भारतकोश
वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

पृष्ठ 171, कुल 353 में से

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पृष्ठ 171

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri द्वितीय अध्याय 143 आत्मसात् करना पड़ता है। तब वह वाजपेयी बनने का अधिकारी होता है। जो वाज को पेयरूप में ग्रहण कर लें तथा उसे व्यर्थ न जाने दें, वही वाजपेय यज्ञ का कर्ता कहलाता है। यह यज्ञ मूलतः योद्धाओं तथा राजाओं द्वारा किया जाता था। इसका सम्बन्ध घोड़ों की धावन प्रतियोगिता से जोड़ा जाता है। इसमें सुरामिश्रित सोमरस का पान होता था। इस सुरापान का ब्राह्मण-ग्रन्थों के काल में निषेध किया गया था। राजसूय यज्ञ :- दशम अध्याय में राजसूय यज्ञ वर्णित है। यह राजा जनक के राज्याभिषेक के अवसर पर किया गया था। राज्याभिषेकोपरान्त राज्य का भार राजा के शिर पर आ जाता है जिसका उसे सफलतापूर्वक निर्वाह करना पड़ता है। इसीलिए इस अध्याय में राजनीति, राजतन्त्र तथा राजोपयोगी शिक्षा का निरूपण हुआ है। अन्तिम मन्त्र में राजा तथा प्रजा के सम्बन्ध का निर्देश है- पु॒त्रमि॑व पि॒तरा॑वि॒श्विनो॒भेन्द्रा॑वथुः का॒व्यैर्ऋधं॒ सना॑भिः। यत्सु॒रामं॒ व्यपि॑बः॒ शची॑भिः॒ सर॑स्वती त्वा मघवन्नभिष्णक्॥ (१०/३४) हे विशिष्ट धन से सम्माननीय समस्त सभाओं के स्वामी! आप बुद्धिबल से आरामदायक रस को विविध प्रकार से पीवें, आप विद्या से उत्तम शिक्षा प्राप्त वाणी के समान स्त्री सेवन करे। राजा से आज्ञा प्राप्त (तुम दोनों) सेनापति तथा न्यायाधीश, परम विद्वानों द्वारा किए कर्मों से जैसे माता-पिता अपने सन्तान की रक्षा करते हैं वैसे समस्त राज्य की रक्षा करें। अग्निचयन :- अध्याय ११ से १८ तक 'अग्निचयन' का विस्तारपूर्वक वर्णन है। अग्निचयन का अभिप्राय है- 'याज्ञीय होमाग्नि के लिए वेदिका निर्माण।' यह गृहस्थ के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कार्य है। इसके निर्माण में १०,८०० ईंटों का प्रयोग होता है। यज्ञकुण्ड पंख खोले पक्षी के आकार का बनाया जाता था। वैखानस गृह्यसूत्र तथा शतपथ ब्राह्मण में वेदि तथा उसके विविध ईंटों के आध्यात्मिक रूप का व्याख्यान बड़ी मार्मिकता के साथ किया गया है। ११वें अध्याय के प्रथम मन्त्र में अग्निचयन का स्पष्ट उल्लेख है। यह न केवल पार्थिव अग्निचयन का ही अपितु मानसिक एवं आध्यात्मिक अग्निचयनों का भी निर्देश कर रहा है- यु॒ञ्जानः प्र॑थ॒मं मन॑स्त॒त्त्वाय॑ सवि॒ता धियः॑। अ॒ग्नेर्ज्योति॑र्नि॒चाय्य॑ पृथि॒व्या अध्याऽभ॑रत्॥ (११/१) अर्थात् जो ऐश्वर्य का इच्छुक मनुष्य उन परमेश्वरादि पदार्थों के ज्ञान के लिए प्रथम विचार स्वरूप अन्तःकरण की वृत्तियों को योगाभ्यास तथा भूगर्भविद्या में युक्त CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

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