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वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

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पृष्ठ 176

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148 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता आदि वर्णित है। माध्यमिका में १२ स्थानक हैं, जिसमें सावित्री, पञ्चचूड, स्वर्ग, दीक्षित, आयुष्य आदि का विवेचन मिलता है। ओरिमिका काण्ड में १० स्थानक हैं, जिनमें पुरोडाश ब्राह्मण, यजमान ब्राह्मण, सत्र, प्रायश्चित्ति चातुर्मास्य, सब, सौत्रामणी आदि का विवेचन है। चतुर्थ काण्ड का भी यही वर्ण्यविषय है। अन्तिम काण्ड १३ अनुवचनों वाला है। कपिष्ठल कठ संहिता का वर्ण्य विषय भी अन्य यजुर्वेदीय शाखाओं के समान ही कर्मकाण्ड का प्रतिपादन है। वस्तुतः यजुर्वेद की समस्त मन्त्र संहिताएँ मन्त्रों तथा यज्ञीय अनुष्ठानों की दृष्टि से अत्यधिक समानता का निर्वाह करती है। यजुर्वेदीय प्रहेलिकाएँ :- जिस प्रकार ऋग्वेद में प्रहेलिकाओं की प्रतिपत्ति है, उसी प्रकार यजुर्वेद में भी प्रहेलिकाओं की उपलब्धि होती है। इस वेद में आध्यात्मिक प्रहेलिकाओं का एक विशेष अंश समाविष्ट है। इन आध्यात्मिक प्रहेलिकाओं को ब्राह्मण ग्रन्थों की कल्पना की प्राक्कल्पनाएँ कहा जा सकता है। उस काल में प्रहेलिकाएँ एक प्रथा के रूप में प्रचलित थी। यह प्रथा पूर्णतः धार्मिक थी। प्राचीन काल में अश्वमेधादि यज्ञ के अवसर पर इन प्रहेलिकाओं से ब्राह्मण वर्ग अपना मनोरञ्जन किया करता था। इन प्रहेलिकाओं में विषय की दृष्टि से विविधता प्राप्त होती है। कतिपय प्रहेलिकाएँ यौवन की स्मृति को कुदेरने वाली तथा कतिपय प्रहेलिकाएँ यज्ञीय गूढ विषयों तथा औपनिषदिकतत्त्वचिन्तन से मण्डित हैं। ये प्रहेलिकाएँ वाजसनेयी संहिता के २३वें अध्याय में प्रचुर मात्रा में प्राप्त होती हैं। वैदिक काल में ये प्रहेलिकाएँ देवताओं की पूजा का एक आवश्यक अंश हुआ करती थी। देवों की उपाधियाँ :- आधुनिक काल में एक ही देवता की विभिन्न संज्ञाएँ हैं। प्रत्येक देवता को अनेक नामों से पुकारा जाता है। यथा विष्णुसहस्रनाम में विष्णु के एक हजार तथा शिवसहस्रनाम में शिव के एक हजार नाम संगृहीत हैं। समाज में राम तथा कृष्णादि को भी एकाधिक अभिधान प्राप्त है, यहाँ तक कि भक्तों ने कृष्णसहस्रनाम तथा राधासहस्रनाम की भी रचना कर डाली है। इस परम्परा का भी बीज हमें यजुर्वेद में उपलब्ध होता है जिसमें वाजसनेयी संहिता के २५वें तथा तैत्तरीय संहिता के चौथें तथा पाँचवें अध्यायों में शतरूद्रीय यज्ञ के अवसर पर रुद्र के नामों की गणना की गई है। इस प्रथा का उद्देश्य विभिन्न नामों द्वारा देवताओं की अर्चना करके उससे ऐश्वर्य की प्राप्ति करना है। एकाक्षर शब्द :- यजुर्वेदीय मन्त्रों एवं प्रार्थनाओं के अन्त में हमें कुछ ऐसी ध्वनियाँ तथा उच्चारण प्राप्त होते हैं जिनका पाश्चात्य विद्वानों के अनुसार कोई महत्त्व नहीं है। उनके विचार से इनमें केवल परम्परा का निर्वाह है तथा इस प्रकार के शब्दों

CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar