वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
पृष्ठ 191, कुल 353 में से
संदर्भ में पढ़ेंDigitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri द्वितीय अध्याय 163 तस्माद् राजा विशेषेण अथर्वाण जितेन्द्रियम्। दान सम्मान सत्कारैर्नित्यं समभिपूजयेत्॥ आचार्य सायण का स्पष्ट मत है कि ऐहिक फल के प्रदाता शान्तिक एवं पौष्टिक कर्म, राज्याभिषेक आदि राजा कर्म, असीमित फलदायक तुला पुरुषादि दोनों का प्रतिपादन अथर्ववेद में ही उपलब्ध होता है, अतः पौरोहित्यार्थ अथर्ववेद श्रेष्ठ है। अथर्ववेद की प्रशंसा में स्कन्द पुराण में कहा गया है— 'नतिथिर्न च नक्षत्रा न ग्रहो न च चन्द्रमाः। अथर्वमन्त्र सम्प्राप्त्या सर्वसिद्धिर्भविष्यति।' और भी— यस्तत्राथर्ववणान् मन्त्रान् जपेच्छ्रद्धासमन्वितः। तेषामर्थोद्भवं कृत्स्नं फलं प्राप्नोति स ध्रुवम्॥ अथर्ववेद के अनेक अभिधान प्राप्त होते हैं। यथा- अथर्ववेद, सोमवेद, ब्रह्मवेद, अङ्गिरोवेद, अथर्वाङ्गिरस वेद आदि। यजुर्वेद में सोम को ब्राह्मणों का राजा कहा गया है। ब्रह्मा यज्ञकर्म का अध्यक्ष होने से राजा के सदृश है। अतः ब्रह्मा की भी सोम संज्ञा हो जाती है। इस कारण अथर्ववेद को 'ब्रह्मवेद' एवं 'सोमवेद' के अभिधान प्राप्त हुए हैं। गोपथ ब्राह्मणानुसार अथर्व भृगु के पुत्र थे तथा भृगु ब्रह्मा के पुत्र थे। एक ही नाम के कई ऋषि हुए हैं, इसीलिए कहीं अथर्वा भार्गव है, तो कहीं भृगु आथर्वण हैं। कुछ विद्वानों के अनुसार ये पृथक्-पृथक् ऋषि हैं, केवल उनकी संज्ञा समान है। अथर्वण तथा आङ्गिस आदि ऋषियों ने ही इस वेद के अधिकांश मन्त्रों का साक्षात्कार किया है, अतः यह वेद 'अथर्वाङ्गिरसवेद' कहलाता है। इस संज्ञा के होने का एक और कारण भी हो सकता है। वह यह कि आङ्गिरस का अर्थ होता है अभिचार मंत्र। इन मन्त्रों का प्रयोग मारण तथा मोहन के लिए बहुधा किया जाता है। इस प्रकार के अनेक मन्त्र इस वेद में संगृहीत हैं। इस वेद की अथर्ववेद संज्ञा होने को विद्वानों ने भिन्न-भिन्न कारणों द्वारा सिद्ध किया है। कतिपय विद्वानों का मत है कि अथर्वा ऋषि द्वारा साक्षात्कृत होने के कारण यह अथर्वसिद्ध कहलाता है। जिन ऋषियों ने अथर्वमन्त्रों का साक्षात्कार किया, वे अनेक हैं। जैसे- काण्व, बादरायण, मरीचि, पुरुमीढ, अगस्त्य, जमदग्नि, वामदेव, ब्रह्मा तथा अथर्वा आदि। इन सबमें अथर्वा का नाम बहुलता से प्राप्त होता है। इसीलिए इसकी 'अथर्ववेद' संज्ञा हुई। गोपथ ब्राह्मण (१/४) तथा निरुक्त (११/२/१७) दोनों में 'अथर्व' शब्द की व्याख्या की गई है। गोपथ ब्राह्मणकार ने तो अथर्व की पूर्णतः नवीन रूप में निरुक्ति की है। उसका कथन है— CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar