वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
पृष्ठ 177, कुल 353 में से
संदर्भ में पढ़ेंDigitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri द्वितीय अध्याय 149 से साहित्य को हानि पहुँची है। इनका अभिप्राय तथा महत्त्व प्राचीन काल में भले ही रहा हो किन्तु वर्तमान काल में ना के बराबर है। इस प्रकार के शब्दों में स्वाहा, स्वधा, ओ३म् तथा वषट् आदि हैं, ये एकाक्षर शब्द हैं। विन्टरनिट्ज ने इन शब्दों को अर्थहीन बतलाया है। इन एकाक्षर शब्दों के विषय में भारतीय वेदज्ञों की भिन्न धारणा है। भारतीय इन शब्दों को अत्यन्त श्रद्धा तथा आदर के साथ उच्चारण तथा श्रवण करते हैं। 'स्वाहा' तथा 'स्वधा' शब्द क्रमशः देवों तथा पितरों के लिए प्रयुक्त होने वाले मन्त्रों में अन्तिम में उच्चारित किए जाते हैं। भारतीय की दृष्टि में इनका पर्याप्त अर्थ है किन्तु उन अर्थों को समझने वाले अधिकारी विद्वान् अब नहीं रहें। पाश्चात्य विद्वान् ओ३म् के जाप को भी निरर्थक तथा महत्त्वहीन बतलाते हैं किन्तु भारतीयों के मध्य में ओ३म् शब्द पर्याप्त समादृत है। आचार्यप्रवर डॉ० मुंशीराम शर्मा का कथन है कि "यह मूल ध्वनि है। यही ध्वनि अ+उ+म् नाम की तीन ध्वनियों में फैल जाती है। अ आविर्भाव है, उ उठना या उड़ना है और म चुप हो जाना या अपने में लीन हो जाना है। ऋक्-यजु-साम की वेदत्रयी इन्हीं तीन मात्राओं का उपबृंहण है। तीन महाव्याहृतियाँ- भूः, भुवः तथा स्वः, इन्हीं तीन मात्राओं से निकली हैं। सृष्टि, स्थिति और प्रलय का प्रकाशन भी इन्हीं तीन मात्राओं से होता है। सत्, चित्, आनन्द नाम की तीन सत्ताएँ भी इन्हीं से प्रकट हो जाती हैं। मूल ध्वनि का यही विस्तार सब कुछ है, था और होगा।" विभिन्न उपनिषदों तथा ब्राह्मणों में भी अनेक स्थलों पर शब्द के महत्त्व पर प्रकाश डाला गया है। यथा गोपथ ब्राह्मण में ऋषि-कथन है- तत् एतत् अक्षरं ब्राह्मणों यं कामं इच्छेत् त्रिरात्रोपोषितः प्राङ्मुखों वाग्यतो बर्हिषि उपविश्य सहस्र कृत्वा आर्वतयेत सिद्ध्यन्ति अस्य अर्थाः सर्वकर्माणि च। (१/२२) अर्थात् जो इस एकाक्षर अविनाशी ओ३म् नाम की ऋचा का एक हजार बार कुशासन पर बैठकर पूर्व दिशा की ओर मुख करके, वाणी के संयम सहित तथा तीन रातों तक उपवास करता हुआ जाप करता है, उसके समस्त अर्थ तथा काम सिद्ध हो जाते हैं। उपनिषदों के ऋषि ओ३म् के महत्त्व से भलीभाँति परिचित थे। वे अत्यन्त प्रेम के साथ ओ३म् एकाक्षर शब्द का उच्चारण करते थे तथा ओ३म् के जाप को ही परमात्मा प्राप्ति का श्रेष्ठ साधन समझते थे। उनके अनुसार ओ३म् शब्द का जाप ही तम-रत के क्लेशों से छुटकारा दिला सकता है। CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar