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वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

पृष्ठ 175, कुल 353 में से

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पृष्ठ 175

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri द्वितीय अध्याय 147 यह अत्यन्त लघु उपनिषद् समस्त उपनिषदों में आदि स्वीकार किया जाता है। यही एक मात्र ऐसा उपनिषद् है जो किसी संहिता का अंश है। अन्य उपनिषदों के साथ ऐसी बात नहीं है, वे किसी संहिता के अंश न होकर स्वतन्त्र ग्रन्थ हैं। यह अत्यन्त महत्त्वपूर्ण तथा उपयोगी उपनिषद् है, इसमें आद्योपान्त ज्ञान की चर्चा की गई है। अपने पृथक् वर्ण्य विषय के कारण यह अवान्तर कालीन रचना प्रतीत होती है। वस्तुतः कर्मकाण्ड का समापन इसी प्रकार की ज्ञान चर्चा से होना चाहिए। हिरण्मये॑न॒ पात्रे॑ण स॒त्यस्यापि॑हि॒तं मुख॑म्। यो॒ऽसावा॑दि॒त्ये पुरु॑षः॒ सो॒ऽसाव॒हम्। ॐ खं ब्रह्म॑।। (४०/१७) अर्थात् हे मनुष्यों! जिस ज्योति स्वरूप रक्षक मुझसे अविनाशी यथार्थ कारण के ढके हुए मुख के सदृश उत्तम अंग का आलोक किया जाता है, जो वह सूर्यमण्डल में पूर्ण परमात्मा है। वह परोक्षरूप मैं आकाश के सदृश व्यापक सबसे गुण कर्म और स्वरूप करके अधिक हूँ। सबका रक्षक जो मैं हूँ उसका ऐसा नाम जानो। कृष्ण यजुर्वेद का वर्ण्य विषय :- कृष्ण यजुर्वेद की चरण व्यूह के अनुसार ८५ शाखाएँ हैं किन्तु वर्तमान काल में केवल चार शाखाएँ तथा उससे सम्बन्धित साहित्य मिलता है। वे शाखाएँ निम्नलिखित हैं- १. तैत्तरीय शाखा (२) मैत्रायणी शाखा (३) कठ शाखा (४) कपिष्ठल शाखा शुक्ल यजुर्वेद के वर्ण्य विषय में तथा कृष्ण यजुर्वेद के वर्ण्य विषय में कोई विशेष भेद नहीं है। दोनों में जिन अनुष्ठानादि विधियों का वर्णन किया गया है, वे प्रायः एक समान ही हैं। अन्तर है तो केवल इतना ही कि शुक्ल यजुर्वेद में केवल मन्त्रों का संकलन है, जबकि कृष्ण यजुर्वेद में मन्त्रों के साथ ब्राह्मणों का भी संमिश्रण है। तैत्तरीय संहिता में भी शुक्ल यजुर्वेद के समान ही पुरोडाश, याजमान, वाजपेय, राजसूय आदि अनेक यज्ञीय अनुष्ठानों का विस्तारपूर्वक वर्णन है। मैत्राणयी संहिता गद्यपद्यात्मक है। इस संहिता के प्रथम काण्ड में दर्शपूर्णमाश, अध्वर, आधान, पुनराधान, चातुर्मास्य तथा वाजपेय यज्ञ चर्चित है। द्वितीय काण्ड में काम्य ईष्टि, राजसूय तथा अग्निचित्ति वर्णित है। तृतीय काण्ड में अग्निचित्ति, अध्वरविधि, सौत्रामणी तथा अश्वमेध यज्ञ का विस्तृत विवेचन है। चतुर्थ काण्ड में पूर्वकथित यज्ञों के सम्बन्ध में अन्य आवश्यक सामग्री एकत्रित की गई है। कठ संहिता में पाँच खण्ड हैं- इठिमिका, मध्यमिका, ओरिमिका, याज्यानुवाक्या काण्ड एवं अश्वमेधाधुवचन। इन खण्डों को टुकड़ों में विभाजित किया गया है, टुकड़ों का नाम है- 'स्थानक'। इठिमिका में १८ स्थानक हैं जिनमें पुरोडाश, अध्वर, पशु-बन्ध, वाजपेय, राजसूय CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar