयं की रक्षा करने तथा लगभग सभी रोगों से बचने के लिए प्रार्थनाएँ ग्रथित हैं। इन रोगों के निवारणार्थ जिन औषधियों का आह्वान किया जाता है, इन औषधियों का प्रयोग एन्द्रजातिक चिकित्सक के द्वारा किया जाता है। इन प्रार्थना- मन्त्रों में आयु की वृद्धि हेतु कुछ ऐसे भी मन्त्र मिलते हैं, जिनमें इस विषय के निमित्त हाथ में 'रक्षासूत्र' अथवा 'रक्षा-करण्ड' को बाँधने का विधान बतलाया गया है। इस रक्षा-करण्ड को बाँधने वाला जीवधारी जीवन पर्यन्त उत्तम स्वास्थ्य का लाभ करता है। अथर्ववेद का १७वाँ काण्ड इसी प्रकार के सूक्तों से परिपूर्ण है। इस काण्ड में मात्र एक-एक ऋचा वाले तीस मन्त्र उपलब्ध होते हैं। निम्नलिखित मन्त्र में देवों तथा मानुषी दोनों प्रकार की शक्तियों से रक्षार्थ प्रार्थना निहित है— परी॑वृतो॒ ब्रह्म॑णा॒ वर्म॑णाहं कश्य॒पस्य॒ ज्योति॑षा॒ वर्च॑सा च। मा मा॑ प्राप॒न्त्रिष॑वो॒ दैव्या॑ या मा मानु॑षी॒रव॑सृष्टा व॒धाय॑॥ (अथर्व० १७/२८)

CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar