वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
पृष्ठ 185, कुल 353 में से
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द्वितीय अध्याय 157 तथा पौष) हेमन्त ऋतु, (माघ तथा फाल्गुन मास) शिशिर ऋतु निश्चित ही रमणीय होता है। यहाँ पर अरण्य होते हुए भी रण्य दशा है। यहाँ पर शुभ-अशुभ का भेद समाप्त हो जाता है। पूर्वार्चिक के अन्त में दस महानाम्नी ऋचाएँ हैं। उदाहरणार्थ इन ऋचाओं का प्रथम मन्त्र यहाँ उद्धृत किया जाता है- विदा मघवन् विदा गातुमनुश१सिषो दिशः। शिक्षा शचीनां पते पूर्वींणां पुरूवसो॥ (साम० ६४१) अर्थात् हे पर्याप्त धन वाले प्रभो ! तू सर्वज्ञ है, समस्त अपूर्व श्रेष्ठ शक्तियों का स्वामी है। आप ही गन्तव्य स्थान पर ज्ञान कराइए, मार्गों की शिक्षा दीजिए। तू अनेक ज्ञानों का स्वामी है, सनातन है। पूर्वार्चिक के सदृश उत्तरार्चिक भी पाँच एवं चार अर्थात् कुल ९ प्रपाठकों में संविभक्त है, किन्तु उनमें मन्त्र क्रमबद्ध नहीं हैं। जबकि पूर्वार्चिक के मन्त्र क्रमबद्ध हैं। पूर्वार्चिक के समान ही उत्तरार्चिक में भी अनेक विषयों का प्रतिपादन हुआ है। इसकी अन्तिम ऋचाओं में युद्धकला का विस्तृत विवेचन उपलब्ध होता है। उत्तरार्चिक के सम्बन्ध में पाश्चात्य विद्वान् विन्टरनिट्ज़ का कथन है- “We may compare the uttarārcika to a song in which the complete text of the song is given while it is presumed that the melodies are already known.” सामगान पद्धति :- वेदज्ञ ऋषियों ने सामयोनि मन्त्रों के माध्यम से गान मन्त्रों का निर्माण किया। ये गान चार प्रकार के होते हैं। उनके नाम निम्नांकित हैं- १. गेयगान २. आरण्यगान ३. ऊहगान ४. ऊह्यगान (रहस्य गान) इन गानों में प्रथम है- 'गेय गान' अथवा 'ग्रामे गेय गान।' जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है ये गान गाँवों में, साधारण जनता के मध्य पाया जाता था। यह गान पूर्वार्चिक के प्रारम्भिक पाँच अध्यायों के ऊपर होता है। द्वितीय है- आरण्यगान। ये गान आरण्यक काण्ड में प्राप्त मन्त्रों का होता है। गेय-गान के विपरीत ये गान अरण्य में गाने योग्य होते हैं। सामवेद के मर्मज्ञों के अनुसार आरण्य गान के स्तोत्र विचित्र विलक्षणता से पूर्ण है। वे अत्यन्त पावन हैं। अरण्य का पावन वातावरण ही आरण्य
CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar