भारतकोश
वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

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पृष्ठ 186

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 158 | वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता गान के लिए उपयुक्त है। सामान्य जनता के मध्य इनका अनर्थ हो सकता है। तृतीय है- ऊहगान। यह विशेष रूप से उत्तरार्चिक में उपलब्ध मन्त्रों का होता है। 'ऊह' का अभिप्राय है ऊहन्, किसी उपयुक्त अवसर पर मन्त्रों का सामयिक परिवर्तन। इस विवेचनानुसार ऊहगान सोमयागों के अवसर पर प्रयोग किया जाना चाहिए। चतुर्थ है- ऊह्यगान। ये भी उत्तरार्चिक में प्राप्त मन्त्रों का होता है। ऊह्यगान को 'ऊह्य- रहस्यगान' के नाम से पुकारा जाता है क्योंकि ये रहस्यात्मक हैं। ये गान भी अरण्य गान के सदृश रहस्यात्मक होने के कारण सामान्य जनता के मध्य गायन के लिए वर्जित है। ऊह-गान तथा ऊह्य-गान, गेयगान एवं अरण्य गान की विकृति माने जाते हैं अर्थात् गेयगान में प्रयोग किए जाने वाले स्वर एवं रागादि के आधार पर ऊह-गान तथा अरण्य गान में प्रयोग किए जाने वाले स्वर एवं रागादि के आधार पर ऊह्य-गान का निर्माण हुआ है। पृथक्-पृथक् शाखाओं में ये गान पृथक्-पृथक् संख्या में उपलब्ध होते हैं। सर्वाधिक संख्या में गान जैमिनीय शाखा में निहित हैं-

कौथुमीय गानजैमिनीय गान
गेय-गान११९७१२३२
अरण्य-गान२९४२९१
ऊह-गान१०२६१८०२
ऊह्य-गान२०५३५६
कुल योग२७२२३६८१
साम के समस्त स्वरमण्डलों की संख्या 'नारद शिक्षा' में उपलब्ध होती है। कुल
स्वरमण्डल इस प्रकार है- ७ स्वर, ३ ग्राम, २१ मूर्छना और ४९ तान।
इन सात स्वरों की तुलना वेणु स्वरों में निम्नलिखित ढंग से की जा सकती है-
सामवेणु
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१. प्रथममध्यम/म
२. द्वितीयगान्धार/ग
३. तृतीयऋषभ्/रे
४. चतुर्थषडज/सा
५. पञ्चमनिषाद/नि
CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar