वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
पृष्ठ 178, कुल 353 में से
संदर्भ में पढ़ेंDigitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 150 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता अनेक शताब्दियों के पश्चात् तन्त्र ग्रन्थों में इस प्रकार के शब्दों का पुनः आविर्भाव दृष्टिगोचर होता है। इन ग्रन्थों में केवल ऐं, ह्रीं, क्लीं, श्रीं, क्रीं आदि अस्पष्ट ध्वनियाँ ही प्राप्त होती हैं। भारतीय तन्त्रशास्त्रियों की दृष्टि में इस प्रकार की ध्वनियाँ विशेष महत्त्वपूर्ण हैं। तान्त्रिक साधना के अनुयायी वज्रयानी-बौद्धों तथा शाक्तों ने अपनी उपासना पद्धति के मूल में ओ३म् को विशिष्ट स्थान प्रदान किया है। उनके प्रार्थना सम्बन्धी मन्त्रों में ओ३म् का उच्चारण अनिवार्य है। अतः पाश्चात्य वेदज्ञों के दृष्टिकोण में ये एकाक्षर शब्द भले ही निरर्थक हो किन्तु भारतीय यज्ञीय अनुष्ठानों तथा विभिन्न उपासना पद्धतियों में इन्हें आदरणीय स्थान प्राप्त है। यजुर्वेदीय गद्य का स्वरूप- यजुर्वेद में विशेष रूप से अनेक स्थलों पर भावों के विनियोग के लिए गद्य का उपयोग किया गया है। यह अधिकांशतया देवों के नामोच्चारण के साथ-साथ याज्ञिक भेटों के अर्पण के समय दृष्टिगोचर होता है। इस गद्य में पदों का मञ्जुलविन्यास तथा सारल्य प्रधान रूप से वर्णनीय है। क्लिष्ट पदविन्यास तथा दुर्गम शब्द जाल का सर्वथा अभाव है। इन्द्र को आहुति देते समय 'इदमन्द्राय' तथा अग्नि के लिए आहुति देते समय 'इदमग्नये' शब्दों का उच्चारण किया जाता है। इस प्रकार के पदों की सरलता तथा सुबोधता स्पष्ट ही है। शब्द अपने अर्थ एवं अभिप्राय को स्वतः मुखरित करते हुए प्रतीत होते हैं। यजुर्वेद का महत्त्व :- पाश्चात्य वेदज्ञ यजुर्वेद संहिता में उपलब्ध मन्त्रों को भले ही व्यर्थ तथा महत्त्वहीन समझें, किन्तु भारतवासियों की दृष्टि में यजुर्वेद का वर्ण्य विषय अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। भारतीय संस्कृति के विषय में यजुर्वेद में अत्यधिक जानकारी दी गई है। यथा- रुचं॑ नो धेहि ब्राह्म॑णेषु॒ रुच॒थंराज॑सु नस्कृधि। रुचं॑ वि॒श्येषु॑ शू॒द्रेषु॒ मयि॑ धेहि॒ रुचा॒ रुचं॑॥ (यजु० १८/४८) अर्थात् हे जगदीश ! आप हमारे ब्राह्मण विद्वानों में प्रीति से प्रीति को धारण करो। हमारे राजपूत क्षत्रियों में प्रीति से प्रीति को तथा मुझमें भी प्रीति से प्रीति को धारण करो। यजुर्वेद मुख्यतः कर्मकाण्ड का वेद है। इसमें यज्ञों की व्याख्या है। इसके साथ ही यजुर्वेद में सृष्टि रचना, मनोविज्ञान, समाजविज्ञान, अन्न, ऋतु, धातु, मरुत, पितर, राजनीति, दर्शन अर्थात् यज्ञ से सम्बन्धित अन्य तत्त्व भी पाए जाते हैं। अतः भारतीय धार्मिक तथा दार्शनिक परम्परा में यजुर्वेद का गौरवमय स्थान है। CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar