वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंDigitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 164 वैदिक वाङ्गमय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता 'अथर्वाङ्गः एनमेता स्वेव अप्सु अन्विच्छ इति। तद्यद् अब्रवीत् अथ अर्वाङ् एन मे तास्वे अप्सु, अन्विच्छ इति तदथर्वाऽभवत्॥' (१/४) इसका अभिप्राय यह है कि इस आत्मतत्त्व को इस ओर, यहीं इन भाव प्रवाहों में, अपने कर्मों में ढूँढों। बाह्य जगत् में अस्तित्त्वार्थ संघर्ष प्रवर्तमान है। शान्ति तो भीतर है। अतः इसे अन्दर ही खोजों, यह कहने वाला 'अथर्वा' कहलाता है, इसीलिए यह वेद 'अथर्ववेद' की संज्ञा से विभूषित हो गया। निरुक्तकार ने अथर्वा को कुछ पृथक् ढंग से सिद्ध किया है। उसके अनुसार अ+थर्व। अथर्वाणः अथनवन्तः। थर्वतिश्चरति कर्मातत्प्रति सेधः (११/१८)। 'थर्व' धातु कौटिल्य तथा हिंसार्थक हैं, अतः 'अथर्व' शब्द का अर्थ होता है- अकुटिलता तथा अहिंसा वृत्ति द्वारा मन को अविचल रखने वाला व्यक्ति इस निर्वचन को सिद्ध करने वाले मंत्रों तथा प्रसंगों का वेद में बाहुल्य है, अतः 'अथर्ववेद' नाम सार्थक है। प्रायः अधिकांश भाष्यकारों ने इस व्युत्पत्ति को स्वीकार किया है। शाखाएँ :- पतञ्जलि ने अपने 'महाभाष्य' के 'पस्पशाह्निक' में 'नवधाऽथर्वणो वेदः' कहकर अथर्ववेद की नौ शाखाओं का नामोल्लेख किया है। 'प्रपञ्च हृदय', 'चरणव्यूह' तथा 'सायणभाष्य' के उपोद्घात में भी नौ शाखाओं का उल्लेख किया गया है किन्तु उनके नामों में भिन्नता है। इनकी परस्पर तुलना करने पर नाम निम्नलिखित प्रकार से होंगे- १. पिप्पलाद, २. स्तौद, ३. मौद, ४. शौनकीय, ५. जाजल, ६. जलद, ७. ब्रह्मवद, ८. देवदर्श, ९. चारण। इन नौ शाखाओं में से पिप्पलाद तथा शौनक शाखाओं से सम्बन्धित कुछ ग्रन्थ प्राप्त होते हैं। अन्य शाखाएँ तो नामावशेष ही हैं। अथर्ववेद का विभाजन :- अथर्ववेद का विभाजन काण्डों, सूक्तों में किया गया है। सूक्त के अन्तर्गत मन्त्र संगृहीत है। अथर्ववेद में २० काण्ड, ६३१ सूक्त और लगभग ६ हजार मन्त्र हैं। प्रारम्भिक सात काण्ड अति लघु है। प्रथम काण्ड के हर एक सूक्त में नियमतः ४ मन्त्र, द्वितीय काण्ड के प्रत्येक सूक्त में ५ मन्त्र, तृतीय काण्ड के प्रत्येक सूक्त में ६ मन्त्र, चतुर्थ काण्ड के प्रत्येक सूक्त में ७ मन्त्र तथा पञ्चम काण्ड के प्रत्येक सूक्त में ८ मन्त्र प्राप्त होते हैं। षष्ठ काण्ड में कुल १४२ सूक्त हैं। इसके प्रत्येक सूक्त में लगभग तीन मन्त्र हैं। सप्तम काण्ड के ११८ सूक्तों में अधिकांश सूक्त एक या दो मन्त्रों वाले हैं। ८ से लेकर १२ तक के काण्डों में बृहत्काय सूक्त CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar