भारतकोश
वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

पृष्ठ 172, कुल 353 में से

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पृष्ठ 172

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 144 वैदिक वाङ्ग्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता हुआ पृथिवी आदि में निवास करने वाली बिजली के प्रकाश को निश्चय करके भूमि के ऊपर धारण करे वह योगी तथा भूगर्भविद्या का ज्ञाता होवे। शतरूद्रीययज्ञ :- १६वें अध्याय में शतरूद्रीय-यज्ञ का विवेचन है। इसमें रुद्र की कल्पना का अत्यन्त साङ्गोपाङ्ग विवरण प्राप्त होता है। वेदज्ञों में यह रुद्राध्याय अत्यन्त उपयोगी होने से अतिप्रसिद्ध है। इस अध्याय के देवता 'रुद्र' ही है। सौत्रामणी यज्ञ :- १९वें अध्याय से लेकर २१वें अध्याय तक उपलब्ध मन्त्रों में उत्सवरूपी सौत्रामणी यज्ञ का वर्णन है। इस यज्ञ में सोमरस के साथ सुरापान का भी उल्लेख है। कहा भी गया है- “सौत्रामण्यां सुरां पिबेत्।” सोमरस को निचोड़कर सुरा मिलाकर पान करना बलवर्द्धक होता है। यह सुरा अश्विनीकुमार सरस्वती तथा इन्द्र को आहुति द्वारा दी जाती है। इस यज्ञ को अश्विनी कुमार ने इन्द्र के रोग दूर करने के लिए किया था क्योंकि अधिक सोमपान से इन्द्र रोगग्रस्त हो गए थे। यह यज्ञ किसी भी प्रकार के व्यक्ति द्वारा अपनी सफलता के लिए किया जाता था। यथा राजा द्वारा राज सिंहासन की पुनः प्राप्ति के लिए, विजयेच्छु योद्धा के लिए, ऐश्वर्याभिलाषी वैश्य के लिए इस यज्ञ का अनुष्ठान विहित है। अश्वमेध यज्ञ :- अध्याय २२ से २५ तक अश्वमेध यज्ञ से सम्बन्धित प्रार्थनाओं का संग्रह है। यह यज्ञ सार्वभौम आधिपत्य के अधिकारी सम्राट द्वारा किए जाते रहे हैं। इस यज्ञ का सम्पादन चक्रवर्ती सम्राट द्वारा ही किया जा सकता है। अध्याय २० के प्रथम १३ मन्त्रों में राजतन्त्र की उपमा मानवीय शरीर से दी गई है। इस यज्ञ में घोड़ा छोड़ा जाता है। जिस राज्य में घोड़ा निर्वाद रूप से अतिक्रमण कर लेता है, वह राज्य अश्वमेध यज्ञ के कर्ता के अधीन हो जाता है। जहाँ अश्व को बाधा पहुँचाई जाती है, वहाँ संग्राम होता है तथा संग्राम का परिणाम ही चक्रवर्ती सम्राट के पद का निर्णायक होता है। अध्याय २२ का प्रथम मन्त्र ही अश्व छोड़े जाने की प्रक्रिया बतलाता है। अश्व छोड़े जाने के समय निम्नलिखित ऋचा का पाठ किया जाता है- स्वगा॒ त्वा दे॒वेभ्यः॑ प्र॒जाप॑तये॒ ब्रह्म॒न्नश्वं॑' भुन्त्स्यामि दे॒वेभ्यः॑ प्र॒जाप॑तये॒ तेनं॑ राध्यासम्। तं ब॑धान दे॒वेभ्यः॑ प्र॒जाप॑तये॒ तेनं॑ राध्नुहि।। (२२/४) इस मन्त्र में प्रजा की ओर से पुरोहित सम्राट् को यह अधिकार प्रदान करता है कि वह प्रजा के अभ्युदय तथा रक्षा के प्रति अपने कर्तव्य का पालन करे। सभी स्वतन्त्रता तथा ऐश्वर्य का उपभोग करें। दूसरे के हितों का सभी ध्यान रखें। CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

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