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वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

पृष्ठ 193, कुल 353 में से

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पृष्ठ 193

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द्वितीय अध्याय 165 संकलित हैं। इन सूक्तों में विषयों की विविधता दृष्टिगोचर होती हैं। तेरहवें काण्ड से लेकर अठारहवें काण्ड तक के सूक्तों के विषयों में एकरूपता के दर्शन होते हैं। चौदहवें काण्ड में केवल दो वृहत्काय सूक्त हैं। सोलहवें काण्ड में १०३ मन्त्र हैं। सत्राहवें काण्ड में केवल एक सूक्त है जिसमें कुल ३० मन्त्र हैं। १८वें काण्ड में भी बड़े-बड़े सूक्तों में विविध विषय वर्णित हैं। अन्तिम दो काण्ड 'खिल काण्ड' के नाम से प्रसिद्ध हैं। ये अपेक्षाकृत नवीन माने जाते हैं। उन्नीसवें काण्ड में ७२ सूक्त हैं। अन्तिम काण्ड में ९५८ मन्त्र हैं जो ऋग्वेद से लिए गए हैं। अथर्ववेद का पञ्चमांश अर्थात् १२०० मन्त्र ऋग्वेद से उद्धृत किये गए हैं। ये मन्त्र मुख्यतः प्रथम, अष्टम तथा दशम मण्डलों से लिए गए हैं। 'अथर्ववेद' के अन्तिम काण्ड में निहित कुन्तापसूक्त के मन्त्र ऋग्वेद में नहीं प्राप्त होते हैं। अतः संभवतः उन्हें ऋग्वेद की किसी अन्य शाखा से ग्रहण किया गया है। विषय-विवेचन :- अथर्ववेद में दार्शनिक, सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, आयुर्वेदिक, अभिचारिक आदि विषयों का विस्तृत विवेचन हुआ है। आचार्य सायण ने अपनी अथर्ववेदीय भाष्य-भूमि में अथर्ववेद प्रतिपाद्य विषयों को प्रस्तुत किया है। काण्डों के क्रम से अथर्ववेद का प्रतिपाद्य विषय इस प्रकार है- १. प्रथम काण्ड में विभिन्न रोगों की निवृत्ति, पाशमोचन एवं शान्ति प्राप्ति प्रभृति विषय वर्णित हैं। २. द्वितीय काण्ड में रोग, शत्रु एवं कृमि विनाशपरक तथा दीर्घायुष्यदायक मन्त्र संगृहीत हैं। ३. तृतीय काण्ड में शत्रु, सैन्य, सम्मोहन, राजनिवार्चन, कृषि एवं पशुपालनादि वर्णित हैं। ४. चतुर्थ काण्ड में ब्रह्मविद्या एवं विषनाशन, राज्याभिषेक, वृष्टि आदि से सम्बन्धित मन्त्र हैं। ५. पञ्चम काण्ड में ब्रह्मविद्या एवं कृत्या परिहारपरक मन्त्र संकलित हैं। ६. षष्ठ काण्ड में दुःस्वप्न नाशक तथा अन्य प्रकार की समृद्धि सम्बन्धी मन्त्र एकत्रित हैं। ७. सप्तम काण्ड में वे मन्त्र संगृहीत हैं, जिनमें आत्मतत्त्व का चिन्तन एवं विवेचन परिलक्षित होता है। ८. अष्टम काण्ड में उपलब्ध मन्त्रों में विराट् ब्रह्म के स्वरूप की चर्चा की गई है।

CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar