वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
पृष्ठ 188, कुल 353 में से
संदर्भ में पढ़ेंDigitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 160 वैदिक वाङ्गमय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता पर साम के गानों की आवृत्ति की जाती है। प्रत्येक तृच तीन पर्यायों में गाया जाता है। अतः नौ स्तोभों की कुल विष्टुतियाँ २८ हुई। सामगान के पञ्चभाग :- सामगान की प्रणाली अत्यन्त जटिल है। सामगान के पञ्चविभाग होते हैं- १. प्रस्ताव- वह मन्त्र पूर्वांश है। प्रस्तोता को 'प्रस्तोत' संज्ञक ऋत्विज् गाता है। २. उद्गीथ- इसका प्रारम्भ ओ३म् से किया जाता है। इसे 'उद्गाता' गाता है। ३. प्रतिहार- इसे प्रतिहर्त्ता गाता है। यह कभी-कभी दो भागों में विभाजित कर दिया जाता है। ४. उपद्रव- यह पुनः उद्गाता द्वारा ही गया जाता है। ५. निधन- इसमें ओ३म् रहता है। इसे प्रस्तोता, उद्गाता एवं प्रतिहर्त्ता- तीनों ऋत्विजों द्वारा गया जाता है। उदाहरणार्थ सामवेद का प्रथम मन्त्र प्रस्तुत है- अग्न आ याहि वीतये गृणानो हव्यदातये। नि होता सत्सि बर्हिषि॥ १॥ इसका गायन निम्नलिखित रूप में होगा। १. हुँ ओग्नाई (प्रस्ताव) २. ओ३म् आयाहि वीतये गृणानो हव्यदातये (उद्गीथ) ३. नि होता सत्सि बर्हिषि ओ३म् (प्रतिहार) ४. नि होता सत्सिब (उपद्रव) ५. र्हिषि ओ३म् (निधन)। यह साम जब तीन बार गाया जाता है, तो 'स्तोभ' कहलाता है। छान्दोग्य उपनिषद् के अनुसार साम के सात प्रकार हैं- १. हिंकार, २. प्रस्ताव, ३. आदि, ४. उद्गीथ, ५. प्रतिहार, ६. उपद्रव, ७. निधन। सामवेद का महत्त्व :- इस प्रकार सामसंहिता का भारतीय यज्ञों एवं आभिचारिक इतिहास के लिए अति महत्त्व है। यज्ञीय आवश्यकता के अतिरिक्त भारतीय संगीत-शास्त्र का मूल आधार इसके साम-गायन में ही है। इसका अर्थ यह है कि विनियोगात्मक, कलात्मक एवं आध्यात्मिक दृष्टि से भी साम-संहिता वैदिक वाङ्गमय में अत्यन्त उपयोगी संहिता के रूप में मान्य है। एक ओर तो साम-संगीत · CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar