वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
पृष्ठ 187, कुल 353 में से
संदर्भ में पढ़ेंDigitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri द्वितीय अध्याय 159 | ६. षष्ठ | धैवत/ध | | ७. सप्तम | पञ्चम/प | सामगानों में ये ही ७ तक के अंक विभिन्न स्वरों के स्वरूप को प्रकट करते हैं। सामविकार :- साम संहिता के दोनों भागों में मात्र संहिता पाठ उपलब्ध होता है। इन्हें 'गान' की संज्ञा अवान्तर काल में दी गई है। गान शब्द 'गै' (गान) धातु से निष्पन्न होता है। इन गानों द्वारा संगीत के तत्त्वों के माध्यम से ताल तथा लय का ज्ञान होता है। साम मन्त्रों का सामगानों के रूप में परिवर्तन करने के लिए अनेक शाब्दिक परिवर्तन किए जाते हैं। ये 'सामविकार' कहलाते हैं। सामविकारों की कुल संख्या ६ है, जो निम्नलिखित हैं- १. विकार- यह शाब्दिक परिवर्तन है। यथा 'अग्ने' के स्थान पर 'ओग्नायि' करना। २. विश्लेषण- इसमें एक पद पृथक् कर दिया जाता है। जैसे 'वीतये' के स्थान पर 'वोयि तोया तोया यि' कर दिया जाता है। ३. विकर्षण- इसमें एक ही स्वर का दीर्घकाल तक विभिन्न प्रकार से उच्चारण किया जाता है। जैसे- ये को या २३ यि करके उच्चारित करना। ४. अभ्यास- इसमें किसी भी पद का एक से अधिक बार उच्चारण किया जाता है। जैसे 'तोयायि' का दो बार उच्चारण किया जाता है। ५. विश्रामार्थ- किसी भी पद के मध्य में रुक जाने पर 'विराम' नामक 'सामविकार' होता है। जैसे- 'गृणानों हव्यदातये' में 'ह' पर विराम लिया जाता है। ६. स्तोभ- गायन के अनुकल पदों की 'स्तोभ' संज्ञा है, जैसे औ, होवा, हाउआ आदि। भाषाशास्त्र में इन विकारों का बड़ा महत्त्व है। स्तोभ एवं विष्टुति- स्तुति का एक दूसरा रूप 'स्तोभ' कहलाता है। ये स्तोभ यज्ञ यागों के अवसर पर प्रयुक्त किए जाते हैं। ताण्ड्य ब्राह्मण में इनका विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है। इन स्तोभों की कुल संख्या नौ हैं, जो इस प्रकार है। १. त्रिवृत २. पञ्चदश ३. सप्तदश ४. एकविंश ५. त्रिणव ६. त्रयस्त्रिंश ७. चतुर्विंश ८. चतुश्चत्वारिंश ९. अष्टचत्वारिंश 'विष्टुति' एक विशेष प्रकार की स्तुति की संज्ञा है। इस स्तुति में स्तोभ को तृचों CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar