वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
पृष्ठ 173, कुल 353 में से
संदर्भ में पढ़ेंDigitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri द्वितीय अध्याय 145 खिलसूक्त :- २६वें अध्याय से ४० अध्याय तक के मन्त्रों को निःसन्देह रूप से परवर्तीकालीन रचना स्वीकार किया जाता है। इनमें से २६ से २९ अध्याय तक का अंश खिलसूक्त के नाम से जाना जाता है। विषयवस्तु की दृष्टि से खिल सूक्तों में कोई नवीन वस्तु नहीं है, अपितु पिछले अध्यायों में कथित अनुष्ठानों के सम्बन्ध में नवीन मन्त्रों द्वारा वर्णन किया गया है। पुरुषमेध यज्ञ :- पुरुषमेध यज्ञ का वर्णन ३०वें अध्याय में किया गया है। यह अध्याय एक जोड़ के सदृश प्रतीत होता है क्योंकि इस अध्याय में एक भी प्रार्थना नहीं उपलब्ध होती है। इस अध्याय में १८४ पदार्थों व व्यक्तियों का आलम्भन उपलब्ध होता है। यह आलम्भन यथार्थ आलम्भन नहीं है बल्कि पुरुष मेध यज्ञ के अवसर पर प्रतीक रूप में किया जाता था। भारत में कभी भी पुरुषमेध यज्ञ हुआ हो, ऐसा वर्णन कहीं भी इतिहास पुराणादि में उपलब्ध नहीं होता। यह यज्ञ कल्पनाप्रसूत है, इसमें पुरुष की विभिन्न प्रतिनिधिभूत वस्तुओं के लिए पृथक्-पृथक् पदार्थों में दान का विधान था। जैसे नृत्तार्थ सूत की, गीत के लिए नट की, धर्म के लिए समाचार की, पुरोहित के लिए ब्राह्मण की, राजवंश के लिए वीर योद्धा की, मरुताणों के लिए वैश्य की, संन्यासी के लिए शूद्र की, अन्धकार के लिए चोर की, नरकार्थ हत्यारे की, कामार्थ वाराङ्गना की, कोलाहलार्थ गायक की, अक्षार्थ द्यूतकर की, निद्रार्थ नेत्रहीन की, अन्यायार्थ बधिर की, यथार्थ रजक पत्नी की, कामनार्थ रजक पत्नी की, यथार्थ वन्ध्या की, आनन्दार्थ वीणा वादक की, क्रन्दनार्थ मुरली वादक की, स्वर्गार्थ खल्वाट् की तथा पृथ्वी के लिए पंगु की आलम्भन की विधि विहित है। पुरुषसूक्त :- ३१वाँ अध्याय प्रसिद्ध पुरुष-सूक्त है। यहाँ पुरुष को सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति के रूप में उपस्थित किया गया है। इस अध्याय को एक 'उपनिषद्' भी कहा जाता है। पुरुष-मेध-यज्ञ करते समय पुरोहित द्वारा इसी के मन्त्रों का सस्वर पाठ किया जाता है। ऋग्वेद में दशम मण्डलान्तर्गत उपलब्ध ९०वें सूक्त में संसार की उत्पत्ति पुरुषबलि के द्वारा बतलाई गई है तथा विश्व व पुरुष को अभिन्न निरूपित किया गया है। यजुर्वेदीय पुरुष सूक्त में ऋग्वेदीय पुरुष सूक्त से ८ मन्त्र अधिक मिलते हैं। सर्वमेध यज्ञ :- ३२वें तथा ३३वें अध्याय में सर्वमेध यज्ञ का वर्णन किया गया है। ३२वें अध्याय में केवल १६ तथा ३३वें अध्याय में कुल ९६ मन्त्र हैं। यह वह सर्वोत्कृष्ट यज्ञ है जिसके समाप्त होने पर यज्ञ करने वाला यजमान पुराहित को यज्ञ के पश्चात् अपना सब कुछ दक्षिणा के रूप में समर्पित करता है और शेष जीवन के निर्वाह हेतु वानप्रस्थ ग्रहण कर लेता है। यही इस यज्ञ का वैशिष्ट्य है। CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar