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वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

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पृष्ठ 198

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170 \hspace{3cm} वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता अप॒ः स॑मु॒द्राद् दिव॒मुद् व॑हन्ति दिव॒स्पृथि॒वीम॒भि ये सृज॑न्ति। ये अ॒द्भििरीशा॑ना म॒रुत॒श्चर॑न्ति ते नो॑ मुञ्चन्त्वंह॑सः॥ \hspace{8cm} अथर्व० (४/२७/४) अर्थात् जो (वायुगण) जल को पृथ्वी (समुद्र) से उठाकर आकाश में पहुँचाते हैं और आकाश से पृथिवी पर त्याग देते हैं और जो समर्थ वायुगण जल के साथ चलते हैं, वे हमें कष्ट से छुड़ावें। प्रायश्चित सूक्त :- अथर्ववेद में कतिपय सूक्त ऐसे भी प्राप्त होते हैं जिनमें किए गए पापों के प्रायश्चितपरक मन्त्र संगृहीत होते हैं, इस प्रकार के सूक्तों की संज्ञा प्रायश्चित-सूक्त है। इन सूक्तों में अपराधों की निवृत्ति के लिए प्रार्थनाएँ की गई हैं। इनमें केवल पापों के निवारणार्थ ही नहीं बल्कि यज्ञादि में होने वाले स्खलनों के लिए भी प्रायश्चित का विधान है। इसके अतिरिक्त चरित्रहीनता, धार्मिक भावनाओं की शून्यता तथा दूसरे शास्त्र विरोधी कर्मों के करने से मनुष्य जितने प्रकार से भी पापग्रस्त हो जाता है, उन सभी से मुक्ति प्राप्त करने के लिए इनमें प्रायश्चितपरक मन्त्र हैं। इन सूक्तों में ऐसे भी मन्त्र मिल जाते हैं जिनसे मनुष्य अपना शारीरिक तथा मानसिक दौर्बल्य, बुरे स्वप्न तथा अपशकुनों का भी निराकरण कर सकता है। यहाँ उन पापों के निवारणार्थ भी मन्त्र प्राप्त होते हैं जो पाप माता, पिता, भाई तथा बहन द्वारा किए गए हों। अशुभ नक्षत्रों के कुप्रभावों को दूर करने के लिए भी मन्त्र हैं, ऐसा कतिपय विद्वानों का अभिमत है। सामाजिक अपराध :- जैसे बड़े भाई के अविवाहित रहते हुए भी छोटे भाई द्वारा विवाह कर लेना, धर्मशास्त्र विरोधी विवाह कर लेना, ग्रहण किए गए ऋण का प्रतिदान न करना आदि के लिए भी प्रायश्चित सम्बन्धी मन्त्र दृष्टिगोचर होते हैं। स्त्रीकर्माणि सूक्त :- अथर्ववेद में ऐसे मन्त्रों का भी विशाल समूह है जो कि विवाहादि का निर्देश करने वाले तथा पति-पत्नी में परस्पर अनुराग को बढ़ाने वाले हैं। इन्हें ही स्त्री कर्माणि अथवा प्रेम सूक्त कहा जाता है। इन मन्त्रों के द्वारा वधू और वर क्रमशः वर और वधू को प्राप्त करते हैं। कतिपय ऐसे भी मन्त्र हैं जो कि इन्द्र- जाल, अभिशाप तथा वशीकरण से सम्बन्धित हैं। विवाह, प्रेम तथा पुत्रोत्पत्ति आदि विषयों का विवेचन करने वाले मन्त्रों से उस समय समाज में प्रचलित विभिन्न रीति- रिवाजों तथा मान्यताओं का ज्ञान होता है। स्त्री-कर्माणि सूक्तों में उपलब्ध मन्त्रों में विषय की दृष्टि से तीन वर्ग परिलक्षित होते हैं, अतः वैषयिक दृष्टि से ये मन्त्र तीन प्रकार के कहे जा सकते हैं-

CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar