वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
पृष्ठ 184, कुल 353 में से
संदर्भ में पढ़ेंDigitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 156 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता 'अग्नि आ याहि वीतये गृणानो हव्यदातये। नि होता सत्सि बर्हिषि।' अर्थात् हे अग्नि देवता! आ जाओ। हमको आगे ले चलो, आलोक में, ज्ञान में, कर्म में भी। हम आपसे हव्य दाति के लिए प्रार्थना करते हैं। तीसरा काण्ड 'पावमान काण्ड' की संज्ञा से विभूषित है। इसमें पवमान-सोम से सम्बद्ध ऋचाएँ संगृहीत हैं। यह सोम भी कवि है। पवमान-सोम का स्वरूप उर्ध्वारोहणकारी है। यह निम्नलिखित पदों से प्रकट होता है— १. 'वायुमारोह धर्मणा' (४८३) २. 'अजीजनद् दिवः ज्योतिर्वैश्वानरं बृहत्' (४८४) ३. 'सिन्धोरूर्मावधिश्रितः' (४८६) १. अर्थात् प्राणायाम रूप धर्म से हवा में चढ़कर चल। २. अर्थात् पतितपावन परमात्मा ने द्युलोक की विचित्र वस्तु के सदृश महान् सूर्य के प्रकाश को उत्पन्न किया। ३. अर्थात् (मेधावी पुरुष) नदी की तरंग पर बैठकर, उसके साथ अति सरलता से बहता है। इसी काण्ड में भक्त सोम का आह्वान करता हुआ कहता है— आ सोम स्वानो अद्रिभिस्तिरो वाराण्यव्यया। जनो न पुरि चम्वोर्विशद्धरिः सदो वनेषु दधिषे॥ (साम० ५१३) अर्थात् हे सोम देवता! आओ, अचल शक्तियों के साथ, शोभन प्राण के साथ मेघ सदृशमन्द ध्वनि करते हुए आओ। अवि से सम्बद्ध ऋत से परिवृत, चारों ओर आक्षादायक हरीतिमा छिटकाते हुए, आवरणों को पार करते हुए आओ। मेरे परमेश्वर! द्यावा पृथ्वी के मध्यस्थित हृदयपुरी में प्रवेश करें। इन्हीं के मध्य में स्थित वेदी पर अपना आसन ग्रहण करो। चतुर्थ काण्ड 'अरण्य काण्ड' के नाम से जाना जाता है। इसमें ईश्वर की व्यवस्था में सभी ऋतुओं को मनोहर बतलाया गया है— वसन्त इन्तु रन्यो ग्रीष्म इन्तु रन्यः। वर्षाण्यनु शरदो हेमन्तः शिशिरः इन्तु रन्यः॥ (साम० ६१६) अर्थात् (चैत्र तथा वैशाख मास) वसन्त ऋतु निश्चय ही रमणीय है, (ज्येष्ठ और आषाढ़ मास) ग्रीष्म ऋतु निश्चय ही मनोहर है, (श्रावण तथा भाद्रपद मास) वर्षा ऋतु, उसके पश्चात् होने वाली (आश्विन तथा कार्तिक मास) शरद ऋतु, (अग्रहायण CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar