वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
पृष्ठ 174, कुल 353 में से
संदर्भ में पढ़ेंDigitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 146 वैदिक वाङ्ग्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता मन की महिमा :- ३४वें अध्याय के प्रारम्भ में 'शिवसंकल्प उपनिषद्' नामक ६ मन्त्रों का सङ्कलन दृष्टिगोचर होता है। यह संकलन तथा उसकी वृत्तियों के स्वरूप निरूपण में अत्यन्त उपयोगी है। इसमें मन की महत्ता का प्रतिपादन किया गया है। इस मन में वेग है, कर्म को प्रेरणा देने वाली शक्तियाँ हैं, चेतना है, धृति है, त्रिकाल का ज्ञान है। इसमें तीनों वेद विद्यमान है और यह स्वयं हृदय में स्थित है। इसके अन्त में मन को 'शिव सङ्कल्प' होने की प्रार्थना की गई है, जिससे उसकी इच्छा सदैव मंगलदायक बने— सु॒षारथिरश्वा॑नि॒व॒ यन्म॑नु॒ष्या॒न्नेनीयते॒ऽभीशु॑भि॒र्वाजि॑न इव। हृ॒त्प्रति॑ष्ठं॒ यदजिरं॒ जवि॑ष्ठं॒ तन्मे॒ मन॑: शि॒वस॑न्कल्पम॑स्तु।। (३४/५) अर्थात् जो मन, जैसे सुन्दरचतुरसारथि गाड़ीवान लगाम से घोड़ों को सभी ओर से चलाता है, वैसे मनुष्यादि प्राणियों को शीघ्रतापूर्वक इधर-उधर घुमाता है तथा जैसे रस्सियों से वेग वाले घोड़ों को सारथि वश में करता तथा नियम में रखता है, जो हृदयस्थ विषयादि में प्रेरक या वृद्धादि अवस्था रहित तथा अत्यन्त वेगवान् है, वह मेरा मन मङ्गलमय नियम में इष्ट होवे। पितृमेधयज्ञ :- ३६वें अध्याय में पितृमेध सम्बन्धी मन्त्रों का संग्रह है। इसमें पितरों की संतुष्टि के लिए ऋचाएँ संगृहीत है। इसके कतिपय मन्त्र अन्त्येष्टि क्रिया से सम्बन्धित हैं। इन मन्त्रों को ऋग्वेद से ग्रहण किया गया है। प्रवर्ग्य यज्ञ :- ३६वें अध्याय से लेकर ३९वें अध्याय तक प्रवर्ग्य यज्ञ की प्रार्थनाओं का संकलन है। इन अध्यायों में प्रवर्ग्ययज्ञ का विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है। इस यज्ञ में एक थाली को यज्ञाग्नि पर खूब गर्म किया जाता है। यह थाली सूर्य की प्रतिनिधि के रूप में मानी जाती है। इस दहकती हुई अग्नि में दूध को उबाला जाता है। इस प्रकार उष्ण किया गया दूध अश्विनी कुमारों द्वारा मिलाया जाता है। इस यज्ञ में एक गूढ़ रहस्य निहित है। इसमें यज्ञ के पात्र ऐसे क्रम से रखे जाते हैं कि वह सब मिलकर एक पुरुष की आकृति का रूप धारण कर लेते हैं। यथा— दूध की थाली मस्तक हो, पावन तृण से निर्मित शिखा केशपाश हो, दो लघु दुग्धपात्र कान हों, दो छोटे सुनहले पत्ते आँखें हों, दो पात्र ऐडी हों, माड़ा हुआ आटा मेद तथा मज्जाएँ हो, दूध से मिला शहद ही रुधिर हो आदि। इसी प्रकार अन्य अंगों की भी कल्पना की गई है। यह समस्त विधान रहस्यात्मक है। ईशावास्योपनिषद् :- ४०वाँ अथवा अन्तिम अध्याय 'ईशावास्योपनिषद्' के रूप में विख्यात है। इसका यह अभिधान अपने प्रारम्भिक दो शब्दों के कारण पड़ा। CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar