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वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

पृष्ठ 182, कुल 353 में से

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पृष्ठ 182

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 154 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता उत्तरार्चिक दो भाग हैं। पूर्वार्चिक में ५ अध्याय तथा उत्तरार्चिक में ९ अध्याय हैं। ये अध्याय 'प्रपाठक' की संज्ञा से विभूषित है। पूर्वार्चिक के प्रत्येक प्रपाठक में दो खण्ड उपलब्ध होते हैं। प्रत्येक खण्ड में एक 'दशति' प्राप्त होती है तथा दस ऋचाएँ मिलकर एक दशति का निर्माण करती है। किन्तु ऋचाओं की संख्या के विषय में १० ऋचाओं के नियम का पूर्णतः पालन नहीं किया गया है। किसी खण्ड में दस से कम ऋचाएँ प्राप्त होती हैं, किसी में दस से अधिक प्राप्त होती हैं। इन दशितयों में मन्त्रों के संग्रह का मुख्य आधार छन्द तथा देवताओं की एकता है। इसी आधार को लेकर भिन्न-भिन्न मण्डलों वाली तथा भिन्न-भिन्न ऋषियों द्वारा साक्षात्कृत ऋग्वेदीय ऋचाएँ एक देवता से सम्बन्धित होने के कारण एक स्थान पर एकत्रित कर दी गई हैं। पूर्वार्चिक के ५ प्रपाठकों के नाम निम्नलिखित हैं- १. आग्नेय काण्ड २. ऐन्द्र काण्ड ३. पवमान काण्ड ४. आरण्यक काण्ड ५. महानाम्नी ऋचाएँ आग्नेय में अग्निविषयक मन्त्रों का समूह है। द्वितीय से लेकर चतुर्थ अध्याय तक एक ऐन्द्र पर्व या काण्ड है, इसमें इन्द्र पूर्ण ऐश्वर्य के साथ सबके नियन्त्रण की शक्ति से सम्पन्न वर्णित है। पवमान काण्ड में सोम सम्बन्धी ऋचाओं का संग्रह है। ये ऋग्वेद के नवममण्डल से उद्धृत की गई हैं। इसमें पवमान सोम उद्गीथ अर्थात् ऊपर उठाने वाला है। आरण्डयक काण्ड में उस एक ब्रह्म के अतिरिक्त समस्त सांसारिक प्रपञ्च को अमरणीय सिद्ध किया गया है। प्रभु के सम्पर्क में रहने वालों को आनन्द ही आनन्द है, दुःख नहीं। इसमें अनेक देवता तथा छन्द हैं किन्तु गान विषयक एकता है। अन्त में परिशिष्ट रूप में १० ऋचाएँ दी गई हैं। ये महानाम्नी ऋचाएँ कहलाती हैं। ये अपने अभिधान से ही महानाम वाली है। पूर्वार्चिक में संगृहीत मन्त्रों की कुल संख्या २५० है। जैसा कि पहले भी कहा जा चुका है उत्तरार्चिक में ९ प्रपाठक हैं। आदि के पाँच प्रपाठकों में दो-दो भाग हैं अथवा अध्याय हैं, किन्तु अन्तिम चार प्रपाठकों में तीन- तीन भाग या अध्याय हैं। उत्तरार्चिक में कुल १२२५ मन्त्र हैं। यह संख्या पूर्णतः शुद्ध नहीं है क्योंकि उत्तरार्चिक में से २६७ मन्त्र पूर्वार्चिक से ही उद्धृत हैं। अतः दोनों आर्चिकों की संख्या १८७५ में २६७ पुनरुक्त मन्त्र तथा ९९ नवीन तथा ५ नवीन पुनरुक्त मन्त्रों को निकाल देने पर ऋग्वेद के उद्धृत मन्त्रों की संख्या १५०४ शेष रहती है। इस विषय को निम्नलिखित तालिका द्वारा समझा जा सकता है- CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar